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केदारनाथ के बारे में इस बात को आप भी सच मानेंगे
रामचरण महेंद्र
Updated Mon, 02 Feb 2015 10:37 AM IST
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कहते हैं न कि सौंदर्य सदा कांटों के बीच ही सुरक्षित रहता है। केदारनाथ के बारे में यह बात शत-प्रतिशत सही साबित होती है। केदारनाथ का मार्ग सौंदर्य की दृष्टि से जितना अप्रतिम है, चढ़ाई की दृष्टि से उतना ही बीहड़। बात उस समय की है, जब ऋषिकेश से आगे का रास्ता पैदल ही पार करना पड़ता था। पहाड़ों को काटकर बनाया गया रास्ता बीहड़ से निकलता था। यात्रियों को चोट भी बहुत लगती थी।
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केदारनाथ का दर्शन करने जा रहे स्वामी दर्शनानंद भी ऐसी ही एक पहाड़ी ढलान से फिसल गए और काफी चोटिल हो गए। उनके लिए आगे चलना कठिन हो रहा था। स्वामी जी ने पास ही में एक चट्टी पर पचपन साल की एक वृद्धा करमा देवी को रास्ते में चोटिल हुए लोगों की सेवा करते देखा। वह खुद भी एक चट्टान से लुढ़क गई थीं, जिस कारण उन्हें भी काफी चोटें आई थीं। स्वामी जी ने देखा कि वह महिला घायल होने के बावजूद लोगों की सेवा कर रही थी।
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उसके कुछ सहयोगी परिजनों ने स्वामी जी को सहारा दिया। उन्हें शिविरनुमा उस स्थान पर उठाकर ले गए। करमा देवी वहां खुद स्वामी जी के चिकित्सा-उपचार में लग गईं। उन्होंने उनके जख्म साफ किए, दवा लगाई, खाने की दवा दी और उसके बाद उन्हें एक कंडी पर बिठाया। घायल होने के बाद भी करमा सेवा में लगी थीं, हालांकि उनकी पीड़ा कभी-कभार कसक उठती थी, मगर वह सदा की तरह हंसमुख बनी रहीं।
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स्वामी जी ने करमा से कहा, माताजी, आपको तो बहुत चोट लगी है, फिर भी आप अपनी तकलीफ को दरकिनार कर घायल यात्रियों की सेवा में...। करमा ने स्वामी जी की बात बीच में ही काट दी और कहा, स्वामी जी! तीर्थों में चोट सही जाती है, कही नहीं जाती...।