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आपदा: मानसून में भूस्खलन का खतरा, हर साल जाती है सैकड़ों की जान
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विस्तार
मानसून ने केरल में प्रवेश कर लिया है और जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक इसके हिमालयी राज्यों तक धमकने की संभावना है। मानसून के साथ ही इन पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन का संकट बढ़ जाता है। भूगर्भीय और भूआकृति संबंधी कारणों से उत्तराखंड भूस्खलनों के लिए देश का सर्वाधिक संवेदनशील राज्य है, जिसके सभी 13 जिलों को इसरो और रिमोट सेंसिंग एजेंसी के भूस्खलन आपदा जोखिम के मानचित्र में सबसे ऊपर रखा गया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा तैयार भारत का भूस्खलन मानचित्र या एटलस-2023, हिमालयी राज्य उत्तराखंड की डरावनी तस्वीर दिखा रहा है। इस एटलस में हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक देश के 17 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों को भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया है। इनमें उत्तराखंड के दो जिले-रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल को सबसे ऊपर रखा गया है। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, राजौरी, त्रिशूर, पुलवामा, पलक्कड़, मालाप्पुरम, दक्षिण सिक्किम, पूर्वी सिक्किम और कोझिकोड में भूस्खलन का खतरा सबसे ज्यादा है।
हिमालय में भूस्खलन विभिन्न भूगर्भीय कारणों से हो सकता है, जिनमें टेक्टोनिक गतिविधि एक कारण है। गौरतलब है कि हिमालय उत्तर की ओर यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स से टकरा रहा है। इसके चलते क्षेत्र में कई भ्रंश, मोड़ और जोर बनते हैं। इन भूगर्भीय संरचनाओं के साथ जमा भूगर्भीय ऊर्जा के अचानक बाहर निकलने से भूकंप और भूस्खलन हो सकता है। ऐसी हलचलें मुख्य केंद्रीय भ्रंश या एमसीटी के आसपास ज्यादा अनुभव की गई हैं।
हिमालय में खड़ी ढलानें बहुत ज्यादा हैं, जो भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील होती हैं। हिमालय के गर्भ में नाजुक चट्टानें हैं। जैसे शेल और मिट्टी, जो आसानी से प्रभावित और नष्ट हो जाती हैं। भारी वर्षा के साथ मिलकर, कमजोर मिट्टी वाली ढलानों पर जमा मलबा तेज वर्षा या वर्षाजल के दरारों में घुसने से नीचे खिसक या लुढ़क जाता है। ग्रेनाइट जैसी मजबूत चट्टानों की तुलना में कमजोर चट्टानें, जैसे कि शेल और सिल्टस्टोन भूस्खलन के लिए अधिक संवेदनशील हैं। भूगर्भीय असंतुलन भी भूस्खलन की संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। चूंकि हिमालय समुद्र से चले मानसून को रोकता है, इसलिए मानसून अपने अंदर की जलराशि को हिमालय पर ही उड़ेल देता है।
इसके अलावा, बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं, जो भूस्खलन और त्वरित बाढ़ आपदा का मुख्य कारण होती हैं। स्थानीय स्थलाकृति, भूमि उपयोग प्रथाओं, और मानव हस्तक्षेप, जैसे वनों की कटाई और निर्माण गतिविधियां भी भूस्खलन की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती हैं।
भूस्खलन मुख्य प्राकृतिक आपदाओं में से एक है, जो हर साल संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाने के साथ ही परिवहन और संचार लिंक को अवरुद्ध करने के अलावा सैकड़ों लोगों की जान ले लेता है। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भूकंप के बाद भूस्खलन सबसे बड़ी त्रासदी है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में हर साल भूस्खलन से भारी धन-जन की हानि होती है। इस पहाड़ी राज्य में औसतन सौ लोग हर साल भूस्खलन में जान गंवा बैठते हैं। भूस्खलन से बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय क्षति होती है, जैसे कि मिट्टी के कटाव के कारण तलछट के निर्वहन में वृद्धि और हर साल मानव जीवन का नुकसान।
एक अनुमान के अनुसार, भारत में लगभग 42 हजार वर्ग किमी या 12.6 प्रतिशत भूमि भूस्खलन की जद में है। इसमें से 18 हजार वर्ग किमी दार्जिलिंग और सिक्किम सहित उत्तर पूर्व हिमालय में पड़ता है और 14 हजार वर्ग किमी प्रभावित क्षेत्र उत्तर पश्चिम हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर) में पड़ता है। पश्चिमी घाटों और कोंकण पहाड़ियों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र) में नौ हजार वर्ग किमी और एक हजार वर्ग किमी भूस्खलन का स्थानिक वितरण शेल-सैंडस्टोन-मेटासेडिमेंट्स द्वारा नियंत्रित होता है, जो विच्छेदित पहाड़ियों और घाटियों को उत्पन्न करता है।