नजरिया: इस युद्ध को नैतिकता में मत उलझाइए, गाजा के मलबे में दबे हैं ऐसे कई सवाल
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विस्तार
आखिर कब न्याय के लिए लड़ा जा रहा एक युद्ध युद्धोन्माद के हताशापूर्ण संघर्ष में बदल जाता है? करीब दो वर्ष पहले हमास के आतंकियों द्वारा इस्राइल में नरसंहार के बाद गाजा में युद्ध शुरू हुआ। इस्राइलियों को बंधक बनाया गया। बाद में कई बंधक इस्राइल को लौटाए गए, तो कई हमास की कैद में ही खत्म हो गए। एक अनुमान के अनुसार, इस युद्ध में अब तक करीब 60 हजार फलस्तीनी मारे गए हैं और गाजा मलबे के ढेर में बदल गया है। जब वहां अकाल की स्थितियां पैदा होने लगीं, तो भोजन की कतारों में खड़े बच्चे स्वाभाविक ही दुनिया की अंतरात्मा को कचोटने लगे। फिर क्या था, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने धमकी दे डाली कि उनका देश महासभा में एक फलस्तीनी राज्य को मान्यता देगा। यहां तक कि इस्राइल के पारंपरिक रूढ़िवादी भी गाजा पर इस्राइल के निरंतर कब्जे पर सवाल उठाने लगे हैं, जहां आतंकी संगठन हमास के शीर्ष नेतृत्व का पहले ही सफाया हो चुका है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या न्याय के लिए लड़ा जा रहा एक युद्ध अब एक राजनीतिक रूप से कमजोर प्रधानमंत्री और उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों का युद्ध बन गया है, जिसका अंतिम लक्ष्य इस्राइली निगरानी में हमास-मुक्त गाजा बनाना है? गाजा के मलबे में नैतिकता अब भी एक विवाद है।
यह स्थिति तो कुछ जानी-पहचानी लगती है। हम पहले भी इस दौर से गुजर चुके हैं, जब न्याय की एक लचीली नैतिक परिभाषा हुआ करती थी। जरा याद करें, बगदाद के पास सामूहिक विनाश के हथियार होने का तब कोई सुबूत नहीं था, फिर भी अमेरिका ने इराक पर हमला किया था।
नव-रूढ़िवादी नैतिक राजनीति की शक्ति सीमाओं को चुनौती देने और जनता के अविश्वास पर विजय पाने में सक्षम थे। यह वह समय था, जब विचाराधारात्मक प्रतिबद्धता सत्ता-परिवर्तन के खिलाफ प्रतिरोध का सामना कर सकती थी। अंत में, सद्दाम हुसैन के बगैर भी अराजक इराक, जहां के कबीलाई और पंथों में बंटे हालात स्वतंत्रता की भावना को नकार रहे थे, अमेरिकी आदर्शवाद का सामूहिक भ्रम फैला रहे थे।
फिर भी खुशी की एक वजह थी। सद्दाम को हटाना अपने आप में महत्वपूर्ण था, जिनकी तानाशाही ‘भय के गणराज्य’ के रूप में कुख्यात थी। तब अमेरिका राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियों का सामना नहीं कर सका। इराक के युद्ध ने स्वतंत्रता के दलदल में अपनी मूल न्यायसंगतता खो दी।
जो बाइडन ने जब अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ा, तब एक बार फिर अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ अपने युद्ध के नैतिक आधार को ध्वस्त किया। ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाले अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले करके बाइडन के अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय नैतिकता में अमेरिकावाद की सर्वोत्तम भावना को नकार दिया था।
अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप का एक न्यायसंगत कारण था। अन्याय तो अलबत्ता तब हुआ, जब वाशिंगटन ने तालिबान की वापसी की योजना बनाई और अच्छे व बुरे तालिबान के भ्रम में फंसते हुए अफगानिस्तान को मध्ययुगीन कट्टरता के हवाले छोड़ दिया। आधा-अधूरा राष्ट्र कभी राष्ट्र निर्माण का विकल्प नहीं हो सकता। न्याय के लिए होने वाले युद्ध इस नैतिक सूत्र का पालन क्यों नहीं करते?
