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क्रिकेट की धारणा बदलते धोनी
Wed, 23 Jan 2019 07:00 PM IST
Raman Singh
मनोज चतुर्वेदी
मनोज चतुर्वेदी
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 23 Jan 2019 07:00 PM IST
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मनोज चतुर्वेदी
कभी-कभी एक घटना भर से किसी व्यक्ति विशेष के बारे में बनी सोच एकदम से बदल जाती है। भारतीय किक्रेट में पिछले दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिला। क्रिकेट का सबसे बड़ा मेला यानी आईसीसी विश्व कप करीब आने से सभी का ध्यान उसकी तैयारी की तरफ है। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज शुरू होने से पहले पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को विश्व कप में खिलाने को लेकर आलोचना हो रही थी। वहीं पेस गेंदबाज ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या और लोकेश राहुल को विश्व कप के लिए अहम खिलाड़ी माना जा रहा था। पर पिछले दिनों घटी दो घटनाओं के बाद धोनी की आलोचनाएं प्रशंसा में बदल गई हैं और हार्दिक और लोकेश राहुल के खेलने पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
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महेंद्र सिंह धोनी की आलोचनाओं की वजह पिछले साल यानी 2018 में खेले 20 वनडे मैचों में सिर्फ 275 रन बना पाना और उसमें भी कोई अर्धशतक नहीं जड़ पाना रहा है। वह कई बार पारी को तेजी देने की जरूरत पर भी रनों की रफ्तार नहीं बढ़ा सके। इसके विपरीत युवा विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋषभ पंत का ताबड़तोड़ अंदाज में रनों की बौछार करने से क्रिकेट प्रेमियों को लगने लगा कि धोनी का समय अब नहीं रहा है और वह पंत की राह को रोक रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले वनडे की हार ने इस सोच को और मजबूती दे दी। लेकिन दूसरे वनडे में धोनी को लेकर सोच ही बदल गई। इस मैच के बाद तीसरे वनडे में भी लगातार तीसरा अर्धशतक लगाने से एकाएक उनकी प्रशंसाओं का दौर चल निकला। इसके बाद लोगों को लगने लगा कि धोनी के टीम में रहने से टीम इंडिया की विश्व कप की दावेदारी में और जान पड़ जाएगी।
धोनी की फिनिशर की भूमिका में फिर से कारगर रहने के बाद भी हमें गावस्कर की इस बात को ध्यान में रखना होगा कि धोनी अब युवा नहीं हो सकते, इसलिए उनसे युवा दिनों वाले प्रदर्शन की उम्मीद करना सही नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज में धोनी ने 193.00 के औसत से इतने ही रन बनाने और कॅरियर में सातवीं बार 'मैन ऑफ द सीरीज' बनने के बावजूद हमें यह मान लेना चाहिए कि वह अब पहले वाले धोनी नहीं हैं, जो कि किसी भी गेंदबाज पर छक्का जमा देता था। पर वह अब भी विकेट पर टिकने का माद्दा रखते हैं, इसलिए टीम इंडिया के लिए विश्व कप में बहुत उपयोगी हैं।
दूसरी ओर हार्दिक पांड्या और लोकेश राहुल दोनों युवा खिलाड़ी हैं और कोहली की विश्व कप योजना के हिस्सा रहे हैं। लेकिन करण जौहर के कार्यक्रम कॉफी विद करण में महिलाओं को लेकर अनुचित टिप्पणी करने का उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इन दोनों को क्या सजा दी जाए, इस पर अभी विचार की प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो सकी है। कारण बीसीसीआई के संचालकों में आपस में विवाद चलना है। बीसीसीआई के नए संविधान के मुताबिक, लोकपाल ही ऐसे मामलों को सुन सकता है। लेकिन उसकी नियुक्ति साधारण सभा ही कर सकती है। पर बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष साधारण सभा बुलाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करके कहीं वह सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर न आ जाएं। प्रशासकों की समिति और बोर्ड पदाधिकारियों के मतभेदों की वजह से हार्दिक और लोकेश राहुल इन दो सीरीजों में खेलने से तो रह गए हैं। पर अब कहीं उनकी विश्व कप की गाड़ी भी न छूट जाए। इससे लगता है कि बीसीसीआई में पिछले दो वर्षों में सुधार को लेकर बहुत कुछ चलने पर भी टीम के हितों पर ध्यान दिए जाने वाली स्थिति नहीं बनी है।
ऐसे में जरूरी है कि धोनी को विश्व कप तक उनके हाल पर छोड़ दिया जाए और हार्दिक और लोकेश के मामले को जल्द से जल्द निपटाया जाए, तभी टीम इंडिया का भला हो सकता है।