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डॉलर की पकड़ ऐसे खत्म नहीं होगी: भू-राजनीति के बीच अमेरिकी मुद्रा पर लगातार बढ़ रहा दबाव
सार
जब चतुर भू-राजनीति को चतुर अर्थशास्त्र का सहारा मिला, तब 1974 में अमेरिका व सऊदी अरब के बीच समझौते से दुनिया की रिजर्व मुद्रा के तौर पर डॉलर के दबदबे की नींव पड़ी। अमेरिकी मनमानी और होर्मुज संकट ने चीनी युआन और क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान और डॉलर के पतन की चर्चाओं को हवा दी, लेकिन यह इतना आसान नहीं है।
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डॉलर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
होर्मुज जलडमरूमध्य 2026 में भू-राजनीति का केंद्र बन गया है। पिछले दिनों हमने देखा कि जब भी ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों को रोकने या अनुमति देने के लिए अपनी सैन्य ताकत दिखाता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था सहम जाती है। जब भी अमेरिका और ईरान के बीच शब्दों और मिसाइलों का आदान-प्रदान होता है, तो हर धमकी के साथ अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है।
पिछले हफ्ते बैंकरों, बीमा कंपनियों और उन देशों को, जो अपने जहाजों को इस मार्ग से गुजारना चाहते थे, एक नई भुगतान प्रणाली के बारे में पता चला। यह प्रणाली ईरानियों ने उन जहाजों के लिए शुरू की है, जो यहां से आवाजाही करना चाहते हैं। इसके तहत दो विकल्प दिए गए हैं। पहला, 20 लाख डॉलर की रकम चीनी युआन में भुगतान करें। दूसरा, 20 लाख डॉलर क्रिप्टोकरेंसी में दें। पिछले हफ्ते शनिवार तक, मुश्किल से एक दर्जन जहाज ही यहां से गुजर पाए, जिनमें से कई ईरान से जुड़े हुए थे। फिर अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से निकलने वाले जहाजों की नाकेबंदी का आदेश दे दिया। खबर है कि कुछ जहाज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। युआन या क्रिप्टोकरेंसी में जमा की गई रकम का अब तक कोई रिकॉर्ड नहीं है। ईरान द्वारा दी गई चुनौती ने एक बार फिर डॉलर के पतन की चर्चाओं को जन्म दिया है।
दुनिया की रिजर्व मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की भूमिका की नींव 20 जुलाई, 1974 को सऊदी अरब में हुए एक समझौते के साथ पड़ी थी। अमेरिका ने सऊदी अरब को आपसी लेनदेन का एक प्रस्ताव दिया। इसमें कहा गया कि सऊदी अरब कच्चे तेल के हर बैरल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करेगा, और इसके बदले में अमेरिकी सरकार सऊदी शासन को सुरक्षा की गारंटी देगी। चतुर भू-राजनीति को चतुर अर्थशास्त्र का सहारा मिला। तेल की वैश्विक मांग और डॉलर के वैश्विक मूल्य-निर्धारण ने डॉलर के वर्चस्व को और भी मजबूत कर दिया। पांच दशकों बाद, संप्रदाय-आधारित वर्चस्व और वैश्विक मुद्रा के विचार अपनी चमक खो रहे हैं। भू-राजनीति वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ रही है। चीन कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो हर दिन 168 लाख बैरल तेल की खपत करता है। इसका ज्यादातर हिस्सा (37 प्रतिशत) होर्मुज के रास्ते से ही आता है। ईरान और सऊदी अरब से खरीदे गए तेल का भुगतान चीन युआन में करता है। रूस और चीन के बीच व्यापार भी युआन में होता है, जबकि भारत से होने वाला व्यापार अक्सर रुपये में होता है। पेट्रो-डॉलर के प्रभाव क्षेत्र को अब पेट्रो-युआन से चुनौती मिल रही है। भुगतान में आया यह ढांचागत बदलाव एक और बदलाव को बढ़ावा दे रहा है कि देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को कैसे रख रहे हैं।
