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उत्तर प्रदेश से देश को दिशा

Tue, 21 Mar 2017 09:36 AM IST
रवि श्रीवास्तव, प्रोफसर, जेएनयू
रवि श्रीवास्तव, प्रोफसर, जेएनयू Updated Tue, 21 Mar 2017 09:36 AM IST
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Directions to the country from Uttar Pradesh
यूपी विधानसभा

उत्तर प्रदेश सिर्फ राजनीतिक कारणों से महत्वपूर्ण नहीं है, अर्थव्यवस्था में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वर्ष 1951 में उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय के लगभग बराबर या नब्बे प्रतिशत थी। आज इस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय का करीब चालीस फीसदी है! वर्ष 1951 के बाद राज्य के हालात बिगड़ते गए, लेकिन 1977-78 से 1991-92 तक एक बार फिर उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी। तब सूबे की आर्थिक विकास दर राष्ट्रीय विकास दर के लगभग बराबर थी।

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वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति लागू की गई, ताकि संरक्षणवादी नीतियों की जगह खुले बाजार की नीति अपनाई जाए। इसका देश को कमोबेश लाभ भी हुआ। लेकिन यह विडंबना ही है कि आर्थिक उदारीकरण ने उत्तर प्रदेश का उतना भला नहीं किया। बीती सदी के आखिरी दशक से देश के इस सबसे बड़े सूबे की अर्थव्यवस्था जो बिगड़ी, तो बिगड़ती ही चली गई।
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दरअसल उत्तर प्रदेश चारों ओर से घिरा हुआ (लैंडलॉक्ड) प्रदेश है। ऐसे में इसके लिए आर्थिक सुधारों का लाभ मिलना वैसे भी कठिन था। अगर कुशल आर्थिक प्रबंधन होता और यहां की उत्तरोत्तर सरकारों में दूरदृष्टि होती, तो यह भी बहुत मुश्किल नहीं था। पर दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। एक तर्क यह दिया जाता है कि लखनऊ में क्षेत्रीय दलों की सरकार होने के कारण भी उत्तर प्रदेश विकास के मोर्चे पर पिछड़ गया। इसकी जगह अगर राष्ट्रीय पार्टियों के पास सत्ता होती, तो शायद स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती। लेकिन यह तर्क गले नहीं उतरता। वर्ष 1991-92 के बाद से अब तक सूबे में सपा और बसपा के अलावा भाजपा की भी सरकार रही है। यह भी नहीं मान सकते कि जटिल सामाजिक संरचना के कारण यह प्रदेश पिछड़ गया।
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दरअसल बाद के दौर में किसी भी सरकार ने उत्तर प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए पूरी तरह से प्रयत्न नहीं किया। कृषि के मामले में यह राज्य बहुत उन्नत था। लेकिन किसानों की बेहतरी के लिए कदम नहीं उठाए गए। गन्ना उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम स्थान पर है, लेकिन गन्ना उत्पादक किसानों को मिलने वाली सुविधाओं के लिहाज से महराष्ट्र बहुत आगे है, जहां सहकारी समितियों ने किसानों का कायापलट कर दिया।

अगर उत्तर प्रदेश में पहले से चले आ रहे परंपरागत उद्योग-धंधों को गति देने के प्रयास किए गए होते, तो भी उसका महत्व होता। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में विकास नहीं हुआ है। विकास जरूर हुआ है। बनारस, देवरिया, आगरा, कानपुर, सहारनपुर, अलीगढ़, मेरठ जैसे अनेक शहरों में औद्योगिक गतिविधियां चलती थीं। लेकिन आज सूबे का पूरा उद्योग नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सिमट कर रह गया है। उत्तर प्रदेश में बुनकरों की विशाल आबादी है। इसके अलावा पीतल, ताला, कैंची, चूड़ी, चमड़ा आदि के परंपरागत उद्योग थे, जो न केवल राज्य की आर्थिकी में महत्वपूर्ण योगदान करते थे, बल्कि इन उद्योगों में एक बहुत बड़ी आबादी को रोजगार मिला था। लेकिन समय के साथ हमने इन उद्योगों पर ग्रहण लगते देखा।

उत्तर प्रदेश क्षेत्रफल के लिहाज से बहुत बड़ा राज्य है। लेकिन इसके तीन इलाके-पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में असमानताओं का अनुपात अब भी वही है, जो करीब दो-ढाई दशक पहले था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सूबे का अपेक्षाकृत संपन्न इलाका माना जाता है। वह है भी। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी क्षेत्रवार असमानताएं दिखती हैं।

शिक्षा के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश बहुत पिछड़ गया। प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा, दोनों मोर्चे पर गुणवत्ता के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। बीती सदी के नब्बे के दशक में हमने जिस भूमंडलीकरण को अपनाया, उसकी भाषा अंग्रेजी है। लेकिन उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी को वह महत्व नहीं मिला। इस कारण सूबे के युवा पिछड़ते चले गए और रोजगार के बाजार में उनकी वैसी मांग नहीं रही। उद्योग और सेवा क्षेत्र, दोनों ही जगह सूबे के युवाओं की उपस्थिति कम है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह सूबा बीमार तो है ही, एनएचआरएम घोटाला भी इस क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को बताने के लिए काफी है।

उत्तर प्रदेश की नई सरकार से इसलिए भी अधिक उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि इस सूबे में और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार है, लिहाजा मदद और तालमेल बनाने में सुविधा होगी। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि यह किसी भी राज्य के विकास की गारंटी नहीं है। केरल का विकास मॉडल हमारे सामने है। वहां हर पांच साल पर सरकार बदल जाती है। लेकिन इससे वहां विकास का एजेंडा नहीं बदलता। तमिलनाडु के आर्थिक विकास को भी देखना चाहिए। इसलिए उत्तर प्रदेश की नई सरकार में अगर विजन होगा, तभी इस सूबे की सर्वांगीण उन्नति संभव है।


नई सरकार को औद्योगिकीकरण, खासकर संगठित उद्योंगों पर ध्यान देना होगा, हालांकि इसमें समय लगेगा। इसी तरह उसे परंपरागत उद्योगों को भी गति देने की कोशिश करनी होगी, जिसमें बहुत समय नहीं लगना चाहिए। कृषि की बेहतरी उसके एजेंडे में ऊपर होना चाहिए। शिक्षण और प्रशिक्षण, दोनों पर समुचित ध्यान देना होगा। सूबे का आर्थिक विकास युवाओं को शिक्षित और योग्य बनाए बिना संभव नहीं है। आर्थिक और राजनीतिक प्रशासन, दोनों ही मोर्चे पर कुशलता, दूरदर्शिता और संतुलन का परिचय सरकार को देना होगा। जिस एक और मुद्दे पर सरकार को ध्यान देना होगा, वह है-कानून व्यवस्था। अभी तो किसानों में यह भरोसा नहीं है कि रात में खेत पर छोड़े गए पंपिंग सेट अगली सुबह उसे मिल जाएंगे। निवेशकों को प्रदेश में बुलाना है, तो उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करनी होगी। एक और बात यह कि प्रदेश में सभी लोग अमन-चैन से रह पाएं, सभी बिना किसी भय के अपना काम कर पाएं, इसकी गारंटी देनी होगी। किसी सूबे की आर्थिक तरक्की इस पर भी निर्भर करती है कि वहां सामाजिक सद्भाव की क्या स्थिति है।

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