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उम्मीदें जब हताशा बन जाती हैं

Fri, 08 Mar 2013 09:43 PM IST
Updated Fri, 08 Mar 2013 09:43 PM IST
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dsp murder in kunda

राजनीतिक दुर्घटनाएं जारी हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक डीएसपी को पहले तो बुरी तरह मारा-पीटा गया, फिर उन्हें उनकी ही सर्विस रिवाल्वर से गोली मार दी गई। उनके साथ जो पुलिसकर्मी थे, वे भाग खड़े हुए। हम सबने पति के शोक में एक पत्नी को विलाप करते हुए देखा। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में कानून का राज आखिर कहां है।

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ऐसे में आरोपी कैबिनेट मंत्री के पास इस्तीफा देने के अलावा कोई चारा नहीं था। बेशक इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए गए हैं, लेकिन इसमें कुछ होना नहीं है, क्योंकि हत्या का कोई चश्मदीद गवाह सामने नहीं आएगा। कोई यह नहीं चाहेगा कि अपराधियों के खिलाफ गवाही देने के दुस्साहस की कीमत उसे अचानक सड़क दुर्घटना या हृदयाघात से मौत के रूप में चुकानी पड़े। उत्तर प्रदेश में यही तो होता है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पीड़ित परिवार से मिले और पचास लाख रुपये दिए, लेकिन क्या काम करते हुए एक लोकसेवक की सरेआम हत्या की यही कीमत है?
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परवीन आजाद ने अपना पति खोया है। हम सब लाख आंसू बहाएं, लेकिन फिर अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाएंगे। फिलहाल जो लोग पीड़ित का समर्थन कर रहे हैं, वे भविष्य में ओझल हो जाएंगे और हम सब कानून के राज की दुहाई देते रहेंगे। बाद में इस मुद्दे पर चुप्पी साधकर हम आत्मसम्मान ही खोएंगे। हम सब अव्यवस्थाओं और अराजकताओं से खेल रहे हैं। पूरी राजनीतिक व्यवस्था दयनीय रूप से विभिन्न जिलों के माफिया गिरोहों की कृपा पर निर्भर है। ऐसे में परवीन आजाद एवं उसके परिजनों के जीवन की सुरक्षा एवं न्याय, मीडिया और इस मुद्दे को सार्वजनिक क्षेत्र में जिंदा रखने की उसकी क्षमता पर ही निर्भर करेगा।
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निर्भया पहली ऐसी पीड़िता नहीं, जिसकी सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। जियाउल हक भी उत्तर प्रदेश में माफिया तत्व द्वारा मारे जाने वाले पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं। लेकिन बढ़ते जनाक्रोश के कारण समय पहले से काफी बदल गया है। इसलिए जो भी जियाउल हक की हत्या के लिए जिम्मेदार होंगे, उन्हें अपराधों का दंड भुगतना पड़ेगा और जो उन्हें पनाह देंगे, उनका भी वही हश्र होगा। जनता की नाराजगी किसी एक पार्टी या नेता के प्रति नहीं है, बल्कि शासन की पूरी व्यवस्था पर लोगों की नजर है। मुलायम सिंह यादव मुश्किल में हैं, पर क्या वह अपनी पार्टी नेताओं की सुनेंगे? इसमें संदेह नहीं कि मायावती के शासन में राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति अच्छी थी। सपा सरकार केवल साख ही नहीं, बहुत कुछ खो सकती है, क्योंकि देश भर के लाखों लोगों ने टीवी पर समाचारों में इसे देखा है।  

ठीक यही स्थिति पंजाब में है। पिछले विधानसभा चुनाव में वहां प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे ने शानदार जीत हासिल की थी, लेकिन मात्र एक घटना से उनकी सारी चमक फीकी पड़ सकती है, क्योंकि वहां एक युवा महिला की सात पुलिसकर्मियों ने पिटाई की। वे इंसान थे या पशु? लाखों लोगों ने उस हिंसा को टेलीविजन पर देखा। न तो पंजाब में इस तरह की घटना नई है, और न ही पहली बार मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जाएंगे। लेकिन यह घटना अकाली दल और बादल परिवार की प्रतिष्ठा को धूमिल जरूर कर सकती है। निर्भया और जियाउल हक की हत्या की तरह वह युवा महिला और उसके बूढ़े पिता पंजाब पुलिस की बर्बरता के प्रतीक बन जाएंगे और यह घटना भुलाई नहीं जाएगी।

कई बार हम मीडिया के शोर से थक जाते हैं। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि आज केंद्र एवं राज्यों में गठबंधन राजनीति के दौर में मीडिया कुछ ही मिनटों में जनमत बनाता और उसे प्रेरित करता है, क्योंकि हजारों टेलीविजन चैनल, सैकड़ों पत्र-पत्रिकाएं एवं कई सारी सोशल नेटवर्किंग साइट खबरों को तेजी से प्रसारित करती हैं। अब जनता को सच्चाई जानने के लिए राजनेताओं के उपदेश एवं भाषणों की जरूरत नहीं रह गई है। आज कोई भी मीडिया या तथ्यों को अपने ढंग से निर्देशित नहीं कर सकता, वे भी नहीं, जो मीडिया प्रतिष्ठानों के मालिक हैं। बल्कि शासन के तीनों अंगों में से भी कोई जनमत की शक्ति की अनदेखी नहीं कर सकता।

मैं वाकई नहीं जानता कि क्या सच है और क्या गलत, लेकिन इतना जानता हूं कि कानून की अवहेलना किसी भी सत्ताधारी के हित में नहीं है। अखिलेश यादव और सुखबीर सिंह बादल ने पिछले विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की थी, लेकिन इन दो घटनाओं के चलते उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। यानी उनसे भारी उम्मीदें उनके प्रति गहन निराशा का कारण भी बन सकती हैं। हमारे कुछ युवा नेता अगर पिछले चुनावों में भारी जीत को अपनी इच्छा के मुताबिक शासन करने का व्यक्तिगत लाइसेंस मान बैठे हैं, तो यही उम्र उनके खिलाफ भी हो सकती है।


जाहिर है कि इस तरह की घटनाएं जनमत को बदल सकती हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, वैसे में मात्र दो या तीन फीसदी मतदाताओं के इधर-उधर जाने से किसी भी पार्टी का खेल बन या बिगड़ सकता है। सत्ता में रहने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि व्यवस्था उन्हें ही सलाम करती है, जो चौबीसों घंटे चौकस रहते हैं।

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