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कूटनीति: दुनिया को नचाते ट्रंप, शांति की राजनीति या प्रभुत्व की वापसी?

Tue, 28 Oct 2025 07:22 AM IST
Surendra Kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 28 Oct 2025 07:22 AM IST
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सार
आखिरकार, यह डोनाल्ड ट्रंप ही हैं, जिन्होंने रक्तपात को रोका तथा नेतन्याहू एवं हमास, दोनों को युद्धविराम पर सहमत होने और शेष बंधकों व फलस्तीनी कैदियों की अदला-बदली करने के लिए मजबूर किया। ट्रंप के पास ताकत है और वह इसका इस्तेमाल करना जानते हैं।
 
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Diplomacy: Trump Orchestrates the World- Politics of Peace or Return of Dominance?
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : ANI

विस्तार

राणनीतिक विचारक भले ही कहते रहें कि हम एक बहुध्रुवीय दुनिया में रहते हैं, लेकिन वास्तव में क्या ऐसा है! अपने दूसरे कार्यकाल के बमुश्किल तीन महीने बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि वह 170 से ज्यादा देशों पर पारस्परिक शुल्क लगा रहे हैं, क्योंकि वे विशाल अमेरिकी बाजार का दोहन कर रहे हैं, अधिशेष जमा कर रहे हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं।


इसके तुरंत बाद दुनिया के कई नेता व्यापार समझौते करने के लिए ओवल ऑफिस पहुंच गए। भारत और चीन अब भी डटे हुए हैं, लेकिन कब तक? टैरिफ युद्ध से किसी को फायदा नहीं है, अमेरिका को भी नहीं! लेकिन ट्रंप को यह साधारण-सी बात कौन कहे!


सात अक्तूबर, 2023 को जब हमास ने 1,200 इस्राइलियों की क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी और 250 बंधकों को ले गए, तब से इस्राइल ने 30,000 बच्चों सहित 67,000 से अधिक फलस्तीनियों को मार डाला है और गाजा में 84 फीसदी इमारतों को मलबे में बदल दिया है, बीस लाख से अधिक फलस्तीनियों को बेघर कर दिया तथा उन्हें हफ्तों तक भूखा रखा, जिससे मानव निर्मित अकाल की स्थिति पैदा हो गई।

संयुक्त राष्ट्र और बहुध्रुवीय विश्व के नेताओं ने बड़े-बड़े बयान दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं आया। लाखों लोगों ने हजारों फलस्तीनियों को आश्रय के लिए भटकते, सैकड़ों बच्चों को भूख से छटपटाते और भोजन वितरण की कतार में देखा। हमास ने जो किया, वह एक जघन्य आतंकवादी हमला था। लेकिन क्या नेतन्याहू ने बेगुनाह फलस्तीनियों को सामूहिक रूप से जो दो साल तक सजा दी, क्या वह उससे सौ गुना बड़ा अपराध नहीं था, जिसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने नरसंहार कहा है!

आखिरकार, यह डोनाल्ड ट्रंप ही हैं, जिन्होंने इस रक्तपात को रोका तथा नेतन्याहू एवं हमास, दोनों को युद्धविराम पर सहमत होने आैर शेष बंधकों व फलस्तीनी कैदियों की अदला-बदली करने के लिए मजबूर किया। ट्रंप के पास अधिकार है और वह इसका इस्तेमाल करना जानते हैं। आखिरकार, ट्रंप ने 22 जून, 2025 को ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर 14 एमओपी बम गिराए थे, जो हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराए गए बमों से भी ज्यादा शक्तिशाली थे, जिसके बाद इस्राइल और ईरान, दोनों ने एक-दूसरे पर हमला करना बंद किया। मलयेशिया में आसियान देशों की बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे राष्ट्रपित ट्रंप ने थाईलैंड आैर कंबोिडया के बीच संघर्ष विराम समझौते का विस्तार भी करवाया।

