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नहाने-नहाने का फर्क
निर्मल गुप्ता
Updated Wed, 27 Aug 2014 08:04 PM IST
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आम आदमी के पास और कुछ हो न हो, बाल्टी, लोटा और गर्मी के मौसम में सुबह-सवेरे नहाने की इच्छा जरूर होती है। वह अक्सर मुंह अंधेरे नहाता है और तरोताजा हो अपने हिस्से की रोजी-रोटी की जंग लड़ने के लिए घर से निकल पड़ता है। दिन भर जैसी जद्दोजहद वह करता है, उसमें शाम को लौटने के बाद भी नहाने की इच्छा होती है, पर दो टाइम नहाना वह अफोर्ड नहीं कर सकता। हां, छुट्टी में गांव जाने से पहले वह साबुन की पूरी टिक्की शरीर पर जरूर खपा देता है, ताकि गांव वालों को लगे कि उसने शहर में अपने पांव मजबूती से जमा लिए हैं।
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खास लोगों के पास बाल्टी-लोटे के साथ शावर, बाथ टब, सुगंधित साबुन, नयनाभिराम टाइल्स जड़ा शानदार बाथरूम और ठंडा-गर्म पानी का मुक्कमल इंतजाम होता है। लेकिन उनमें नहाने को लेकर वैसा कौतूहल नहीं होता। फिर भी वे नहाते हैं। जिनके पास नहाने का टाइम नहीं, वे देह पर डियो छिड़ककर और मुंह पर लोशन लपेट कर काम चला लेते हैं।
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आजकल खास लोगों में सिर पर बर्फीला पानी उड़ेलने की होड़ लगी है। जिसे देखो, वही अपने सिर पर आइस बकेट उड़ेलकर, सेल्फी खींचकर सोशल साइट्स पर डाल रहा है। बड़ी-बड़ी सेलिब्रिटी तो मीडिया के सामने इस बर्फीले स्नान से अपने लिए राष्ट्रीय पटल पर ख्याति बटोर रही हैं। अनेक वीरांगनाएं यह करतब नहीं कर पाई हैं, क्योंकि उन्हें इसके लिए अभी तक उपयुक्त कॉस्ट्यूम नहीं मिल पाया है।
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अगस्त की इस परेशान कर देने वाली गर्मी में शहरी आम आदमी के सामने तो नहाने का भी संकट है, क्योंकि घंटों बिजली गुल रहने के कारण उनके यहां पानी का टोटा है। इस किस्म के लोग आइस बकेट से बेखबर हैं। उन्हें नहीं मालूम कि बाल्टी जब बकेट बनती है और पानी की जगह फिल्टर्ड वाटर से तैयार बर्फ लेती है, तो यह नहाना भी कितना सनसनीखेज बन जाता है।
फिलवक्त आम और खास आदमी के बीच आइस बकेट ने अपनी आमद दर्ज कराकर नहाने-नहाने में भी कितना बड़ा फर्क पैदा कर दिया है।