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आर्थिकी: कहीं यह ट्रंप की चाल तो नहीं, दबाव की राजनीति भी संभव
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नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप।
- फोटो :
एएनआई (फाइल)
विस्तार
ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर 25 फीसदी टैरिफ की घोषणा और रूस से तेल आयात पर द्वितीयक प्रतिबंध के खतरे से भारतीय वित्तीय बाजारों और व्यापार गलियारों में हलचल है। हो सकता है कि अमेरिका ने व्यापार समझौते में बेहतर शर्तें सुनिश्चित करने के लिए यह दबाव बनाया हो, लेकिन भारत पर इसका तत्काल प्रभाव तो पड़ेगा ही। भारत ने वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका को 87 अरब डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया, और लगभग 45 अरब डॉलर का आयात किया, जिससे भारत के पक्ष में 42 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष हुआ, जिस पर अब सीधा खतरा है।
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन, वस्त्र एवं परिधान, रत्न एवं आभूषण, चमड़े के सामान और जूते, फार्मास्यूटिकल्स और रसायन और समुद्री खाद्य अमेरिका को निर्यात करता है। सामूहिक रूप से ये क्षेत्र अमेरिका को भारत के सालाना 50 अरब डॉलर से ज्यादा का निर्यात करते हैं। 25 फीसदी टैरिफ न केवल उन्हें गैर-प्रतिस्पर्धी बना देगा, बल्कि निर्माताओं को घाटा सहने, बाजार से बाहर निकलने, या अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को अन्य भौगोलिक क्षेत्रों की ओर मोड़ने के लिए मजबूर कर सकता है। कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि ये टैरिफ ट्रंप की ‘व्यापार कला’ रणनीति का हिस्सा हैं। यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ हुए समझौते इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। हालांकि, भारत की स्थिति संरचनात्मक रूप से थोड़ी अलग है। अमेरिका के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता अभी हुआ नहीं है। भारत ने अपने कृषि और डेयरी क्षेत्रों को खोलने के अमेरिकी दबाव का लगातार विरोध किया है।
यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर जुर्माना लगाता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और राजकोषीय घाटे को दोहरा झटका लगेगा। इससे निवेशकों की भावनाओं से लेकर आपूर्ति शृंखला तक प्रभावित होगी। टैरिफ घोषणा से भारतीय शेयर बाजारों में पहले ही गिरावट देखी जा चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आई है, और बढ़ते चालू खाता घाटे (सीएडी) की चिंताओं के कारण बॉन्ड यील्ड में भी दबाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। अगर भारतीय निर्यातक अमेरिकी बाजार से निकलने को मजबूर होते हैं, तो नए विकल्पों की ओर रुख करने में काफी समय और निवेश लगेगा।
निर्यात पर निर्भर उद्योगों में, खासकर कपड़ा, चमड़ा और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में नौकरियों पर संकट बढ़ रहा है। इन उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। सरकार को टैरिफ के बाहरी झटके और कुछ बाजारों व क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भरता की कमजोरियों, दोनों का समाधान करना होगा। सरकार को विनिर्माण, कृषि-निर्यात, ई-कॉमर्स और शहरी बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनियमन करना होगा। प्रमुख उपभोग और निर्यात श्रेणियों के लिए जीएसटी स्लैब कम करने से मांग बढ़ सकती है। रणनीतिक वित्तीय समर्थन, जैसे निर्यातित उत्पादों पर शुल्कों और करों में छूट, निर्यात प्रतिस्थापन पर केंद्रित पीएलआई और मुक्त भंडारण क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा सकता है। प्रभावित निर्यात क्षेत्रों के लिए लक्षित प्रोत्साहन जरूरी है-चाहे वह ब्याज अनुदान, ऋण गारंटी योजनाओं, या प्रभावित उद्योगों के लिए प्रत्यक्ष वेतन सहायता के जरिये हो। वैकल्पिक बाजार पहुंच के लिए एक त्वरित प्रतिक्रिया व्यापार कूटनीति इकाई स्थापित की जानी चाहिए। रिजर्व बैंक को पूंजी बहिर्वाह का प्रबंधन करने, मुद्रा संबंधी घबराहट से बचने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए पहले से ही कदम उठाने चाहिए।