सिर्फ ट्रंप ही नेतन्याहू को ओवल ऑफिस से कतर के प्रधानमंत्री को फोन करके माफी मांगने के लिए मजबूर कर सकते थे, जबकि नेतन्याहू ने कसम खाई थी कि अगर कतर दोहा में हमास नेताओं को पनाह देना जारी रखता है, तो वह फिर से हमला करेंगे। ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर भी हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया कि कतर पर किसी भी हमले को अमेरिका पर हमला माना जाएगा। कतर के पास अमेरिका का पश्चिम एशिया में सबसे बड़ा अल-उदैद एयरबेस है। अगर ट्रंप का कार्यकारी आदेश न होता, तो नेतन्याहू वर्तमान हमास नेता खलील अल हय्या की हत्या का आदेश दे देते, जिन्होंने दोहा में युद्धविराम समझौते के अंतिम चरण में भाग लिया था।

बेशक हमास को निरस्त्र करना, गाजा में हमास रहित शासन, गाजा के विकास के लिए 69 अरब से अधिक डॉलर की जरूरत और दूसरे देशों से फलस्तीनियों की वापसी जैसे मुद्दे अनिश्चितता से भरे हैं तथा एक स्वतंत्र, संप्रभु फलस्तीनी राज्य की स्थापना की दीर्घकालिक संभावनाएं धुंधली और अवास्तविक लगती हैं, लेकिन ट्रंप शांति समझौते के पहले चरण के प्रमुख वास्तुकार के रूप में उभरे हैं।

अन्य चरणों की सफलता इस पर भी निर्भर करेगी कि वह काम पूरा करने के लिए कितने प्रतिबद्ध रहते हैं और इस्राइल के प्रति झुकाव के बावजूद, फलस्तीनी उन्हें कब तक ईमानदार और निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में देखते हैं। जहां तक शर्म अल शेख में हुए बहुप्रचारित शांति शिखर सम्मेलन की बात है, तो ट्रंप मेजबान, मुख्य अतिथि और सम्मेलन के मुख्य चेहरा, तीनों थे! उन्होंने किसी के मन में जरा भी संदेह नहीं छोड़ा कि अरब, मुस्लिम और यूरोपीय नेता और संयुक्त राष्ट्र महासचिव वहां सिर्फ उनकी इच्छा से ही आए थे। वही फैसले ले रहे थे और तय कर रहे थे कि कौन कहां खड़ा होगा, कब और कितनी देर तक बोलेगा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, फ्रांस के राष्ट्रपति, जर्मन चांसलर और इतालवी प्रधानमंत्री जैसे लोगों से ज्यादा तवज्जो उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को दी, जिन्होंने ट्रंप की सबसे अधिक प्रशंसा की तथा उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए पुनः नामांकित किया।

मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने यह कहा कि फलस्तीनियों के लिए एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के साथ द्वि-राष्ट्र समाधान ही इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष का एकमात्र दीर्घकालिक उपाय है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति, और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी अनुपस्थित रहे। शायद उन्हें ट्रंप के सामने गौण विदूषक की भूमिका में रहना मंजूर नहीं था।

ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, यूएई और तुर्किये की तारीफ की कि उन्होंने हमास को अमेरिका की 20-सूत्री शांति योजना पर सहमत कराने में भूमिका निभाई, जबकि इस्राइल के प्रति उनका अविश्वास और दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। हालांकि, ट्रंप ने 20 से अधिक विश्व नेताओं से गारंटर के तौर पर समझौते पर हस्ताक्षर करवाए, लेकिन निस्संदेह अमेरिकी प्रतिबद्धता ही मायने रखती है। इस बात की पूरी संभावना है कि अगले वर्ष नोबेल समिति गाजा में रक्तपात को समाप्त करने और शांति की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाने के ट्रंप के प्रयासों को, उनके द्वारा रोके गए आठ अन्य युद्धों की तुलना में, अगला नोबेल शांति पुरस्कार देने के लिए अधिक उपयुक्त वजह समझे। लेकिन संभावनाएं इस्राइल और हमास के बीच युद्धविराम की तरह ही नाजुक हैं!
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