गाजा पर भी, नैतिक सवालों का जवाब अलग तरह से दिया गया। छिपे और बेशर्म, दोनों ही प्रकृति वाले यहूदी विरोध और फलस्तीनी संघर्ष के अमर रोमांस ने इन जवाबों को प्रभावित किया है। सात अक्तूबर, 2023 के हमले की जहां सार्वभौमिक रूप से निंदा की गई, वहीं कुछ उदाहरणों में इसे इस सोच से संतुलित किया गया कि इस्राइल की उत्पत्ति और स्वतंत्रता के लिए फलस्तीनियों के निरंतर संघर्ष ने नरसंहार को अपरिहार्य बना दिया था। आतंक और संघर्ष के परिमाण की तुलना ने इस्राइली प्रतिक्रिया को जरूरत से कहीं अधिक बड़ा अपराध बना दिया।
हमास के खिलाफ युद्ध यकीनन न्यायसंगत था, क्योंकि इस्राइल एक ऐसे संगठन के विरुद्ध लड़ रहा था, जिसने न केवल उसे अस्तित्व के अधिकार से वंचित किया, बल्कि गाजावासियों को भी शस्त्रागार की तरह इस्तेमाल किया। इसे मानवाधिकारों या फलस्तीनियों की स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं था, उसका असली उद्देश्य तेहरान की मदद से जिहाद को जारी रखना था। फलस्तीन के संघर्ष को पहले ही एक इस्लामी युद्ध के रूप में बदल दिया गया है।
हमास हमेशा से जानता था कि वह इस्राइल को सैन्य रूप से नहीं हरा सकता। वह केवल गाजा को एक मानवीय संकट में डालकर ही जीत सकता था, जिसकी बदौलत पूरी दुनिया इस्राइल के खिलाफ खड़ी हो जाए। भोजन की कतार में खड़े बच्चों का वह हृदयविदारक दृश्य हमास का अंतिम हथियार है। आज जो गाजा में हो रहा है, वह उस फलस्तीन के बारे में नहीं है, जिसके लिए अराफात ने एक बेघर राजनेता के रूप में अभियान चलाया था। जो नया मुक्तिदाता है, वह सुरंगों में छिपता है और गाजावासियों को मानव ढाल बनाकर अपनी रक्षा करता है। हमास इस्राइल को वैश्विक धारणा (ग्लोबल परसेप्शन) के युद्ध क्षेत्र में हराने की उम्मीद करता है और वह एक तरह से कामयाब भी हो रहा है।
क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि इस्राइल को गाजा में खुद को हारने देना चाहिए, जहां हमास अब भी कई लोगों को बंधक बनाए हुए है? दरअसल, इस्राइल के लिए यह युद्ध जीतना जरूरी है, लेकिन सिर्फ
बुरी तरह से अपंग हमास ही इसकी गारंटी नहीं देगा। अगर गाजा का फिर से मानवीयकरण करना है, तो इसकी जिम्मेदारी इस्राइल को ही उठानी होगी, लेकिन गाजा को अपने हाल पर छोड़ कर नहीं। फलस्तीनी संघर्ष की प्रकृति पर केवल अरबों की आम सहमति ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि गाजा के पुनर्निर्माण के बाद हमास को फिर से उभरने का मौका नहीं मिलना चाहिए। करीब दो साल पहले शुरू हुआ न्याय-युद्ध उसी नैतिक स्पष्टता के साथ खत्म होना चाहिए। हमास के लिए यह दूसरा मौका नहीं, बल्कि फलस्तीन के लिए कट्टरपंथी इस्लाम से अपने संघर्ष को मुक्त करने का आखिरी मौका जरूर होगा।