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बिखराव की कहानी : एकजुट क्यों नहीं हो पा रहा है विपक्ष
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पीटीआई
विस्तार
विपक्ष की एकता के बजाय बिखराव की कहानी अत्यधिक अतिरंजित है और एक प्रच्छन्न और राजनीति से प्रेरित उप-पाठ का हिस्सा है, जिसके मुताबिक नरेंद्र मोदी सरकार की अपनी कमजोरियां हो सकती हैं, लेकिन विपक्ष शासन करने में सक्षम नहीं है, या उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर मामलों में भरोसा नहीं किया जा सकता है।
इसका विरोध करने के बजाय विपक्ष खुद ही इसे हवा दे रहा है। तृणमूल बनाम कांग्रेस, तृणमूल बनाम आम आदमी पार्टी, कांग्रेस बनाम राजद, प्रियंका गांधी बनाम अखिलेश यादव, ये ऐसे टकराव हैं, जिनकी झलक हाल के उपचुनाव में दिखी थी और अब इनका खुला प्रदर्शन पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में देखा जा सकता है, जहां कुछ महीनों के बाद चुनाव होने हैं।
संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष के बीच विभाजन इतना स्पष्ट नजर आ रहा है कि समान विचारधारा वाले गैर-भाजपा-राजग दलों की एक भी बैठक नहीं हो सकी है, जो कृषि कानूनों पर मोदी सरकार के बदलते रुख को उजागर करती। जबकि एकजुट विपक्ष प्रभावी रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर एक कानून की मांग कर सकता है और सीवीसी और सीबीआई के निदेशकों के कार्यकाल का विस्तार करने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) विधेयक और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (संशोधन) विधेयक को चुनौती दे सकता था।
लोकसभा के चुनाव मई, 2024 में होने हैं। इसलिए विपक्ष तात्कालिक लक्ष्य से निर्देशित हो रहा है, जिसे अवसरवाद, दूसरों से खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश और गोवा जैसे छोटे राज्य में सफलता की तलाश के रूप में देखा जा रहा है, जहां चालीस सदस्यीय राज्य विधानसभा में भाजपा के खिलाफ वर्चस्व हासिल करने के लिए तृणमूल, आप और कांग्रेस आपस में संघर्ष कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में जीत हासिल करने वाली ममता बनर्जी त्रिपुरा से लेकर गोवा और हरियाणा तक जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
इसके लिए तृणमूल सुप्रीमो इतनी बेचैन हैं कि वह कांग्रेस और आप जैसी गैर-भाजपा पार्टियों को तीसरे और चौथे नंबर पर खिसका कर दूसरे नंबर की पार्टी बनने को भी तैयार हैं, जैसा कि त्रिपुरा के निकाय चुनाव में हुआ। ममता का यह विचित्र रवैया देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है, जबकि भाजपा एवं राजग खेमे में इससे खुशी की लहर है। उन्हें 2024 के लिए ममता एक प्रभावी बीमा पॉलिसी जैसी लगती हैं।
इसके लिए कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है। अहमद पटेल की मृत्यु के एक साल बाद भी सोनिया एवं राहुल गांधी ने अन्य विपक्षी दलों तक पहुंचने, उनसे गुपचुप वार्ता करने और विपक्षी एकता का मुखौटा बनाए रखने के लिए एक प्रभावी राजनीतिक प्रबंधक की नियुक्ति नहीं की है। कांग्रेस ने दो बार मौका गंवाया। इसकी कोई स्वीकार्य व्याख्या नहीं है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कांग्रेस में क्यों नहीं शामिल किया गया, अगर वह वास्तव में पार्टी में शामिल होने के इच्छुक थे।
जैसा कि बताया जाता है, पीके के ममता बनर्जी और शरद पवार, दोनों के साथ करीबी रिश्ते हैं। इसके अलावा, एम के स्टालिन, जगन मोहन रेड्डी और अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ भी उनके अच्छे कामकाजी रिश्ते हैं। वह विपक्षी नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाकर समान उद्देश्य की भावना ला सकते थे। यदि पीके बोर्ड में नहीं हैं, तो कांग्रेस, खासकर पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को ममता को यूपीए का संयोजक बनने के लिए आमंत्रित करने की पहल करनी चाहिए।
राहुल गांधी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अगला प्रमुख बनाए या बिना बनाए हुए भी गांधी परिवार कांग्रेस का राजनीतिक नेतृत्व कर सकता था। अगर ममता बनर्जी पर दिखावटी और महत्वाकांक्षी होने का आरोप लगाया जा सकता है, तो कांग्रेस को भी महानता की धारणा को त्यागना होगा। आखिरकार, दिल्ली (वर्ष 2015 और वर्ष 2020) और आंध्र (वर्ष 2019) के बाद पश्चिम बंगाल तीसरा राज्य बन गया है, जहां कांग्रेस राज्य विधानसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत पाई है।
अगर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की कमान ममता को देने को सोनिया गांधी से मंजूरी मिल जाती, तो राहुल गांधी संसद और संगठनात्मक मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते थे, जबकि प्रियंका गांधी सचिन पायलट, भूपेश बघेल आदि के साथ प्रचारक के रूप में अपनी भूमिका पर ध्यान केंद्रित कर सकती थीं। वर्ष 2014 के बाद से यूपीए निष्क्रिय है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) तब अस्तित्व में आया था, जब 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन बना था।
यह इंद्रधनुषी गठबंधन मई, 2014 में डॉ मनमोहन सिंह के चुनाव हारने तक जारी रहा। यह पराजय इतनी प्रचंड थी कि यूपीए को पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। न ही उसके बाद समय-समय पर इसकी बैठक हुई। हालांकि गैर-राजग दल बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, बंगाल आदि के विधानसभा चुनावों में अक्सर एक साथ आए। ऐतिहासिक रूप से केरल, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस के सहयोगी दल रहे हैं।
यह याद किया जा सकता है कि 20 मई, 2019 को यानी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के फैसले से तीन दिन पहले द्रमुक नेता एम के स्टालिन ने उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया था, जिसमें कहा गया था कि लोकसभा चुनाव की मतगणना के दिन यानी 23 मई को सोनिया गांधी ने यूपीए की बैठक बुलाई थी। "किसने कहा कि 23 तारीख को विपक्षी दलों की बैठक है? बैठक केवल चुनाव परिणामों के लिहाज से उपयोगी होगी।"
स्टालिन ने संवाददाताओं से इस विचार को पुष्ट करते हुए कहा था कि यूपीए का तर्क और जनादेश विपक्षी दलों की छतरी के रूप में कार्य करने के बजाय सरकार बनाने का रहा है। स्पष्ट रूप से विपक्षी दलों की एकजुटता के विचार को पुनर्जीवित नहीं किया गया है। इसका दोष 10, जनपथ पर है, जबकि भाजपा को विभाजित विपक्ष चुनावी जीत की बीमा पॉलिसी की तरह लगता है।