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आर्थिक हताशा के बीच ब्रिक्स

Mon, 01 Apr 2013 03:12 PM IST
जयंतीलाल भंडारी (आर्थिक विश्लेषक)
जयंतीलाल भंडारी (आर्थिक विश्लेषक) Updated Mon, 01 Apr 2013 03:12 PM IST
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economic frustration among brics

कोई बारह वर्ष पूर्व ब्राजील, रूस, भारत और चीन के जिस ब्रिक समूह ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी परिदृश्य में एकजुट होकर आगे बढ़ने के लिए कदम उठाए थे, वही समूह 2011 में दक्षिण अफ्रीका को साथ लेकर ब्रिक्स के नाम से चमकते हुए तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

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विगत 26-27 मार्च को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में आयोजित ब्रिक्स के पांचवें शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और ब्राजील की राष्ट्रपति दिलमा राउसेफ ने भाग लिया।
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इस सम्मेलन में ब्रिक्स देशों ने आपसी व्यापार और सहयोग को बढ़ाकर विकास की राह तलाशने की कोशिश की है। सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनका मंच विश्व आर्थिक व्यवस्था पर चमकता हुआ दिखाई देगा।
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गौरतलब है कि ब्रिक्स की मुट्ठी में दुनिया की 43 फीसदी आबादी और वैश्विक जीडीपी का 25 फीसदी हिस्सा है। लिहाजा आपसी व्यापारिक हितों के साथ वैश्विक आर्थिक मोर्चों पर भी ब्रिक्स देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बाद यह दुनिया का तीसरा बड़ा आर्थिक संगठन बन गया है। यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ब्रिक्स देशों का निर्यात विश्व निर्यात का करीब 20 फीसदी हो गया है। लिहाजा अमेरिका और यूरोप की आर्थिक ताकत कम होने के इस दौर में ब्रिक्स के पास बड़ी आर्थिक भूमिका निभाने का मौका है।

वस्तुतः ब्रिक्स देश एक-दूसरे के लिए भी महत्वपूर्ण आर्थिक उपयोगिता रखते हैं। मसलन, ब्राजील और रूस उन जिंसों के निर्यातक हैं, जिनकी जरूरत भारत और चीन को है। ब्राजील और रूस के पास कमोडिटी की बड़ी ताकत भी है।

दक्षिण अफ्रीका खनिज संसाधनों से भरपूर है। इसी तरह चीन के पास मैन्युफैक्चरिंग और भारत के पास सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी ताकत है। ब्राजील अब तक यूरोप और अमेरिका को कृषि पदार्थों व खनिजों का निर्यात करता था, लेकिन चीन की बढ़ती मांग ने उसके सोयाबीन क्षेत्र की रफ्तार बढ़ाने में भी अहम भूमिका अदा की है।

यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले साल अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए चीन ब्राजील का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी हो गया है। लंबे समय तक रूस अमेरिका को प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा निर्यातक रहा है। लेकिन अब एशिया में रूस का निर्यात बढ़ रहा है। अब तक रूस का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी जर्मनी था। लेकिन अब रूस का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी चीन है। इसी तरह भारत सेवा क्षेत्र में ब्रिक्स देशों का अग्रणी आईटी सहयोगी देश बनता जा रहा है।

इस पृष्ठभूमि में पांचवें शिखर सम्मेलन में तेरह पन्नों का जो घोषणापत्र जारी हुआ है, उससे ब्रिक्स देशों का आपसी व्यवसाय बढ़ने के साथ वैश्विक महत्व भी बढ़ेगा। इसमें सबसे महत्वपूर्ण ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना को लेकर प्रतिबद्धता है। लेकिन ब्रिक्स देशों ने यह भी कहा है कि उनका बैंक विश्व बैंक का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक होगा।

इस बैंक के माध्यम से ब्रिक्स देश जी-20, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों में होने वाले आर्थिक क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकेंगे। ब्रिक्स देशों ने सौ अरब डॉलर के आरंभिक कोष के साथ मुद्रा भंडार की एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात भी कही है, जो मौद्रिक उतार-चढ़ाव के समय ब्रिक्स देशों को मौद्रिक स्थिरता में मदद करेगी।

भारत अब तक बुनियादी परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेता रहा है। पर उनकी शर्तें कड़ी होती हैं। इसके अलावा अधिकांश वैश्विक वित्तीय संस्थाएं ऋण देने के साथ अपना एजेंडा भी थोपती हैं। ऐसे में, ब्रिक्स बैंक की स्थापना से खास तौर से भारत को आधारभूत संरचना के विकास में बड़ा निवेश सरलता से प्राप्त हो सकेगा।

भारत को इस तरह के बैंक की ज्यादा जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि इस समय अर्थव्यवस्था चालू खाते के घाटे के भारी संकट से जूझ रही है। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखते हुए अपनी कूटनीतिक जीत दर्ज की है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत में जहां दोपक्षीय व्यापार में भारत को प्रभावित कर रहे आर्थिक मुद्दे उठाए, वहीं ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा तीन बांध बनाए जाने से भारत के नुकसान की आशंका को दमखम के साथ पेश किया।

अलबत्ता ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग की कवायदों को तेजी से लागू करना आसान नहीं है। यह सर्वविदित है कि ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग अब तक औपचारिक ही ज्यादा रहा है। इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय मामलों और मंचों पर ब्रिक्स देश अपने-अपने हितों से प्रभावित होते हुए अलग राह पर चलते देखे गए हैं।

कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ब्रिक्स देशों में मतभेद हैं, फिर भी इन्होंने तय किया है कि वे प्रभावी आर्थिक संपर्क और समन्वय से परस्पर उद्योग-व्यापार की सूरत संवारेंगे और आर्थिक मुश्किलों का मिल-जुलकर सामना करेंगे।


डरबन सम्मेलन के बाद ब्रिक्स ने दुनिया के आर्थिक परिदृश्य पर जो एक खास प्रासंगिकता हासिल की है, उसे व्यावहारिक स्वरूप देने और अपनी विकास यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत इच्छाशक्ति बहुत जरूरी है।

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