यूरो जोन में चल पाएगा मर्केल का सिक्का!

दीपक श्रीवास्तव Updated Tue, 21 Jan 2014 07:02 PM IST
Did merkeal magic work in eurozone
जर्मनी के चांसलर पद पर एंजेला मर्केल की तीसरी बार ताजपोशी कई आयामों को समेटे हुए है। वह 2005 से इस पद पर हैं। उनकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें यूरोपीय संघ का 'वास्तविक' अध्यक्ष माना जाता है। हालांकि इस बार उनकी क्रिश्चन डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी अपने दम पर बहुमत तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन कई समझौतों के बाद वह गठबंधन बनाने में आखिरकार कामयाबी हो ही गई। इस गठबंधन की बुनियाद न्यूनतम मजदूरी संबंधी कानून है, जिसे लेकर जनवरी, 2015 से पूरे देश में न्यूनतम मजदूरी दर 8.50 यूरो (करीब 70 रुपया) प्रतिघंटा करने पर सहमति बनी।

यूरो जोन जब संकट में था, तो यह एंजेला ही थीं, जिन्होंने यूरोपीय देशों को इस संकट से उबारा। घरेलू स्तर पर भी उन्होंने स्वास्थ्य सुधार और ऊर्जा विकास कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित कर राजकोष बढ़ाने के नए दरवाजे खोले। इसलिए विश्लेषक मानते हैं कि मर्केल का तीसरा कार्यकाल न सिर्फ जर्मनी को स्थायी नेतृत्व देगा, बल्कि यूरोपीय संघ के लिए भी फायदेमंद होगा, जो आर्थिक संकट के चंगुल से पूरी तरह नहीं निकल सका है।

भारत के नजरिये से देखें, तो अपने पिछले दो कार्यकाल में मर्केल ने भारत के साथ संबंध बेहतर बनाने के ही प्रयास किए हैं। दीर्घावधि तक संबंधों का बने रहना भारत और जर्मनी, दोनों देशों के राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए जरूरी है। लिहाजा भारत मर्केल की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है, खासकर निवेश और तकनीकी हस्तांतरण के लिए। वर्ष 2006 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और एंजेला मर्केल ने ऊर्जा, तकनीक और रक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत-जर्मनी कूटनीतिक साझेदारी के तहत एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया था। इसी कड़ी में 2007 और 2011 की मर्केल की भारत यात्रा के दौरान द्विपक्षीय सहयोग और दोस्ती को बढ़ावा देने वाले घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए। संभावित कूटनीतिक संबंधों के क्रियान्वयन और उसकी प्राथमिकता तय करने के लिए भारत और जर्मनी ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय विमर्श का भी आयोजन किया। भारत उन चंद गैर-यूरोपीय देशों में शामिल है, जिसके साथ जर्मनी ने इस तरह का व्यापक विचार-विमर्श किया।

मर्केल के सामने बड़ी चुनौती यूरो जोन को स्थायित्व देना है। उन्हें यूरो मुद्रा को इस कदर मजबूत बनाना होगा कि समृद्ध उत्तरी यूरोपीय देश और अपेक्षाकृत कमजोर दक्षिणी यूरोपीय देशों के बीच की खाई दूर हो, ताकि जर्मनी के कॉरपोरेट क्षेत्रों के लिए व्यापारिक अवसर बढ़े। यह तथ्य है कि जर्मनी में व्यापार लागत काफी ज्यादा है। लिहाजा जर्मनी के औद्योगिक घराने, जिसमें विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भी हैं, अपनी व्यापारिक गतिविधियां उन क्षेत्रों से संचालित करना चाहते हैं, जहां उनकी लागत कम हो। भारत और चीन बेहतर विकल्प नहीं हो सकते, क्योंकि दोनों देश भौगोलिक रूप से जर्मनी से काफी दूर हैं। इसलिए हंगरी, पॉलैंड और स्लोवाकिया जैसे देशों पर उनकी नजर है। जर्मनी की कई ऑटोमोबाइल कंपनियों ने स्लोवाकिया और हंगरी से कारोबार शुरू भी कर दिया है।

इसके अतिरिक्त जर्मनी यह भी चाहता है कि अधिक से अधिक देश यूरो मुद्रा अपनाएं। अभी 17 देश इस मुद्रा का इस्तेमाल कर रहे हैं। अन्य देश भी इसकी तरफ आकर्षित हों, इसके लिए व्यापक सुधार की जरूरत है। बेशक अभी यूरो संकट में है, पर ऐसा नहीं है कि उसके दिन लद गए हैं। जरूरत यूरोपीय देशों में आर्थिक और राजकोषीय नीतियों में समन्वय और बजट पर नियंत्रण करने की है।

हालांकि मर्केल को जनसांख्यिकीय चुनौती से भी जूझना है। न्यूनतम जन्म दर और उच्च जीवन प्रत्याशा की वजह से देश की जनसंख्या बिगड़ रही है। अनुमान है कि 2060 तक तीन में से एक जर्मन की उम्र 65 या इससे अधिक होगी। इसका अर्थ यह है कि देश में कार्यशील आबादी कम होती जाएगी, जिससे सरकार को सामाजिक कल्याण पर अधिक से अधिक खर्च करने होंगे। यह सरकार पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाएगा। लिहाजा मर्केल को इस कदर यूरोपीय संघ में सुधार की तरफ कदम बढ़ाने होंगे, जिससे आर्थिक चुनौतियों के निपटने साथ ही यूरोपीय सामाजिक कल्याण मॉडल भी अप्रभावित रहे। नए और प्रतिस्पर्धी तरीके से जर्मनी और यूरोपीय संघ का आगे बढ़ना वक्त की नजाकत है।

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