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2001 में, केंद्रीय बैंकों के 72 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डॉलर में रखे हुए थे। 2026 में, सिर्फ 56.7 प्रतिशत भंडार ही अमेरिकी मुद्रा में रखा है, जो पिछले 30 वर्षों में सबसे कम है। वर्ष 2022 से केंद्रीय बैंक (खासकर भारत और चीन के) बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए सोना संपत्ति का सबसे बड़ा भंडार बन गया है और उसने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। सोने की कीमतों में बढ़ोतरी से इसके मूल्य और खरीद, दोनों में ही तेजी आई है। केंद्रीय बैंक हर साल लगभग 1,000 टन सोना जमा कर रहे हैं। सोने की इस खरीदारी की वजह से रिजर्व में डॉलर का औसत हिस्सा 12 प्रतिशत कम हो गया।
डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए खुले और छिपे, दोनों तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं-अमेरिका की मनमानी नीतियों से जुड़े जोखिम को कम करना और निवेश में विविधता लाना। रूस के 300 अरब डॉलर के रिजर्व को फ्रीज किए जाने के बाद, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं अब दूसरे विकल्पों, यानी ‘किसी भी आपात स्थिति के लिए’ वैकल्पिक उपायों की गुंजाइश बना रही हैं। इसी कारण, कई देश अब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बेच रहे हैं। भारत उन देशों में शामिल था, जो अपनी होल्डिंग्स बेच रहे थे। जनवरी में उसकी अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स 247 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर से 26 प्रतिशत गिरकर पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं। इस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा से मुलाकात की। इस मुलाकात का मकसद साफ तौर पर नहीं बताया गया है, लेकिन ‘डॉलर छोड़ो’ आंदोलन के बढ़ते दायरे को देखते हुए, यह कोई रहस्य नहीं रह जाता। कुछ हफ्तों बाद, मल्होत्रा ने कहा कि भारत अमेरिकी सरकारी बॉन्ड नहीं बेच रहा है। स्थानीय मुद्रा में भुगतान करने से, जैसा कि भारत ने पहले भी किया है और अब भी कर रहा है, आयातित महंगाई पर लगाम लगती है। दशकों से वे देश, जो डॉलर का बोझ उठा रहे हैं, प्रतिस्पर्धी विकल्प बनाने या उन पर विचार करने की आकांक्षा रखते आए हैं। यह भी उतना ही सच है कि डॉलर की ‘मौत’ की बात हमेशा से ही एक अतिशयोक्ति रही है। ये ऐसी घोषणाएं और इच्छाएं थीं, जो केवल उम्मीद में लिपटी हुई थीं।
जब से जॉन मेनार्ड कीन्स और अर्न्स्ट एफ शूमाकर ने 1942 में एक वैश्विक मुद्रा (बैंकर) का विचार पेश किया, तब से दुनिया में एक वैश्विक मुद्रा की चाह बनी हुई है। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद से यह चाह और भी बढ़ गई है। लेकिन डॉलर का दबदबा उसके विशाल आकार और भू-राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता के कारण बना हुआ है। जो लोग डॉलर का विरोध करते हैं, वे आपस में भी एक-दूसरे के विरोधी हैं। ब्रिक्स की जिस मुद्रा की इतनी चर्चा हो रही है, उसके लिए चीन और भारत, दोनों का एकमत होना जरूरी है। वैश्विक मुद्रा की चाहत के रास्ते में वे चुनौतियां भी आड़े आती हैं, जिनका सामना उसे करना होगा।
अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत ने डॉलर को एक सुरक्षित ठिकाने के तौर पर स्थापित कर दिया है। अमेरिका ने वैश्विक नेतृत्व का बोझ उठाया है, जबकि दूसरों ने ऐसा नहीं किया। येन, वॉन, यूरो और अब युआन उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं, क्योंकि उनमें बाजारों में जरूरी कद और गहराई की कमी है। लेनिन ने पूंजीवाद को खत्म करने के लिए मुद्रा के अवमूल्यन की वकालत की थी। प्रतिबंधों और टैरिफ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना इसी का रास्ता बना रहा है। लेनिन ने यह भी कहा था, ‘कुछ हफ्ते ऐसे होते हैं, जिनमें दशकों के बराबर बदलाव आ जाते हैं।’ देखते रहिए, आगे क्या-क्या होता है!
