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विकास और पर्यावरण साथ-साथ

Thu, 28 Dec 2017 06:37 PM IST
सुरेश भाई
सुरेश भाई Updated Thu, 28 Dec 2017 06:37 PM IST
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Development and environment together
सुरेश भाई

हिमालयी राज्यों में चल रहे निर्माण कार्यों, जैसे-भवन, बांध, सड़कों का चौड़ीकरण, ऑल वेदर रोड, रेल लाइन आदि में कहीं भी भूकंप और अन्य आपदाओं को सहन करने की क्षमता नहीं है, क्योंकि इन कामों में आपदा सुरक्षित तकनीक का सहारा नहीं लिया जा रहा। निर्माण एजेंसियां अपने लाभ के अनुसार काम कर रही हैं, जिसके कारण यहां बड़ी विकास परियोजनाएं विनाश का कारण बन सकती हैं। हिमाचल, उत्तराखंड, असम, मेघालय, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर आदि में वर्षों से परंपरागत शैली में बने भूकंप रोधी भवनों के स्थान पर मैदानी आकार-प्रकार के हिसाब से ही भवन निर्माण हो रहा है।


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उत्तराखंड में प्रस्तावित ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और 10.24 मीटर चौड़ी सड़कों के निर्माण में बड़े भूकंप की आशंकाओं के मध्य टिकाऊ संरचनाओं के निर्माण में पहाड़ों की संवेदनशीलता की अनदेखी की चर्चा अब वैज्ञानिकों की बैठकों से उभरकर सामने आ रही है। हाल ही में देहरादून में भूगर्भ वैज्ञानिकों द्वारा आयोजित हिमालय में आपदा सुरक्षित संरचनाओं पर हुई बैठक में स्वीकार किया गया कि हिमालय क्षेत्र में बड़े-बड़े निर्माण आपदाओं के सामने टिकने योग्य नहीं हैं। पहाड़ों में कैसे निर्माण कार्यों को गति मिलनी चाहिए, इस पर वैज्ञानिकों ने समय-समय पर सरकार को शोध एवं अध्ययन रिपोर्टें सौंपी हंै, जिनका इस्तेमाल केवल रबर स्टांप के रूप में ही किया जाता रहा है।

उत्तराखंड में लगभग 889 किलोमीटर लंबी सड़कों को इतना चौड़ा किया जा रहा है कि पहाड़ों में उतनी जगह ही नहीं है। संकरी घाटियों और ऊंचे पर्वतों को काटकर जो निर्माण हो रहा है, वह आठ रिक्टर स्केल तक आने वाले संभावित भूकंप की स्थिति में अधिक मारक हो जाएगा। सड़क निर्माण की बेहतर तकनीक देश-विदेशों में मौजूद है, जिसका इस्तेमाल न होने से चार से सात रिक्टर स्केल पर आने वाला भूकंप भी मौजूदा भवनों व विकास संरचनाओं को मलबे में तब्दील कर सकता है।

ऋषिकेश से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री आदि स्थानों के लिए जा रही सड़कों पर चट्टानें लटकी हुई दिखाई देती हैं। सड़कों के चौड़ीकरण के लिए यदि इनको हटाकर ढालदार रूप में कटान करने का प्रयास भी किया जाएगा, तो उसके ऊपर सीधे खड़े चट्टान को गिरने से रोकना आसान नहीं है। इस प्रक्रिया में पेड़ भी बड़ी संख्या में काटे जाएंगे। यहां पिछले दो साल में आए तीन दर्जन से अधिक भूकंपों से चट्टानों में दरारें भी पड़ी हुई हैं। इसलिए ऐसे स्थानों पर छेड़छाड़ बेहद जोखिम भरी हो सकती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में जाने वाली जम्मू-उधमपुर और हिमाचल में मौजूदा रेल मार्गों के डिजाइन आज की तकनीक के हिसाब से पुराने और जोखिम भरे हैं। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल लाइन को भी टिकाऊ बनाने में चुनौती है, क्योंकि यह चार भूकंपीय क्षेत्रों से होकर बनाई जाएगी।

हिमाचल में भी निर्माण कार्यों से लाखों वन प्रजातियों का विनाश हो रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की एक पीठ ने कहा है कि हिमाचल सरकार संविधान के अनुच्छेद 48 (अ) के तहत पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के प्रति दायित्व निभाने में विफल रही है। जबकि विशेषज्ञ वर्षों से कह ही रहे हैं कि हिमालय क्षेत्र में भवनों के निर्माण की अलग डिजाइन हो, इसके लिए हिमालयी राज्यों को अपने विशिष्ट भूभाग के अनुसार मिलकर कार्य योजना बनानी चाहिए। पर्यावरण और विकास के बीच सृजनात्मक संबंध बनाना बहुत आवश्यक है।

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