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चुनाव को लौह दीवार न बनाएं

Tue, 12 Mar 2019 06:25 PM IST
Raman Singh अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Published by: Raman Singh Updated Tue, 12 Mar 2019 06:25 PM IST
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Do not make the election iron wall
अवधेश कुमार

चुनाव हमारे लोकतंत्र की धमनी और रक्त, दोनों है। यदि हमारे प्रतिनिधि अपराधी और भ्रष्टाचारी होंगे, तो फिर वे देश की कैसी नियति बनाएंगे, यह सबको पता है। इसलिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे अपराधी और भ्रष्टाचारी लोग उम्मीदवार ही न बन सकें और अगर बनें भी, तो उनके बारे में मतदाताओं को पूरी जानकारी हो जाए, ताकि वे मतदान करते समय सतर्क रहें और सोच-समझकर अपने मत का इस्तेमाल करें। चुनाव सुधार को लेकर चुनाव आयोग ने पिछले ढाई दशकों में जो कदम उठाए उनका आम तौर पर स्वागत किया गया।


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इस बार चुनाव की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग ने दो नई व्यवस्थाएं दी हैं। उम्मीदवार बनने के लिए पैन कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है। इससे यह माना जा रहा है कि उसके आधार पर उनके आय-व्यय एवं बैक आदि में जमा राशियों का पूरा विवरण आसानी से उपलब्ध हो सकेगा। उसने यह भी आदेश दिया है कि उम्मीदवार चुनाव प्रक्रिया के बीच तीन बार अपने ऊपर चल रहे मुकदमों का प्रमुख टीवी चैनल एवं समाचार पत्र में विज्ञापन देंगे।

पहली नजर में ये कदम अच्छे लगते हैं। किंतु जरा इसके दूसरे पहलुओं पर सोचिए। चुनाव प्रक्रिया सरल, सहज और आसान होनी चाहिए, ताकि निचले पायदान पर बैठा आम आदमी भी आसानी से उम्मीदवार बन सके। लेकिन चुनाव सुधार के नाम पर कई ऐसे कदम उठाए गए हैं, जो चुनाव को जटिल और कठिन बना रहे हैं। इन्हीं दो आदेशों को लीजिए। हमारे लिए पैन कार्ड एकदम सामान्य चीज है। किंतु अब भी गांवों एवं कस्बों में ऐसे लोगों की भारी संख्या है, जिनके पास पैन कार्ड नहीं और उनको इसकी जरूरत भी महसूस नहीं होती। किंतु वे स्थानीय समाज के लिए उपयोगी हो सकते हैं और अपने स्तर पर अनेक मामलों में नेतृत्व भी करते हैं। अगर उनको चुनाव लड़ना है, तो पहले पैन कार्ड बनवाना होगा। जितना आसान हमें शहरों में पैन कार्ड बनवाना लगता है, उतना हर जगह है नहीं।

चुनाव आयोग तथा अव्यावहारिक बुद्धिजीवियों एवं मीडिया के एक बड़े वर्ग की कृपा से ऐसा माहौल बना है, मानो जिस किसी पर मुकदमा हो वह अपराधी ही होगा। अनेक सस्थाएं उम्मीदवारों के शपथपत्र के आधार पर रिपोर्ट बनाती हैं कि किस पार्टी ने कितने आपराधिक रिकॉर्ड वालों को टिकट दिया। फिर परिणाम आने के बाद संसद एवं विधानसभाओं के बारे में बताया जाता है कि इनमें इतने आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद-विधायक हैं, इतने पर संगीन अपराध हैं। उदाहरण के लिए, 16 वीं लोकसभा के बारे में आंकड़ा है कि इसमें 179 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। हम कभी नहीं सोचते कि जो भी व्यक्ति जनता के मुद्दों पर संघर्ष और आंदोलन करके आगे आएगा, उस पर मुकदमा होना असामान्य नहीं है।

आज भी हम पुराने दौर के नेताओं के बारे में फक्र से कहते हैं कि वे अपने जीवन में इतनी बार जेल गए। उन्हें अपने पूरे जीवन में मुकदमों के कारण न्यायालयों का चक्कर लगाते रहना पड़ा, फिर भी उन्होंने जनसंघर्ष का रास्ता नहीं त्यागा। आज की धारणा में तो वे सब अपराधी हो गए! जरा सोचिए, मुख्य टीवी चैनल एवं समाचार पत्र में एक विज्ञापन का खर्च कितना आएगा? तीन बार कौन विज्ञापन दे सकता है? आप बेहतर इरादे से कहीं ऐसी लौह दीवार तो नहीं खड़ी कर रहे हैं, जिनसे चुनाव का मैदान बिना घोषणा किए विशेष लोगों तक ही सीमित हो जाए। हमको ऐसी खुली चुनाव प्रणाली चाहिए, जिसमें सहज तरीके से आम जुझारू, संघर्षशील जनता के साथ जुड़ा हुआ कार्यकर्ता भी उम्मीदवार बने और विजयी हो।

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