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पर्यावरण: दमकती रोशनी का स्याह पक्ष... प्रकाश प्रदूषण पर कम ध्यान देना चिंता का विषय

Fri, 04 Jul 2025 08:41 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Fri, 04 Jul 2025 08:41 AM IST
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सार
कृत्रिम रोशनी कीटों, पक्षियों, जानवरों के साथ ही इन्सान के लिए भी घातक है, पर अन्य प्रदूषणों की तुलना में प्रकाश प्रदूषण पर कम ध्यान देना चिंता का विषय है।
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Environment crisis dark side of brightness Less attention to light pollution matter of concern
अन्य प्रदूषणों की तुलना में प्रकाश प्रदूषण पर कम ध्यान देना चिंता का विषय - फोटो : फ्री पिक

विस्तार

हाल ही में महाराष्ट्र के कुछ गांवों में जुगनू का उत्सव मनाया गया। वहां का समाज जानता है कि जुगनू महज रोशनी करने वाला कीट मात्र नहीं है, बल्कि यह खेती-किसानी का अकाम मित्र कीट है। कृत्रिम प्रकाश की उपस्थिति में जुगनुओं को तेज रोशनी करने की कोशिश में और संभावित साथियों द्वारा उनके संकेतों पर ध्यान देने में अधिक ऊर्जा खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसका असर उनकी प्रजनन क्षमता और संख्या पर पड़ रहा है। नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च के शोधकर्ता रमेश चतरगड्डा ने आंध्र प्रदेश के एक खास क्षेत्र में एब्सकॉन्डिटा चिनेंसिस जुगनू प्रजातियों की आबादी को रिकॉर्ड करने का प्रयास किया। बरनकुला गांव में 1996 में 10 मीटर क्षेत्र में जुगनुओं की संख्या 500 थी, जो 2019 में 10-20 रह गई।



यह कृत्रिम प्रकाश प्रवासी पक्षियों के लिए जानलेवा है। कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर काइल हॉर्टन के नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि लंबी दूरी तय कर थके हुए पक्षी तेज रोशनी वाले शहरों में आराम की जगह या भोजन तलाशने में विफल रहते हैं और उनकी जान भी चली जाती है।


कृत्रिम प्रकाश, खासकर रात में, मानव स्वास्थ्य, वन्यजीवों व पर्यावरण को कई नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें नींद की समस्या, मोटापा, हृदय रोग, कैंसर का खतरा और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव शामिल हैं। दुनिया में रहने वाले अधिकांश जीवों की तरह इन्सान भी सर्कैडियन रिदम या लय, जिसे शरीर की आंतरिक घड़ी भी कहते हैं, का पालन करते हैं, यानी जैविक घड़ी के मुताबिक जागने-सोने का एक तंत्र होता है। यह तंत्र काफी कुछ आंखों में मौजूद फोटोरिसेप्टर के कारण संचालित होता है। 

कृत्रिम प्रकाश, जिसमें अब मोबाइल भी शामिल है, इस नैसर्गिक तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे मेलाटोनिन का उत्पादन कम होता है, जो नींद के लिए जरूरी है। नींद की कमी और सर्कैडियन लय में गड़बड़ी अवसाद, चिंता, मोटापा व चयापचय के जोखिम को बढ़ा सकती है। लंबे समय तक नकली रोशनी में बैठने से सिरदर्द, थकान आदि लक्षण पैदा हो सकते हैं। 

प्रकाश का हानिकारक प्रभाव कुछ कारकों पर निर्भर करता है। यदि प्रकाश क्रोमोफोर तक पहुंचता है, जो कोशिकाओं में मौजूद अवशोषित करने वाले अणु होते हैं, तो दृश्यमान और यूवी प्रकाश उन कोशिकाओं के भीतर रासायनिक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकते हैं। क्रोमोफोर विशेष रूप से त्वचा और आंख की कोशिकाओं में प्रचुर मात्रा में होते हैं। जब अवरक्त प्रकाश पदार्थ को प्रकाशित करता है, तो यह उसे गर्म कर सकता है। शरीर ने तेज या गर्म रोशनी के खिलाफ कई रक्षा तंत्र विकसित किए हैं। ये जैविक और व्यावहारिक, दोनों हैं, जिनमें दर्द की प्रतिक्रिया, पलक झपकाना, पुतली का सिकुड़ना व तेज रोशनी के प्रति स्वाभाविक घृणा शामिल है। एंटीऑक्सीडेंट और त्वचा में पाए जाने वाले पिगमेंट जैसे अणु विकिरण के कारण होने वाले हानिकारक अणुओं के अत्यधिक स्तर को नष्ट कर प्रतिकूल रासायनिक प्रतिक्रियाओं को धीमा कर देते हैं।

आज जब सारी दुनिया जलवायु परिवर्तन के विभिन्न कुप्रभावों से रूबरू हो रही है, ऐसे में प्रकाश-प्रदूषण अब भी लगभग बहुत कम चिंता का विषय है। अधिक रोशनी के लिए अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है और उससे अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है, इस चमकती रोशनी के ही स्याह पक्ष हैं, जिसके बारे में लोगों को जागरूक करना जरूरी है।

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