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पाकिस्तान में लोकतंत्र बेबस

Mon, 31 Jul 2017 07:11 PM IST
salman haidar सलमान हैदर
Updated Mon, 31 Jul 2017 07:11 PM IST
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Democracy in Pakistan is helpless
नवाज शरीफ

नवाज शरीफ की विदाई से एक बार फिर पाकिस्तान में कमजोर लोकतंत्र का सबूत सामने आया है। एक चुनी हुई सरकार को वहां सत्ता से बाहर कर दिया गया। करीब सात दशक में एक भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल पूरा न कर पाने को सिर्फ संयोग नहीं कह सकते। नवाज शरीफ एक तजुर्बेकार आदमी हैं और लोग उन्हें जानते हैं। इसका मतलब हालांकि यह नहीं है कि उनके और उनके परिजनों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की अनदेखी कर दी जाए। जो ब्योरे आए हैं, वे बताते हैं कि दस्तावेजों में हेराफेरी की गई है और खुद नवाज शरीफ ने चुनाव के समय दाखिल किए गए अपने हलफनामे में झूठ बोला था। भ्रष्टाचार की सजा तो मिलनी ही चाहिए। मेरा यह भी मानना है कि अदालत के इस फैसले के बाद नवाज शरीफ का राजनीतिक करिअर खत्म हो गया है। उनकी राजनीति में वापसी अब मुमकिन नहीं दिखती।


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पाकिस्तान में और पाकिस्तान के बाहर भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की काफी तारीफ हुई है। लोग कह रहे हैं कि यह फैसला एक मिसाल बनेगा। पर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। पाकिस्तान में खासकर ऊंचे तबके में भ्रष्टाचार इस कदर फैला है कि उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है। लेकिन यह मानने की वजह नहीं है कि नवाज शरीफ के खिलाफ आए फैसले के बाद वहां के भ्रष्टाचारी डरेंगे। इस फैसले से पाकिस्तान में भ्रष्टाचार पर चोट पड़ने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ऐसा नहीं दिखा कि वहां की जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आए इस फैसले का स्वागत किया है। और तो और, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के मुखिया इमरान खान ने भी इस फैसले के बाद वैसी सक्रियता नहीं दिखाई, जिसकी उनसे उम्मीद थी। आखिर नवाज शरीफ को कुर्सी से उतारने के पीछे उन्हीं की कोशिश सबसे अधिक थी। इसलिए भ्रष्टाचार के मामले में नवाज शरीफ के सत्ता से बाहर होने के बावजूद भ्रष्टाचार पाकिस्तान में कोई मुद्दा नहीं है। और इसीलिए यह मानना पड़ता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र को झटका देने के लिए ही नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर किया गया है।

यह कैसे किया गया है, इस बारे में फिलहाल कुछ साफ नहीं है। कुछ लोग कह रहे हैं कि अदालत ने सेना के साथ मिलकर यह कदम उठाया है। पर मुझे ऐसा नहीं लगता। एक तो इसलिए कि नवाज शरीफ और उनके परिवार के लोगों का भ्रष्टाचार पकड़ा गया है। और दूसरा यह कि सेना ने इस दौरान अपनी सक्रियता नहीं दिखाई है। दरअसल सेना समझ चुकी है कि उसकी सक्रियता को देश और देश से बाहर अच्छी तरह नहीं देखा जाता। पाक सत्ता प्रतिष्ठान में सेना का वर्चस्व बेशक कम नहीं हुआ है, लेकिन इस बारे में वह सार्वजनिक तौर पर ऐसा संदेश देने से बचती है। इसके अलावा सेना यह भी जताती रहती है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के साथ उसका बेहतर तालमेल है।

नवाज शरीफ के बाद पाकिस्तान का भविष्य अब दो लोगों के इर्द-गिर्द घूमेगा। इनमें से पहले हैं इमरान खान और दूसरे हैं शहबाज शरीफ। इमरान खान पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हैं। लोग उन्हें उनके क्रिकेट खेलने के दौर से जानते हैं। इसके अलावा वह ईमानदार आदमी माने जाते हैं। उनकी शख्सियत पर बेईमानी या भ्रष्टाचार का एक भी धब्बा नहीं है। पाकिस्तान जैसे मुल्क में यह बहुत बड़ी बात है। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए पाक सेना ने उन्हें अपने मोहरे के रूप में चुना था। यह माना जाता रहा है कि आर्मी की पसंद इमरान ही हैं। लेकिन दो चीजें उनके खिलाफ जाती हैं। एक तो उन्होंने अभी तक ऐसा कुछ करके दिखाया नहीं है कि लोग उन्हें अपना नेता मानें। अभी तक वह सिर्फ बातें ही करते रहे हैं। दूसरा यह कि अतीत के अपने एक फैसले से उन्होंने अपनी छवि एक लापरवाह शख्स की भी बना ली है, जिसे लोगों की परेशानियों से बहुत मतलब नहीं है। गौरतलब है कि नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए, नवाज को सत्ता छोड़ने का अल्टीमेटम देते हुए इमरान खान ने अपने समर्थकों के साथ इस्लामाबाद की घेरेबंदी कर डाली थी। तब इमरान का साथ ताहिर-उल-कादरी ने दिया था। इस्लामाबाद की उस घेरेबंदी के दौरान लोगों को काफी परेशानियां हुईं। फिर चूंकि उस घेरेबंदी का कोई नतीजा भी नहीं निकला, इसलिए बहुतेरे लोगों ने इसे अपनी राजनीति चमकाने की उनकी चाल के रूप में देखा। उसी दौरान इमरान की लोकप्रियता भी घटी। इन दिनों यह भी सुनने में आ रहा है सेना के साथ इमरान खान के ताल्लुकात पहले जैसे नहीं हैं।

तुलनात्मक रूप से शहबाज शरीफ की स्थिति मजबूत है। पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने कई कामयाबियां हासिल की है। हालांकि सफल मुख्यमंत्री सफल प्रधानमंत्री हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन यह नहीं भूल सकते कि वह सत्ता राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं और बेहद सफल भी हैं। इस मोड़ पर जो चीज उन्हें सबसे मजबूत बनाती है, वह है सेना के साथ उनके बेहतर रिश्ते। नवाज शरीफ के साथ सेना के रिश्ते बहुत अच्छे कभी नहीं रहे। लेकिन शहबाज इस मामले में अपने बड़े भाई से अलग हैं। वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे सेना के साथ उनके रिश्ते तल्ख हों। चूंकि एक शरीफ की जगह दूसरा शरीफ सत्ता की बागडोर संभालने वाले हैं, इसलिए यह भी लगता है कि नवाज शरीफ और उनके परिजनों के खिलाफ अदालत के रुख के बावजूद पाकिस्तान के समाज पर उसका कोई बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला। न ही पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता की ओर जा रहा है। ऐसा होता, तो चुनाव रद्द करने का एलान किया जाता।

पाकिस्तान का घटनाक्रम भारत के लिए अफसोसनाक है। हम हमेशा चाहते है कि हमारे पड़ोसी देशों में मजबूत लोकतंत्र हो। पाकिस्तान में, दुर्भाग्य से, लोकतंत्र बार-बार कमजोर होता रहा है। हालांकि इस घटनाक्रम का भारत पर कोई सीधा असर तो नहीं पड़ने वाला, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में फिलहाल किसी बड़े बदलाव की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।

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