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पिछले हफ्ते बैंकरों, बीमा कंपनियों और उन देशों को, जो अपने जहाजों को इस मार्ग से गुजारना चाहते थे, एक नई भुगतान प्रणाली के बारे में पता चला। यह प्रणाली ईरानियों ने उन जहाजों के लिए शुरू की है, जो यहां से आवाजाही करना चाहते हैं। इसके तहत दो विकल्प दिए गए हैं। पहला, 20 लाख डॉलर की रकम चीनी युआन में भुगतान करें। दूसरा, 20 लाख डॉलर क्रिप्टोकरेंसी में दें। पिछले हफ्ते शनिवार तक, मुश्किल से एक दर्जन जहाज ही यहां से गुजर पाए, जिनमें से कई ईरान से जुड़े हुए थे। फिर अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से निकलने वाले जहाजों की नाकेबंदी का आदेश दे दिया। खबर है कि कुछ जहाज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। युआन या क्रिप्टोकरेंसी में जमा की गई रकम का अब तक कोई रिकॉर्ड नहीं है। ईरान द्वारा दी गई चुनौती ने एक बार फिर डॉलर के पतन की चर्चाओं को जन्म दिया है।
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दुनिया की रिजर्व मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की भूमिका की नींव 20 जुलाई, 1974 को सऊदी अरब में हुए एक समझौते के साथ पड़ी थी। अमेरिका ने सऊदी अरब को आपसी लेनदेन का एक प्रस्ताव दिया। इसमें कहा गया कि सऊदी अरब कच्चे तेल के हर बैरल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करेगा, और इसके बदले में अमेरिकी सरकार सऊदी शासन को सुरक्षा की गारंटी देगी। चतुर भू-राजनीति को चतुर अर्थशास्त्र का सहारा मिला। तेल की वैश्विक मांग और डॉलर के वैश्विक मूल्य-निर्धारण ने डॉलर के वर्चस्व को और भी मजबूत कर दिया। पांच दशकों बाद, संप्रदाय-आधारित वर्चस्व और वैश्विक मुद्रा के विचार अपनी चमक खो रहे हैं। भू-राजनीति वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ रही है। चीन कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो हर दिन 168 लाख बैरल तेल की खपत करता है। इसका ज्यादातर हिस्सा (37 प्रतिशत) होर्मुज के रास्ते से ही आता है। ईरान और सऊदी अरब से खरीदे गए तेल का भुगतान चीन युआन में करता है। रूस और चीन के बीच व्यापार भी युआन में होता है, जबकि भारत से होने वाला व्यापार अक्सर रुपये में होता है। पेट्रो-डॉलर के प्रभाव क्षेत्र को अब पेट्रो-युआन से चुनौती मिल रही है। भुगतान में आया यह ढांचागत बदलाव एक और बदलाव को बढ़ावा दे रहा है कि देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को कैसे रख रहे हैं।
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2001 में, केंद्रीय बैंकों के 72 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डॉलर में रखे हुए थे। 2026 में, सिर्फ 56.7 प्रतिशत भंडार ही अमेरिकी मुद्रा में रखा है, जो पिछले 30 वर्षों में सबसे कम है। वर्ष 2022 से केंद्रीय बैंक (खासकर भारत और चीन के) बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए सोना संपत्ति का सबसे बड़ा भंडार बन गया है और उसने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। सोने की कीमतों में बढ़ोतरी से इसके मूल्य और खरीद, दोनों में ही तेजी आई है। केंद्रीय बैंक हर साल लगभग 1,000 टन सोना जमा कर रहे हैं। सोने की इस खरीदारी की वजह से रिजर्व में डॉलर का औसत हिस्सा 12 प्रतिशत कम हो गया।
डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए खुले और छिपे, दोनों तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं-अमेरिका की मनमानी नीतियों से जुड़े जोखिम को कम करना और निवेश में विविधता लाना। रूस के 300 अरब डॉलर के रिजर्व को फ्रीज किए जाने के बाद, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं अब दूसरे विकल्पों, यानी ‘किसी भी आपात स्थिति के लिए’ वैकल्पिक उपायों की गुंजाइश बना रही हैं। इसी कारण, कई देश अब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बेच रहे हैं। भारत उन देशों में शामिल था, जो अपनी होल्डिंग्स बेच रहे थे। जनवरी में उसकी अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स 247 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर से 26 प्रतिशत गिरकर पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं। इस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा से मुलाकात की। इस मुलाकात का मकसद साफ तौर पर नहीं बताया गया है, लेकिन ‘डॉलर छोड़ो’ आंदोलन के बढ़ते दायरे को देखते हुए, यह कोई रहस्य नहीं रह जाता। कुछ हफ्तों बाद, मल्होत्रा ने कहा कि भारत अमेरिकी सरकारी बॉन्ड नहीं बेच रहा है। स्थानीय मुद्रा में भुगतान करने से, जैसा कि भारत ने पहले भी किया है और अब भी कर रहा है, आयातित महंगाई पर लगाम लगती है। दशकों से वे देश, जो डॉलर का बोझ उठा रहे हैं, प्रतिस्पर्धी विकल्प बनाने या उन पर विचार करने की आकांक्षा रखते आए हैं। यह भी उतना ही सच है कि डॉलर की ‘मौत’ की बात हमेशा से ही एक अतिशयोक्ति रही है। ये ऐसी घोषणाएं और इच्छाएं थीं, जो केवल उम्मीद में लिपटी हुई थीं।
जब से जॉन मेनार्ड कीन्स और अर्न्स्ट एफ शूमाकर ने 1942 में एक वैश्विक मुद्रा (बैंकर) का विचार पेश किया, तब से दुनिया में एक वैश्विक मुद्रा की चाह बनी हुई है। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद से यह चाह और भी बढ़ गई है। लेकिन डॉलर का दबदबा उसके विशाल आकार और भू-राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता के कारण बना हुआ है। जो लोग डॉलर का विरोध करते हैं, वे आपस में भी एक-दूसरे के विरोधी हैं। ब्रिक्स की जिस मुद्रा की इतनी चर्चा हो रही है, उसके लिए चीन और भारत, दोनों का एकमत होना जरूरी है। वैश्विक मुद्रा की चाहत के रास्ते में वे चुनौतियां भी आड़े आती हैं, जिनका सामना उसे करना होगा।
अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत ने डॉलर को एक सुरक्षित ठिकाने के तौर पर स्थापित कर दिया है। अमेरिका ने वैश्विक नेतृत्व का बोझ उठाया है, जबकि दूसरों ने ऐसा नहीं किया। येन, वॉन, यूरो और अब युआन उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं, क्योंकि उनमें बाजारों में जरूरी कद और गहराई की कमी है। लेनिन ने पूंजीवाद को खत्म करने के लिए मुद्रा के अवमूल्यन की वकालत की थी। प्रतिबंधों और टैरिफ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना इसी का रास्ता बना रहा है। लेनिन ने यह भी कहा था, ‘कुछ हफ्ते ऐसे होते हैं, जिनमें दशकों के बराबर बदलाव आ जाते हैं।’ देखते रहिए, आगे क्या-क्या होता है!