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जनेऊ धारण करने का यह एक बड़ा नुकसान है
डॉ रश्मि
Updated Wed, 25 Mar 2015 12:47 PM IST
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रामकृष्ण परमहंस पंचवटी के जंगलों में साधना किया करते थे। वह रात के अंधेरे में जंगल पहुंचते और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यानमग्न हो जाते। उनका मानना था कि आंवले के वृक्ष के नीचे साधना करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है।
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उनका भांजा हृदयराम नहीं चाहता था कि वह कोई भी खतरा मोल लें और भयानक जंगल में जाएं। इसलिए वह उन्हें डराने के लिए उनके पीछे-पीछे जाता और छिप-छिपकर उन्हें डराता। वह उन पर कंकड़-पत्थर आदि फेंकता और भांति-भांति की आवाजें निकालता। परंतु वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका, बल्कि रामकृष्ण परमहंस यह जान गए कि ये सब हृदयराम की ही शरारत है।
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इसी प्रकार एक रात जब परमहंस ध्यान में मग्न थे, तो हृदयराम उन्हें देखकर चौंक गया, क्योंकि उनके तन पर वस्त्र एवं यज्ञोपवीत कुछ भी नहीं था। वह डर गया और उसने उन्हें समाधि से उठा दिया। हृदयराम ने पूछा, आपने अपने वस्त्र और यज्ञोपवीत क्यों उतार दिए?
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परमहंस ने जवाब दिया, मैं बंधन-मुक्त होकर ध्यान करना चाहता हूं। हम सभी घृणा, लज्जा, भय, मान, कुल, शील, जाति और अभिमान- इन आठ बंधनों में जकड़े रहते हैं। आठवां बंधन अभिमान है, इसलिए यज्ञोपवीत उतारना भी आवश्यक था, क्योंकि उसे देखकर अपनी ऊंची जाति का अभिमान होता था।
उन्होंने हृदयराम को तसल्ली देते हुए कहा, ये सब वस्तुएं साधना में बाधा न बनें, इसलिए मैंने इन्हें उतार दिया। लेकिन तुम चिंता न करो, जब मैं वापस आऊंगा, तो इन्हें जरूर पहन लूंगा। यह समझ लो कि ईश्वर को पाने की साधना सरल नहीं है। इसके लिए मनुष्य को सब त्यागना पड़ता है, यहां तक कि स्वयं को भी।