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लोकतंत्र से टकराव की नई रणनीति
बद्री नारायण
Updated Mon, 03 Jun 2013 10:20 PM IST
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भारतीय राज्य और नक्सलवाद की टकराहटों के इतिहास में बस्तर में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ हिंसक हमला शायद पहली घटना है, जिसमें नक्सलियों ने राजनीतिक वर्ग के इतने बड़े संवर्ग को अपनी आक्रामक हिंसा की जद में लिया है।
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परिवर्तन यात्रा पर हमला कर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लगभग सभी महत्वपूर्ण एवं बड़े नेताओं की हत्या एक प्रकार से राज्य से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का खात्मा है। नक्सलियों की राज्य निर्देशित जनतंत्र के खिलाफ, जिससे वे बाहरी असहमति रखते हैं, लड़ाई की नई युद्ध नीति है, ‘राजनीतिक वर्ग’ पर आक्रमण! अगर विभिन्न राज्यों में विभिन्न नक्सलवादी समूहों की आक्रमण नीति का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होगा कि पुलिस, नौकरशाही, भूस्वामी, ठेकेदार एवं साहूकार पर वे पिछले 40-42 वर्षों से आक्रमण करते रहे हैं।
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उन्हें लगा होगा कि इसके बावजूद भारतीय राज्य एवं राज्य प्रायोजित जनतंत्र उनके संघर्ष को गंभीरता से नहीं ले रहा है। संभवतः यह नई युद्ध नीति भारतीय राज्य के खिलाफ राजनीतिक वर्ग, राष्ट्रीय राजनीतिक दल एवं उनके नेतृत्व पर हमले की रणनीति की ओर इशारा करती है।
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नक्सलियों ने शायद यह विश्लेषण अपनी रणनीति में शामिल किया कि राज्य सत्ता का केंद्र होते हैं, राजनीतिक दल, जो राज्य एवं जनतंत्र दोनों को संचालित करते हैं। पुलिस, सेना, नौकरशाह, ठेकेदार, धन्नासेठ सब राज्य एवं जनतंत्र के छोटे मोहरे हैं। अतः भारतीय राज्य को अगर ‘अशांत’ करना है, तो राजनीतिक दलों पर आक्रमण किया जाए। अतः इसे भारतीय राज्य को मात्र ‘एक पहल’ और ‘अंतिम आक्रमण’ नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसे भारतीय राज्य से टकराव की रणनीति का अगला चरण मानना चाहिए।
इसे मात्र राज्य एवं केंद्र की प्रशासनिक अक्षमता एवं कानून एवं व्यवस्था का सवाल न मानते हुए भारतीय जनतंत्र, जिसे नक्सलवादी विचारधारा एक असंतुलित जनतंत्र के रूप में देखती है और जिसका पलड़ा आधिपत्यशालियों की तरफ झुका हुआ मानती है, को खारिज करने की एक बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जाना चाहिए।
जब तक भारतीय राज्य नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित जनमत में अपने मार्के के जनतंत्र के प्रति विश्वास पैदा कराने में सफल नहीं हो जाता, तब तक यह आग फैलती जाएगी। सिर्फ सड़क, बिजली और पानी मार्का विकास, जो रमन सिंह, शिवराज सिंह, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार मॉडल विकास का सूचक बन गया है और जो एक तरह से विश्व बैंक मार्का विकास है, का ढोल पीटना छोड़ भारतीय नीतिकार, मीडिया एवं सिविल सोसाइटी, आदिवासी जनों, स्थानीय समाजों में विकास की सामान्य व्याख्या से निकल स्थानीय आकांक्षाओं पर आधारित विकास एवं जनतंत्र का मॉडल विकसित नहीं करेगी, भारतीय जनतंत्र का यह संकट गहराता जाएगा।
हमें यह समझना होगा कि विकास सिर्फ मध्य वर्ग की बढ़ती भूख को शांत करना ही नहीं है। विकास सिर्फ चावल, पैसा, लैपटॉप बांटना ही नहीं है। विकास सबको एक ही तराजू पर तौलना और एक ही वर्ग में बांधना नहीं है। असल में विकास गरीब-गुरबा से पूछना भी है कि आप क्या चाहते हो?
आप कैसे रहना चाहते हो? आप कैसा कानून बनाना चाहते हैं? हमें उनके भीतर लगातार भारतीय राज्य एवं तथाकथित विकास से पैदा हो रहे वंचित रखने के एहसास को कम करना होगा। खदान, जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। उनका हवा-पानी दोषमुक्त रखना होगा।
विकास के मोदी, रमन सिंह, शिवराज सिंह मॉडल जिस प्रकार जनतंत्र एवं जीवन में असंतुलन बढ़ा रहे हैं, उन्हें समझना होगा। फिर अपने जनतंत्र को समाहारी बनाकर उन गरीब-गुरबे आदिवासियों के पास ले जाना होगा। जंगल के मालिक को जनतंत्र का मालिक बनाना होगा।
राजनीतिक दलों को उन समुदायों में भी स्वीकृति बढ़ानी होगी, जो इस जनतंत्र से असहमत हैं। बातचीत के माध्यम से उन्हें जोड़ना होगा। याद करें, 1970 का बिहार एवं भाकपा-माले (विनोद मिश्र गुट) की आक्रामकता। जिस तरह वे जनतंत्र की मुख्यधारा में शामिल हुए और भारतीय जनतंत्र के असंतुलन को मिटाने की लड़ाई सांविधानिक ढंग से लड़ रहे हैं, वैसा ही करने की कोशिश बस्तर, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, झारखंड में सक्रिय उग्र वामपंथी गुटों के लिए भी करनी होगी।