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योग के लिए तैयार होती दिल्ली

Tue, 16 Jun 2015 07:44 PM IST
ऐलन बेरी
ऐलन बेरी Updated Tue, 16 Jun 2015 07:44 PM IST
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Delhi being ready for Yoga

पिछले हफ्ते एक सुबह भारत के कृषि मंत्रालय के डिप्टी कमिश्नर चंद्रशेखर साहुकार ने अपने 57 वर्ष के जीवन में पहली बार खुद को योग की कक्षा में पाया, उनके टखने बुरी तरह से अकड़े हुए थे। उनके थैले में उस ज्ञापन की छायाप्रति थी, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से पहले खुद को योग के कुछ आसनों से परिचित कराने की सलाह दी गई थी, क्योंकि उन्हें उस दिन सात बजे सुबह से शुरू होने वाले एक सामूहिक योग सत्र में भाग लेना है। ज्ञापन में बताया गया है कि इस सत्र का मकसद गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराना है। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि 'अगर कुछ अधिकारी बिना अभ्यास के पहुंचे, तो उनका रिकॉर्ड भी खराब हो सकता है।'

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कमरे में सामने एक प्रशिक्षक खुद को जेब में रखी जाने वाली छुरी की तरह खुद को खोल एवं बंद कर रहे हैं और स्पष्ट शब्दों में कक्षा के सदस्यों को याद दिला रहे हैं कि उन्हें जल्दी ही 'मोदी साब' की निगरानी में योग करना है। जब वे योग प्रशिक्षुओं को अपना चेहरा झुकाकर घुटनों तक लाने का निर्देश देते हैं, तो चंद्रशेखर साहुकार चुप नहीं रह पाते, जिन्हें अपना काम ज्यादा समय तक कुर्सी पर बैठकर करना होता है, और वह कहते हैं, 'मेरा चेहरा घुटनों को नहीं छू पा रहा, मैं इससे ज्यादा झुक नहीं सकता!'
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प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अनेक पहल की है, जिनमें कुछ ने काफी हलचल पैदा की है। योग दिवस उन्हीं में से एक है, जिसमें 35,000 से ज्यादा सरकारी कर्मचारी, छात्र एवं नागरिक हिस्सा लेंगे। हालांकि पश्चिमी जगत योग को मुख्यतः शारीरिक व्यायाम मानता है, पर भारतीय इसे आसन एवं संस्कृत श्लोक के कारण ज्यादा उपयुक्त मानते हैं, क्योंकि इनके वैचारिक या धार्मिक मायने हैं। इस कार्यक्रम की तैयारी के साथ कुछेक मुस्लिम समूह की ओर से आलोचनाएं भी हो रही हैं, जो कहते हैं कि उन्हें 'ओम' (हिंदुओं का पवित्र मंत्र) कहने और सूर्य नमस्कार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह इस्लाम की एकेश्वरवादी प्रकृति का उल्लंघन है।
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मोदी के अधिकारियों ने जल्द ही इन शिकायतों का समाधान कर लिया और आश्वस्त किया कि योग दिवस में भागीदारी ऐच्छिक है और यह विशेष रूप से स्वास्थ्य पर केंद्रित है, न कि धर्म पर। न तो ओम का उच्चारण और न ही सूर्य नमस्कार योग दिवस में अनिवार्य है। यह बहस इतनी तीखी हो गई कि भाजपा के एक सांसद ने तो यहां तक कह दिया कि जो सूर्य नमस्कार से नाराज हैं, वे समुद्र में डूब जाएं।

इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटिश और मुगलों द्वारा बसाई राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में योग कार्यक्रम एक सांस्कृतिक चुनौती के बराबर है। दिल्ली का आभिजात्य वर्ग ज्यादातर अंग्रेजीदां और ह्विस्की एवं बटर चिकेन का शौकीन है, यहां का बाबू वर्ग अपने दिन का समय फाइलों को निपटाने में बिताता है और अगले पर्यवेक्षी फरमान को लेकर परेशान रहता है। वहीं ऐसे नौकरशाह भी कम नहीं, जिनकी तोंद निकली हुई है।

योग एवं पारंपरिक औषधि मंत्रालय के देश के पहले मंत्री श्रीपाद नाइक, जिन्होंने इस उत्सव के आयोजन में मदद की है, कहते हैं कि यह औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा छोड़े गए पश्चिमी जीवन-शैली के अवशेष को दूर करने का समय है। वह कहते हैं, 'पहले हमारे यहां के लोग सूर्योदय से पहले जागते और सूर्यास्त से पहले सो जाते थे, लेकिन अब हमारी जीवन-शैली बदल गई है। अब लोग पब जाते हैं। वे आधी रात को बारह या एक बजे जाएंगे और वहां चिकेन से लेकर तमाम तरह के व्यंजन खाएंगे।' नाइक प्रधानमंत्री की तरह सुबह होने से पहले ही जग जाते हैं और रोज योग करते हैं। वह नौ बजे सोने का सुझाव देते हैं तथा हिंदी भाषी अखबार पढ़ते हैं और गर्व से बताते हैं कि उन्होंने कभी सुई नहीं लगवाई है। वह कहते हैं कि अब जीवन-शैली में बदलाव आएगा और हमारी अपनी जीवन-शैली लोग अपनाएंगे।

मोदी पहले भारतीय नेता नहीं है, जिन्होंने योग को आगे बढ़ाया है। इंदिरा गांधी तो अपने योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी के प्रति इतनी समर्पित थीं कि यात्रा पर भी अपने परिवार के साथ उन्हें ले जाती थीं। 1970 के दशक के अंत में ब्रह्मचारी का एक टीवी शो भी आता था और योग को कुछ स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया गया था। लेकिन 1984 में गांधी की हत्या के बाद ब्रह्मचारी का जादू खत्म हो गया और उन्होंने खुद को अपने आश्रम तक ही सीमित कर लिया। मोदी का कोई उतना महत्वपूर्ण गुरु नहीं है, लेकिन 1980 के दशक से वह लगातार एच. आर नागेंद्र (बंगलूरू के गुरु जो ध्यान कराते हैं) के संपर्क में हैं। नागेंद्र कहते हैं कि मोदी विभिन्न लोकप्रिय योगगुरुओं से आकर्षित हैं, जिनमें बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, जग्गी वासुदेव और माता अमृतानंदमयी शामिल हैं।

इस समय योग को लेकर जो झुकाव पैदा हुआ है, वह कई मायनों में हिंदू राष्ट्रवादी विचार के साथ शामिल है। सूर्य नमस्कार और संस्कृत मंत्रोच्चार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक सैन्य शैली के अभ्यास का हिस्सा है, जिसके साथ मोदी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। दैनिक शाखा की शुरुआत 'पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना पैदा करने' के लिए की गई।


श्रीपाद नाइक उम्मीद जताते हैं कि योग के व्यापक अभ्यास से हिंसक अपराधों की दर में कमी आएगी। जब लोग कुछ सकारात्मक करेंगे, तो बुरे विचार उनके मन से निकल जाएंगे। सरकारी कर्मचारियों के बारे में वह कहते हैं कि इससे वे ज्यादा कर्तव्यनिष्ठ और कम भ्रष्ट होंगे। नौकरशाही के कामकाज में निश्चित रूप से इससे फर्क पड़ेगा। जब वे दुबले होंगे, तो उनकी सारी ऊर्जा बेहतर काम करने में लगेगी। अगर एक बार सही तरीके से इसकी शुरुआत हो जाए, तो किसी पर दबाव डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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