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पर्यावरण पर भारी पड़ते चुनाव

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Tue, 16 Apr 2019 06:11 PM IST
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Elections overwhelmingly on the environment
मुकुल श्रीवास्तव

पूरा देश इस समय चुनावी उत्सव में सराबोर है। तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी उपलब्धियों एवं वायदों का प्रचार-प्रसार कर रही हैं। जाहिर है सोशल मीडिया के आने से प्रचार के लिए पारंपरिक माध्यमों के अलावा एक नया विकल्प मिला है, फिर भी चुनाव प्रचार का अब भी मुख्य माध्यम बैनर-होर्डिंग ही हैं। चाहे किसी पार्टी की रैली हो या किसी उम्मीदवार का अपने पक्ष में माहौल बनाना, वह बैनर-होर्डिंग का ही सहारा लेता है। बदलते वक्त के साथ बैनर होर्डिंग भी बदले हैं, पर इनके बदलावों पर लोगों ने ज्यादा गौर नहीं किया। किया भी क्यों जाए, साफ पर्यावरण कभी भारत की चिंता में नहीं रहा। पिछले एक दशक में बैनर होर्डिंग का स्थान कपड़ों और पेंट की जगह फ्लेक्स ने ले लिया है, जो पीवीसी (पोलीविनाईल क्लोराईड) प्लास्टिक से बने होते हैं और यह एक बड़ी स्वास्थ्य और पर्यावरणीय समस्या है। यही वजह है कि चुनाव आयोग ने भी सभी दलों को प्रचार के दौरान प्लास्टिक और पॉलीथीन का इस्तेमाल करने से बचने की हिदायत दी।


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मूडी की एक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी कंपनी आईसीआरए के मुताबिक, भारत में सालाना नब्बे प्रतिशत आउटडोर विज्ञापन पीवीसी पर प्रिंट होते हैं, जिनकी खपत 18,000 टन मासिक है, जो साल भर में 2,16,000 टन हो जाता है। इसमें हर तरह के छोटे-बड़े विज्ञापन शामिल हैं, चाहे किसी नए फोन का लांच होना हो या कोई मोटरबाइक या फिर नए फ्लैट का सपना दिखाते लुभावने विज्ञापन। पीवीसी दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा प्लास्टिक पॉलीमर है, जिसका इस्तेमाल बैनर-होर्डिंग में होता है। नॉन बायो डीग्रिडेबल प्रकृति के कारण इसको खत्म करने के लिए या तो इसे जलाना पड़ता है या लैंडफिल में डाला जाता है। एक प्रतिशत से भी कम पीवीसी को रिसाइकिल किया जाता है। जलता हुआ पीवीसी बहुत-सी जहरीली गैसें छोड़ता है, जो हवा से भारी होती है और जो ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देती है, जिससे कैंसर होने की आशंका होती है। उसकी राख जमीन और पानी को भी प्रदूषित कर देती है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान दो से तीन महीनों में अनुमान के अनुसार प्लास्टिक की खपत इतनी होती है, जितनी दो या तीन गैर-चुनावी वर्षों में होती है। ये एक कैंसरकारी तत्व है, जिसके कारण देश भर में राज्य सरकारें इसके उपयोग में कटौती करने के लिए प्रेरित हो रही हैं।

द एनर्जी ऐंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के अनुसार, केंद्र सरकार ने भी एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए 2022 का लक्ष्य रखा है, जिसका 1.34 करोड़ टन प्रति वर्ष देश में निर्मित किया जाता है। प्रचार विज्ञापनों के लिए कपड़े और पुनर्नवीनीकरण कागज जैसे विकल्प ज्यादा पर्यावरण मैत्री हो सकते हैं। पीवीसी के लिए पचास साल की तुलना में सूती कपड़े को सड़ने में केवल पांच से छह महीने का समय लगता है। इन सब चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के हित में चुनाव के दौरान प्रचार सामग्री के रूप में एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग नहीं करने के लिए पर्याप्त कदम उठाने की सलाह दी थी, लेकिन क्या महज सलाह देने से ही राजनीतिक दल कार्रवाई करेंगे? यह एक बड़ा प्रश्न है। अगर यह प्रतिबंध आदर्श आचार संहिता का हिस्सा बन जाता है, तो इसे (प्लास्टिक) सीमित करने का एक निश्चित तरीका जरूर बन सकता है। इस बीच, केरल उच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को दक्षिणी राज्य में पीवीसी-आधारित प्रचार सामग्री से बचने का निर्देश दिया है। तस्वीर का दूसरा हिस्सा यह भी है कि देश में लोग न तो पर्यावरण की कीमत समझते हैं और न ही इंसानी जान की। ये चुनाव, चुनाव प्रचार में व्यवहार परिवर्तन और नई प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए शानदार अवसर हो सकते हैं, पर फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

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