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पर्यावरण: पहले के फैसलों पर अमल जरूरी, देरी से उठते हैं औचित्य पर सवाल
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जलवायु परिवर्तन (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
जलवायु परिवर्तन पर शीर्ष स्तरीय चिंतन हेतु गत वर्ष मिस्र के शर्म-अल-शेख में कॉप-27 के बाद पांच महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इसके केंद्र में मूल ध्येय क्रियान्वयन पर रहा। अब आगामी 30 नवंबर से 12 दिसंबर तक एक बार फिर दुनिया का शीर्ष नेतृत्व जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और बढ़ते वैश्विक तापमान से मानवता को हो रहे नुकसान और उससे निपटने की तैयारियों पर विचार के लिए दुबई में एकत्रित होगा।कॉप-28 में नई चिंताओं, नए प्रस्तावों एवं नए निर्णयों के बीच बीते वर्ष के निर्णयों और उनके अमल की स्थिति पर गौर करना आवश्यक है। पिछले सम्मेलन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण एक विशेष प्रस्ताव के जरिये जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान एवं विनाश हेतु कोष (लॉस ऐंड डेमेज फंड) के गठन का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य पर्यावरण को हो रहे नुकसान की क्षतिपूर्ति के साथ भविष्य के विनाश को रोकने हेतु पर्याप्त संसाधन मुहैया कराना था। इसके अलावा, तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने पर विशेष जोर देते हुए यह संकल्पना की गई थी कि वर्ष 2025 में अधिकतम स्तर को देखते हुए तापमान में वृद्धि की दर वर्ष 2030 तक लगभग 43 प्रतिशत तक कम करने के लिए समग्र उपाय किए जाएंगे, ताकि जैविक नुकसान को यथासंभव रोका जा सके।
पिछले सम्मेलन में व्यापार एवं संस्थाओं की जवाबदेही तय करने पर भी जोर दिया गया था। सम्मेलन में व्यापार एवं संस्थागत परिप्रेक्ष्य में कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण हेतु व्यापक रूपरेखा तैयार कर पर्यावरण लक्षित रिपोर्टिंग को भी समान रूप से अहम माना गया। पिछले सम्मेलन में यह माना गया कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने एवं पर्यावरण अनुकूल विकास को बढ़ावा देने के लिए विकासशील देशों के पास पर्याप्त संसाधन न होने से उनमें कमी की जगह वृद्धि हो रही है। इसलिए 1.50 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करने के लिए विकसित देशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे वित्तीय मदद देकर विकासशील देशों में प्रदूषण से हो रहे जैविक नुकसान को रोकने में मददगार बनें।
उल्लेखनीय है कि ग्रीन क्लाइमेट फंड स्थापित करने में वर्षों लग गए और उसकी उपलब्धता एवं सुलभता के प्रति भी विकासशील देशों ने अनेक आपत्ति दर्ज कराई थी। आशंका यही बन रही है कि कहीं इसका भी हश्र वैसा ही न हो जाए, क्योंकि इसकी स्थापना पहले चार वर्षों के लिए विश्व बैंक के तहत किए जाने का प्रस्ताव है, जिसका मूल कार्य ऋण प्रदान करना है। जबकि इस कोष का प्रारंभिक उद्देश्य अनुदान एवं सहायता प्रदान करना है।
ऐसे में उक्त कोष की स्थापना से पहले ही स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्न चिह्न लग गए हैं। इसके अलावा, इसमें न तो गैर सरकारी संगठनों और न ही प्रभावित समाजों यथा औद्योगिक संगठनों, अंतरराष्ट्रीय समूहों आदि को कोई स्थान दिया गया है। साथ ही, यह भी आशंका जताई जा रही है कि उक्त कोष का लाभ मात्र उन गरीब देशों तक सीमित होगा, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण अपरिवर्तनीय एवं अपरिहार्य विनाश झेलना पड़ा है। इसलिए मांग उठ रही है कि जलवायु संबंधी इस कोष हेतु विश्व बैंक के नियम-कायदों से परे अलग नियम निर्धारित हों, अलग कार्यकारी निदेशक की नियुक्ति हो तथा सभी विकासशील देश इसका लाभ उठा सकें। अनेक देश ऐसे भी हैं, जो विश्व बैंक समूह के सदस्य नहीं हैं और सामान्यतया बैंक के नियम उन्हें सहयोग से वंचित रखते हैं। प्रारंभ में उक्त कोष के लिए 100 अरब डॉलर की राशि का प्रस्ताव था, जिसे बदल कर वर्ष 2030 तक 400 अरब डॉलर तक पहुंचाने का प्रस्ताव कर दिया गया है, यानी प्रारंभिक राशि के बारे में यह प्रस्ताव मौन है। एक उपलब्धि यह है कि अमेरिका ने उक्त कोष में सहयोग की सहमति प्रदान कर दी है।
कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन की चिंता हेतु वार्षिक सम्मलेन के निर्णयों के अमल में हो रही अनावश्यक देरी इसके औचित्य पर भी प्रश्न चिह्न लगा देती है। पहले लिए निर्णयों को लागू करना प्राथमिकता में हो, अन्यथा यह सम्मेलन भी रस्म अदायगी जैसा हो जाएगा।