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बांटने वाले भाषण : हिजाब, हलाल और अजान से जुड़े विवाद समाज-समुदायों में बढ़ा रहे दूरियां

Sun, 17 Apr 2022 07:17 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 17 Apr 2022 07:17 AM IST
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सार
नफरती भाषा ने कुछ राज्यों, खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में सारी सीमाएं लांघ दी है। बार-बार सीमाएं लांघने वाले एक यति नरसिंहानंद हैं, जो कि डासना के मंदिर में पुजारी हैं। पिछले साल हरिद्वार में एक हिंदू धार्मिक सभा में उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया, मगर कुछ हफ्ते बाद ही जमानत पर उनकी रिहाई हो गई।
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Distributive speech: Disputes related to Hijab, Halal and Azan are increasing the distance in the society and communities
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विस्तार

हिजाब, हलाल और अजान से जुड़े विवादों ने कर्नाटक राज्य को झकझोर कर रख दिया है। ये विवाद राज्य में 2023 में होने वाले चुनाव से पहले कर्नाटक के लोगों को दो खेमों- हिंदू और मुस्लिम, में बांटने के लिए सावधानीपूर्वक पैदा किए गए हैं।
  • हिजाब एक परिधान है, जिसे लड़की/महिला अपने घर से बाहर निकलते समय अपने सिर पर पहनती है। उत्तर भारत की महिलाएं, सिख महिलाएं, ईसाई नन और अन्य लोग (सिख पुरुषों सहित) भी अपने सिर ढकते हैं। 
  • हलाल मांस इस्लामी कानून के अनुसार, गले की नस या श्वासनली को काटकर और सारा खून बहाकर जानवरों या मुर्गे को मारने से प्राप्त होता है। अन्य धर्मों में भी भोजन तैयार करने के नियम हैं : यहूदी धर्म कोषेर भोजन को मान्यता देता है और हिंदू धर्म के कई उप वर्ग अपने कुछ खास नियमों के तहत भोजन तैयार करते हैं।
  • अजान मस्जिदों से दिन में पांच बार अक्सर लाउडस्पीकर से प्रसारित प्रार्थना का आह्वान है। हिंदुओं और ईसाइयों के धार्मिक स्थलों में घंटियां बजाई जाती हैं। हिंदू धार्मिक त्योहारों में अक्सर धार्मिक ग्रंथों का पाठ किया जाता है या भक्ति संगीत बजाया जाता है और इसमें लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल होता है।
 सदियों का सह अस्तित्व
हिजाब, हलाल और अजान कोई नई प्रथाएं नहीं हैं। भारत में इस्लाम के आने के समय से ये इस्लाम का हिस्सा हैं। कर्नाटक (और पुराने मैसूर साम्राज्य) के लोगों ने इन प्रथाओं को सदियों पहले स्वीकार किया था; किसी ने उन पर आपत्ति नहीं जताई, और न ही मुस्लिमों ने हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों का विरोध किया। संक्षेप में कहें तो हिंदू, मुस्लिम और ईसाई- साथ ही अन्य धर्मों को मानने वाले- एक दूसरे के साथ शांतिपूर्ण सह अस्तिव के साथ रहते आए हैं।

भाजपा के कर्नाटक में आने से पहले तक ऐसा ही था। भाजपा ने कर्नाटक में गठबंधन कर या फिर अकेले ही कई बार शासन किया है। हाल के वर्षों में उसने अन्य दलों के विधायकों को प्रलोभन के दम पर अपने पक्ष में तोड़कर शासन किया है, जिसे ऑपरेशन लोटस या ऑपरेशन कमल कहा गया। भाजपा को 2023 में चुनाव का सामना करना है। उसकी सरकारों का प्रदर्शन खराब रहा है और कर्नाटक में उसकी स्थिति अच्छी नहीं है। विपक्षी दलों ने ऑपरेशन लोटस का मुकाबला करने के लिए सुरक्षात्मक दीवारें बनाना सीख लिया है। इसलिए, एक अन्य आख्यान खड़ा करने की जरूरत पड़ गई है, जो कि मतों का ध्रुवीकरण करे और बहुसंख्यक हिंदू मतों को आकर्षित कर सके। भाजपा के पास ऐसी पर्याप्त प्रतिभाएं हैं, जो राज्य-विशिष्ट रणनीति बनाने की क्षमता रखती हैं : ऐसी ही एक रणनीति के तहत कर्नाटक में भोजन, परिधान और प्रार्थना को लेकर विवादों को जान-बूझकर हवा दी गई है।  

स्कूलों और कॉलेजों में राज्य सरकार द्वारा अचानक हिजाब पर लगाए गए प्रतिबंध को अदालत में चुनौती दी गई। कर्नाटक हाई कोर्ट की पूर्ण बेंच ने इस सवाल पर 'क्या हिजाब पहनना धार्मिक प्रथा के अनुसार अनिवार्य है' विचार किया, और फिर फैसला दिया, नहीं। यह सवाल ही अप्रासंगिक था। एकमात्र प्रासंगिक सवाल यह था कि क्या राज्य को हिजाब पर प्रतिबंध लगाने, और इस तरह मुस्लिम विद्यार्थी के निजता के अधिकार और शिक्षा के उसके अधिकार का उल्लंघन करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर अपील की गई है और यह उम्मीद की जा रही है कि वास्तविक मुद्दों पर विचार किया जाएगा और उनका समाधान किया जाएगा।

नफरत फैलाने वाले भाषण
ऐसे विवाद घृणा फैलाने वाले भाषण के लिए जमीन तैयार करते हैं। दोनों ओर से नफरत फैलाने वाले भाषण दिए जा रहे हैं, जबकि कई मामलों में इसे सबसे पहले हिंदू कट्टरपंथी (कट्टरपंथियों) ने भड़काया था। यह दुखद है कि कर्नाटक के चंद प्रबुद्ध लोगों ने ही इसके खिलाफ आवाज उठाई : ऐसे अपवाद में इतिहासकार रामचंद्र गुहा और उद्योगपति किरण मजूमदार-शॉ शामिल थीं। नफरत की भाषा फैलाने वालों ने इन दोनों पर भी अपना गुस्सा उतारा! 

नफरती भाषा ने कुछ राज्यों, खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में सारी सीमाएं लांघ दी है। बार-बार सीमाएं लांघने वाले एक यति नरसिंहानंद हैं, जो कि डासना के मंदिर में पुजारी हैं। पिछले साल हरिद्वार में एक हिंदू धार्मिक सभा में उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया, मगर कुछ हफ्ते बाद ही जमानत पर उनकी रिहाई हो गई। तीन, अप्रैल 2022 को उन्होंने दिल्ली में एक स्वयंभू हिंदू महापंचायत में अपने भाषण में कहा, 'अपनी बहनों और बेटियों की रक्षा के लिए हथियार उठाइए।' उन्होंने यहां तक कह डाला, 'वरना, 2029 या 2034 या 2039 तक कोई मुस्लिम भारत का प्रधानमंत्री बन जाएगा!' पुलिस ने प्राथमिकी तो दर्ज की, लेकिन उसने उन्हें न तो गिरफ्तार किया और न ही उनकी जमानत रद्द करने के लिए कोई कदम उठाया।

एक और भयावह उदाहरण स्वयंभू धार्मिक नेता महंत बजरंग मुनि से जुड़ा मामला है। दो अप्रैल, 2022 को एक वीडियो में उन्हें एक सभा को हिंदी में संबोधित करते दिखाया गया। उन्होंने भीड़ के उत्साह के बीच कहा, 'यदि तुम्हारे समुदाय का कोई इस क्षेत्र की किसी लड़की को परेशान करेगा, तो मैं तुम्हारे घरों से तुम्हारी बेटियों को उठाकर उनके साथ बलात्कार करूंगा।' निशाने पर कौन था, समझा जा सकता है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की। उन्हें 11 दिनों बाद गिरफ्तार किया गया।

असहिष्णुता को सहन करना
विडंबना यह है कि हिंसा, असहिष्णुता और घृणा फैलाने वाले कृत्य धार्मिकता के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मदिन के रूप में मनाए जाने वाले दिन रामनवमी को किए गए। इन कृत्यों और भड़काऊ भाषणों को घृणा फैलाने वालों के बड़बोलेपन के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता। उन्हें भाजपा और आरएसएस का समर्थन हासिल है, जो कि हिंदीभाषी राज्यों में निहित भारत के हिंदू मूल को मजबूत और उसका विस्तार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हरतोष सिंह बल ने प्रभावशाली फॉरेन अफेयर्स में लिखा है, 'चालीस करोड़ से अधिक लोग या तो हिंदू धर्म से नहीं जुड़े हैं या उस तरह के हिंदू धर्म का पालन नहीं करते हैं, जिसे आरएसएस सर्वोच्च मानता है। फिर भी, वे अंततः उस सामंती परियोजना के अधीन होंगे, जो यह सुनिश्चित करते हुए, कि भारत के मुस्लिम और ईसाई दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में सिमट जाएं, हिंदू आबादी को एकजुट करने का प्रयास कर रही है।' बढ़ती असहिष्णुता के बीच देश के शीर्ष प्राधिकारियों की चुप्पी शासन-प्रशासन की महज एक चूक नहीं है।
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