सोने का सपना
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अगर आप एक उत्साही क्रिकेट फैन हैं, तो आपको याद होगा कि 1990 के दशक में किसी भी क्रिकेट टूर्नामेंट में सबसे मजबूत मानी जाने वाली भारतीय क्रिकेट टीम, असल में, कागजी शेर साबित होती थी। जब बात असल खेल की होती थी, तो हमारे मुल्क में ऐसे जुनूनी समर्थकों की कोई कमी नहीं होती थी, जो उम्मीदों पर खरी न उतरने वाली टीम के प्रदर्शन की वजहें ढूंढा करते थे। प्रस्तावित स्वर्ण मुद्रीकरण योजना या सोना गिरवी रखने की योजना इसी पुरानी भारतीय क्रिकेट टीम की तरह है, जो कागज पर तो अच्छी दिख रही है, मगर जमीनी स्तर पर इसे लागू होने में कुछ दिक्कतें हैं।
बजट भाषण में इस योजना की घोषणा के लगभग तीन महीने बाद इसमें शामिल विभिन्न हितधारकों के मद्देनजर इस स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर चर्चा के लिए सरकार ने ड्राफ्ट पेश किया था। इसमें सबसे पहले सोना रखने वाले ग्राहक आते हैं, फिर इसका संग्रह करने वाली एजेंसियां या बैंक और फिर रिफाइनरीज, ज्वैलर्स और इसका दाम निर्धारित करने वाले विशेषज्ञ।
ऐसा महसूस होता है कि वह विचार, जिस पर यह योजना आधारित है, उसमें कुछ खामियां हैं। मसलन, घरों में लोग जो सोना रखते हैं, वह अमूमन गहनों के रूप में होता है, न कि ईंटों या सिक्कों के रूप में। जाहिर है कि अगर कोई व्यक्ति अपने घर में मौजूद गहनों से पैसा बनाने की सोचता है, तो यह केवल तभी मुमकिन हो सकेगा, जब उन गहनों को पिघलाकर ईंटों या सिक्कों में ढाला जाए। इसके अलावा इस योजना में यह भी साफ नहीं किया गया है कि जब इसके तहत कोई करदाता अपना सोना जमा करेगा, तो कर विभाग का इस पर क्या रुख होगा। उच्च करदाता वर्ग में शामिल उस करदाता की हालत सोच कर देखिए, जो वर्षों से अपना कर जमा कर रहा है, और जब वह 600 ग्राम सोना जमा करेगा, तो कर विभाग का उसके प्रति क्या रवैया होगा। आयकर विभाग के अधिकारी ऐसे शख्स को जरूर संदेह की नजर से देखेंगे। इस बात की भी पूरी आशंका होगी, कि ऐसे करदाताओं को परेशान किया जाएगा। अगर दूसरी तरह से देखें, तो यह योजना मनी लॉन्डरिंग योजना की तरह भी बन सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस योजना में पूंजीगत लाभों पर साफ तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। कइयों का तो यहां तक मानना है कि इस योजना में पूंजीगत लाभ की कोई संभावना नहीं है। दरअसल, पूंजीगत लाभ की स्थिति तब होती है, जब योजना के तहत जमा किए गए सोने या गहनों को संपत्ति का अंतरण समझा जाता है। इस स्थिति में होने वाले पूंजीगत लाभ को पूर्व-जमा पूंजीगत लाभ कहा जाता है। इस योजना में सोना जमा करने की तिथि के बाद होने वाले पूंजीगत लाभ को मुक्त रखा गया है, जिसे जमा करने के बाद का पूंजीगत लाभ कहा जाता है। दूसरी ओर, पूर्व-जमा पूंजीगत लाभों पर कर लगता रहेगा। यह बेहद जटिल मुद्दा है, जिस पर ध्यान देना होगा।
इसके बावजूद ड्राफ्ट योजना मानती है कि सोने की शुद्धता की जांच का परीक्षण पूरा हो जाने के बाद उपभोक्ता वहां मौजूद रहेगा। हालांकि अगर बैंक के पास गहनों को एकत्रित करने और उन्हें परीक्षण के लिए भेजने की अपने बोर्ड से स्वीकृत प्रक्रिया हो, और उपभोक्ता को अपने बैंक पर भरोसा हो, तो भी उपभोक्ताओं के पास यह विकल्प रहना ही चाहिए। हालांकि मेरी समझ यह कहती है कि जब जमा करने के लिए अपने गहनों की जांच की बात आएगी, तो उपभोक्ता किसी पर भरोसा नहीं करेगा, फिर चाहे वह बैंक ही क्यों न हो।
एक दूसरी बात, जो इस योजना पर संशय पैदा करती है, वह यह है कि इसमें जमा किए गए सोने पर ब्याज दर तय करने का फैसला बैंक पर छोड़ देने का प्रावधान है। ज्यादातर भारतीयों की सोच यह होती है कि जमा पर रिटर्न कितना मिलेगा। मगर, इस योजना में इस मामले में कुछ भी साफ नहीं है। इस योजना में एक और तकनीकी दिक्कत भी है। जो गहने जमा किए जाएंगे, उसे पिघलाकर सोना बनाया जाएगा। इसमें जमा करने वाले व्यक्ति को कुछ प्रतिशत सोने का नुकसान उठाना पड़ेगा। फिर भविष्य में जब वह अपना सोना वापस लेकर उससे फिर से गहने बनवाएगा, तो एक बार फिर उसे सोने की मात्रा के मामले में कुछ फीसदी का नुकसान उठाना पड़ेगा। ऐसे में जिस भारतीय मध्यवर्ग के लिए इस योजना को काफी फायदेमंद बताया जा रहा है, सबसे ज्यादा मुश्किलें उसी पर आने वाली हैं।
गौरतलब है कि उपभोक्ताओं के लिए गोल्ड लोन पहले से उपलब्ध है। जब उपभोक्ताओं को प्रस्तावित योजना से ज्यादा फायदा उसमें दिख रहा है, तो कोई इस योजना में दिलचस्पी क्यों दिखाएगा? दरअसल, अब सोने के दाम में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिलने लगा है, इसलिए गोल्ड लोन देते वक्त भी आजकल अमूमन एक वर्ष का जोखिम कवर किया जाता है। प्रस्तावित योजना को दीर्घकालीन फायदे का बताया जा रहा है, मगर कोई बैंक सोने की हालिया प्रकृति को देखते हुए जोखिम क्यों लेना चाहेगा? ऐसे में, इस योजना को लेकर कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है।
गहनों को बनाने में जो सोना उपयोग किया जाता है, उसकी गुणवत्ता में काफी अंतर होता है। ऐसे में, सोने का दाम लगाने वाले विशेषज्ञ के सामने चुनौती आसान नहीं होगी। फिर, कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि उनका सोना काफी पुराना (एंटीक) है, पर दाम करते वक्त इस पर ध्यान नहीं दिया गया, जिस वजह से उन्हें सोने का उचित मूल्य नहीं मिला। इन कमियों के बावजूद इससे कोई इन्कार नहीं कि इस योजना के पीछे सरकार का इरादा नेक है। जरूरत बस इतनी है कि योजना को अंतिम रूप देने से पहले कुछ व्यावहारिक खामियों को दुरुस्त्ा कर दिया जाए। अगर यह योजना कामयाब रहती है, तो भारत को अपना घाटा कम करने में मदद मिलेगी, और इससे अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
-लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं