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मल मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ क्यों लपेटते हैं?

Mon, 23 Mar 2015 03:51 PM IST
Updated Mon, 23 Mar 2015 03:51 PM IST
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why wrap janeu on ear

यज्ञोपवीत के संबंध में विख्यात है कि यह साधना और विद्या अर्जित करने के लिए गुरु के सान्निध्य में जाने का व्रतबंध है। लघु और दीर्घशंका के समय उसे दाहिने कान पर चढ़ाने तक ही इसके नियमों का पालन किया जाता है।

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कहते हैं कि इससे पाचन संस्थान ठीक रहता है और पेट तथा शरीर के निचले अंगों में विकार नहीं आता है। कुछ प्रचारक और संस्कृति सेवी विद्वान इसे 'एक्यूप्रेशर' का विकल्प भी बताते हैं।
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उपयोगिता यहीं तक सीमित है तो यज्ञोपवीत की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि पाचनतंत्र से जुड़े रोगों को दूर करने के लिए कितने ही उपचार प्रचलित हैं। प्राकृतिक, होम्यौपैथिक और एलोपैथिक चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही नित नई खोजें इन लाभों को निरस्त कर देती हैं।

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इसलिए कान पर चढ़ाते हैं जनेऊ

why wrap janeu on ear

यज्ञोपवीत का वास्तविक लाभ शुचिता को महत्व देने के रूप में हैं। मल मूत्र के त्याग के समय जनेऊ का कोई धागा कमर के नीचे तक न जाए, इसलिए कान पर चढ़ा लेते हैं ताकि वह शरीर के अधोभाग का स्पर्श न कर सके। असल कारण शुचिता को प्रतिष्पाठित करना है।

भागवत पुराण की व्याख्या में डोंगरेजी महाराज कहा करते थे कि शरीर की स्वाभाविक स्थिति पैरों के शुरु होने तक ही हैं। घुटनों से मुड़ जाने के बाद शरीर कमर तक ही सिकुड़ जाता है। जन्म से पहले भी वह इसी दशा में रहता था और ध्यान धारणा के समय भी इसी अवस्था में होता है।

ध्यान धारणा और पूजा पाठ के समय भी उसे नीचे नही उतारते। धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों को उनके मूल अर्थ और प्रभाव में ही समझा जाना चाहिए।

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