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बिजली के झटके

Sun, 12 Jan 2014 06:18 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Sun, 12 Jan 2014 06:18 PM IST
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Electric shock

जी, अब रोटी-कपड़ा और मकान का जमाना तो रहा नहीं। बीएसपी यानी बिजली-सड़क-पानी का जमाना आया, लेकिन उसमें भी अब बिजली-पानी ही रह गया, सड़क की तो कोई बात ही नहीं कर रहा। जबकि सड़कों में गढ्ढे अब भी हैं और वायदों के बावजूद वे अभिनेत्रियों के गालों की तरह चकाचक नहीं हो पाई हैं। जी, बिजली-पानी ने ऐसी दौड़ लगाई है कि सड़क पीछे छूट गई।

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पर जनाब, मंजिल सड़क के बिना कैसे मिलेगी? वैसे भी कहते हैं कि सड़क पर आए बिना संसद तक पहुंचना मुश्किल है। सड़क की उपेक्षा तो नहीं हो सकती। अलबत्ता रेस में वह पिछड़ जरूर गई है। अब तो जमाना बिजली का ही है। देख लो, केजरीवाल जी ने एक प्लास उठाया, बिजली के कनेक्शन ऐसे जोड़े कि सत्ता से कनेक्शन अपने आप जुड़ गया। सचमुच बिजली में दम है। झटका ऐसा देती है कि एकदम सत्ता से बाहर फेंक दे, जैसे दिल्ली में कांग्रेस को फेंक दिया। हालांकि झटका भाजपा को भी कम नहीं लगा, फिर चाहे कितना धीरे से लगा हो।
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बिजली कभी जनता को झटका देती है, तो कभी सत्ता को फटका। दिल्ली में ये झटके और फटके कई तरह के थे। पहले कुछ इस तरह के थे कि बिजली जाती ज्यादा थी और आती कम थी। तो उसने भाजपा को ऐसा झटका दिया कि सत्ता से ही भटका दिया। इतना कि दिल्ली में उसे आज तक वह ढ़ूंढ़े न मिल रही। फिर बिजली जब आने लगी, तो उसके रेट झटके देने लगे। बिल तो झटका देते ही थे, मीटर भी पीछे नहीं थे। रही-सही कसर बिलों की वसूली करनेवाले ठेकेदार पूरी कर देते थे। पर वोटिंग मशीन के खटके ने झटके देनेवालों को ऐसा पटका दिया कि भूले-भटके कभी दिख जाएं, तो हाल जरूर पूछना। बिजली जब उछाल देती है, तो ऐसे ही उछाल देती है।
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कभी परिवार सत्ता की सीढ़ी होता था, कभी पैसा और रसूख सत्ता की सीढ़ी होते थे। पर अब लगता है कि बिजली सत्ता की सीढ़ी हो गई है। बिजली वाली सीढ़ी, लिफ्ट करा दे वाली। इसीलिए तो अब दिल्ली के बाद मुंबई में भी बिजली के दाम कम करने की मांग उठ गई है और यह मांग खुद कांग्रेसियों ने उठा दी है कि कहीं पार्टी को झटके पर झटके न लगते रहें। सत्ता की अधिक चतुराई भी कई बार भारी झटका देती है। यह कांग्रेस बखूबी बता सकती है। हो सकता है, बिजली कंपनियां भी ये पाठ पढ़ लें। उनका भी तो ऑडिट शुरू हो गया है। पता नहीं, कितना बड़ा झटका लगे।

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