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घरेलू बचत में भी सेंध

Mon, 05 Aug 2013 08:51 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 05 Aug 2013 08:51 PM IST
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Dent in domestic savings

घरेलू बचत संबंधी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के नवीनतम आंकड़े चिंताजनक हैं। वित्त वर्ष 2012-13 में सकल घरेलू बचत जीडीपी के 29 फीसदी के स्तर पर आ गई है। यह वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान जीडीपी की 30.8 फीसदी थी, जबकि 2007-08 के दौरान जीडीपी की 36.8 फीसदी। देश की कुल बचत में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाली घरेलू बचत का लगातार गिरना न केवल बचत से जुड़े निम्न एवं मध्यवर्ग के करोड़ों लोगों के लिए, बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है।

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आर्थिक विशेषज्ञ बार-बार कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के विकास के लिए घरेलू बचत में वृद्धि जरूरी है। पांच वर्ष पहले की वैश्विक मंदी का भारत पर कम असर होने के पीछे भारतीयों की घरेलू बचत महत्वपूर्ण मानी गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट, 2012-13 में कहा गया है कि महंगाई के लगातार ऊंचे स्तर पर बने रहने से लोगों की घरेलू बचत घट गई है।
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साथ ही, वैश्वीकरण और बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति के वर्तमान दौर में भारतीय परिवारों द्वारा क्षमता से ज्यादा खर्च, कर्ज लेने की बढ़ती प्रवृत्ति, क्रेडिट कार्ड के अधिक उपयोग और बचत योजनाओं में ब्याज की कमाई का आकर्षण बहुत कम हो जाने के कारण घरेलू बचत घटती गई है।
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उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के जरिये घरेलू बचत को लेकर जो सर्वेक्षण किया है, उसमें बताया गया है कि इस समय देश के 22.7 करोड़ परिवारों में से केवल 2.45 करोड़ परिवार ही शेयर, म्यूचुअल फंड और डेरिवेटिव्स में निवेश करते हैं। पांच वर्ष पहले ऐसा लग रहा था कि जिस तरह चीन ने बचत प्रवृत्ति बढ़ाकर विकास का प्रतिमान गढ़ा है, उसी तरह हम भी बचत प्रवृत्ति बढ़ाएंगे, पर ऐसा हो नहीं सका।


पिछले पांच वर्षों में जहां जमीन, मकान, सोने-चांदी जैसी परिसंपत्तियों में निवेश ने जोर पकड़ा है, वहीं बैंक जमा, बांड, म्यूचुअल फंड, शेयर, बीमा और पेंशन कोष जैसी वित्तीय योजनाओं में निवेश से लोग पीछे हटने लगे हैं। घरेलू बचत में भारी गिरावट के कारण पूंजी बाजार और शेयरों के लिए निकलने वाली पूंजी का हिस्सा कम हुआ है।

इतना ही नहीं, हमारे देश में म्यूचुअल फंड या बीमा कंपनियों में इक्विटी उत्पादों को भुनाने का सिलसिला लगातार बढ़ा है। काफी संख्या में डीमैट खाते बंद हुए हैं, जो दर्शाता है कि पूंजी बाजार से छोटे निवेशकों का भारी पलायन हुआ है।

घरेलू बचत में कमी से देसी कंपनियों को पूंजी प्राप्त करने में इतनी परेशानियां हो रही हैं कि वे वित्तीय जरूरतों के लिए विदेशी पूंजी बाजार की ओर रुख कर रही हैं। उन्हें बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) का सहारा लेना पड़ रहा है।

वित्त वर्ष 2012-13 में देसी कंपनियों को उनकी वित्तीय जरूरतों के लिए जो विदेशी निवेश प्राप्त हुआ, वह उनकी पूंजी निर्माण के 12 फीसदी के करीब था, जो पिछले दो दशकों का सर्वोच्च स्तर था।

देश में बचत संबंधी नया परिदृश्य बता रहा है कि वित्तीय योजनाओं में अब घरेलू बचतों के योगदान में भारी कमी से उत्पादक क्षेत्रों में पूंजी नहीं आ पा रही है, जिससे पूंजीगत व्यय चक्र और जीडीपी वृद्धि दर, दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। देश में घरेलू बचत कम होने का कारण यह है कि सरकार घरेलू बचत योजनाओं को प्रोत्साहन नहीं दे रही।

केंद्र सरकार ने विगत अप्रैल से डाकघर बचत तथा पब्लिक प्रॉविडेंट फंड जैसी बचत योजनाओं में देय ब्याज में 0.10 फीसदी की कटौती की है। इसी तरह वर्ष 2013-14 के बजट से निम्न एवं मध्यवर्ग के करोड़ों परिवारों को यह अपेक्षा थी कि वित्त मंत्री घरेलू बचत बढ़ाने के लिए बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में वृद्धि करेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सरकार की ओर से चालू वित्त वर्ष के बजट में बचत बढ़ाने वाले जो प्रावधान किए गए हैं, वे ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।

इस बजट में दो से पांच लाख रुपये की आय वाले करदाताओं को 2,000 रुपये की टैक्स छूट देने का प्रावधान किया गया है। देश के कुल आयकरदाताओं के करीब 89 फीसदी इसी दायरे में आते हैं।

घरेलू बचत को प्रोत्साहन की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि विकसित देशों की तरह हमारे यहां सामाजिक सुरक्षा का उपयुक्त ताना-बाना नहीं है। देश में आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा की कितनी जरूरत है, इसका अनुमान अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ‘बेहतर विश्व के लिए आर्थिक सामाजिक सुरक्षा’ नाम से जारी रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि आर्थिक सुरक्षा के आधार पर 96 देशों में भारत का स्थान 94वां तथा सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से दुनिया के 90 देशों में 74वां है।

देश में घरेलू बचत घटने से उन तमाम छोटे निवेशकों और बचतकर्ताओं का दूरगामी आर्थिक प्रबंधन चरमरा रहा है, जो अपनी छोटी बचतों के जरिये जिंदगी के कई महत्वपूर्ण काम-जैसे, बिटिया की शादी, सामाजिक रीति-रिवाजों की पूर्ति, बच्चों की पढ़ाई और सेवानिवृत्ति के बाद का अच्छा जीवन बिताने का सपना संजोए हुए हैं।

निम्न एवं मध्यवर्ग के करोड़ों परिवारों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की बढ़ती जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में घरेलू बचत बढ़ाने के कदमों के तहत सरकार को बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में वृद्धि करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करने में सेबी की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए कि घरेलू बचत का एक बड़ा हिस्सा शेयर और डिबेंचर में निवेश किया जाए।


निश्चय ही, बचत प्रोत्साहन से देश के पूंजी बाजार को नई विश्वसनीय पूंजी मिलेगी और आर्थिक-सामाजिक खुशहाली की चाहत रखने वाले करोड़ों लोगों के चेहरे पर नई मुस्कुराहट आ सकेगी।

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