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रक्षा सौदों के घोटाले और सच
प्रशांत दीक्षित
Updated Mon, 12 Dec 2016 07:27 PM IST
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प्रशांत दीक्षित
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बीते नौ दिसबंर को अगस्ता-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद से संबंधित घोटाले के मामले में पूर्व वायु सेना अध्यक्ष एसपी त्यागी की गिरफ्तारी हुई। लेकिन उन प्रक्रियाओं को समझना जरूरी है जिसकी परिणति त्यागी की गिरफ्तारी के रूप में सामने आई है।
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वर्ष 2000 में रक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनके समकक्ष विदेशी मेहमानों जैसे अति विशिष्ट लोगों के लिए हेलीकॉप्टर खरीदने की योजना बनाई। इस प्रयोजन के लिए वायु सेना को आवश्यकताओं की जांच करने का निर्देश दिया गया और विनिर्देश निर्धारित किए गए। इन विनिर्देशों की मदद से वायु सेना को रक्षा मंत्रालय की जरूरतों के अनुसार उचित हेलीकॉप्टर का मूल्यांकन करने की जरूरत थी।
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इस संबंध में 2003 में प्रक्रिया शुरू की गई और मूल्यांकन के बाद वायु सेना ने सिर्फ एक हेलीकॉप्टर यूरोकॉप्टर ईसी 225 की सिफारिश की। अगस्ता-वेस्टलैंड में निर्दिष्ट छह हजार मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता नहीं थी, इसलिए उसे खारिज कर दिया गया। किसी विमान में संचालन सीमा वह अधिकतम ऊंचाई है, जहां पर वह सुरक्षित रूप से उड़ान भर सकता है और सभी सामान्य कामकाज कर सकता है। तभी मीडिया ने यह खबर दी कि सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने मूल्यांकन पर सवाल उठाए हैं कि क्यों छह हजार मीटर की संचालन सीमा जरूरी है और इसे घटाकर 4500 मीटर कर दिया गया। इस परिवर्तन के बाद यूरोकॉप्टर के साथ अगस्ता-वेस्टलैंड भी खरीद के योग्य हो गया।
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इस स्तर पर विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) के तत्कालीन प्रमुख ने कहा कि यूरोकॉप्टर के केबिन की ऊंचाई (1.39 मीटर) काफी कम है और हेलीकॉप्टर के केबिन की ऊंचाई कम से कम 1.8 मीटर होनी चाहिए। अब यूरोकॉप्टर दौड़ से बाहर हो गया और केबिन की ऊंचाई के आधार पर केवल अगस्ता-वेस्टलैंड ही पारित हुआ।
फिर इसमें गतिरोध आया, क्योंकि केवल एक ही विक्रेता विचार करने के लिए बचा था। इस बाधा से निपटने के लिए छह विक्रेताओं से नए प्रस्ताव आमंत्रित किए गए, जिनमें से मात्र तीन ने ही जवाब दिया-सिकोरस्की, मिकोयान और अगस्ता-वेस्टलैंड। मिकोयान ने भारतीय अनुबंध के ईमानदारी संबंधी प्रावधान को मानने से इन्कार कर दिया, इसलिए उसे रद्द कर दिया गया। अब केवल सिकोरस्की और अगस्ता-वेस्टलैंड ही विचार के लिए रह गया। इसी बीच वर्ष 2007 में एयर चीफ मार्शल त्यागी सेवानिवृत्त हो गए। वर्ष 2008 में वायु सेना द्वारा सिकोरस्की और अगस्ता-वेस्टलैंड पर विचार-विमर्श किया गया और अगस्ता-वेस्टलैंड को खरीद के लिए चुना गया। फरवरी, 2010 में अगस्ता-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर की आपूर्ति के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए और पहले हेलीकॉप्टर की आपूर्ति 2012 में की गई।
वर्ष 2012-13 में अगस्ता-वेस्टलैंड घोटाला सामने आया, जिसकी जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंपी गई तथा करार को रद्द कर दिया गया। सीबीआई ने जांच में तीन वर्ष का समय लगाया और लगभग एक वर्ष तक चुप रहने के बाद एसपी त्यागी को गिरफ्तार किया, तो लोगों को आश्चर्य हुआ। लेकिन यह मानना मुश्किल है कि एक व्यक्ति ने पूरी भारत सरकार की कमान संभाल रखी थी, जिसने विनिर्देशों को पलट दिया और सेवा निवृत्त होने के बाद विचार प्रक्रिया को प्रभावित किया। यह भी माना जाता है कि उसने अन्य प्रतिस्पर्धियों को निकाला, मूल्य में वृद्धि की और अगस्ता-वेस्टलैंड के लिए 3,600 करोड़ रुपये के करार को प्रभावित किया। वायु सेना को मात्र हेलीकॉप्टर के प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के लिए कहा गया था। विनिर्देशों का निर्धारण भारत सरकार द्वारा किया गया और उसे बदला भी भारत सरकार द्वारा ही गया। वायु सेना द्वारा खरीद पर विचार और हेलीकॉप्टरों का मूल्यांकन आरोपी की सेवानिवृत्ति के बाद किया गया।
क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि एसपी त्यागी, जो दिसंबर, 2004 से मार्च, 2007 के बीच वायु सेना प्रमुख रहे, रायसीना हिल में सबसे ताकतवर व्यक्ति थे, जो अपने कार्यकाल से पहले और बाद में पूरी सरकारी मशीनरी को कठपुतली की तरह नचा सकते थे, क्योंकि विनिर्देश 2003 में तैयार किए गए, हेलीकॉप्टरों पर विचार-विमर्श 2008 में हुआ और करार पर हस्ताक्षर 2010 में हुए? इसलिए एसपी त्यागी को बदनाम करने से पहले उस व्यक्ति ने वास्तव में क्या किया, उसे बिना संदेह किेए स्थापित किया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया कम से कम पांच वायु सेना प्रमुखों और सात रक्षा सचिवों की देखरेख में हुआ, जिनमें से कुछ की सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी और निजी क्षेत्रों में बहुत ही महत्वपूर्ण और आकर्षक पदों पर नियुक्ति हुई। आखिर इस पूरे फसाद के किस बिंदु पर आरोपी इस स्थिति में रहा कि उसने विचार, मूल्यांकन, खरीद के फैसले को प्रभावित किया?
लगता है कि एक बार फिर बड़ी मछलियां बच गई हैं और कोई अन्य जाल में फंस गया है। यदि इतालवी कोर्ट के फैसले को स्वीकार किया जाता है, तो त्यागी पर दोष मढ़ने के बहुत कारण नहीं हैं। इस बात की काफी संभावना है कि त्यागी पर जो आरोप लगाए गए हैं, उसे किसी अन्य घटना या व्यक्ति से ध्यान हटाने के लिए किया गया हो। यह विश्वास इस धारणा से उपजी है कि वीवीआईपी हेलीकॉप्टर का अधिग्रहण अनिवार्य रूप से नागरिक सरकार की जरूरत थी और वास्तव में वायु सेना को इसमें कोई लाभ नहीं था।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि रिश्वत वास्तव में भारतीय नागरिकों को दिए गए और इतालवी कोर्ट के फैसलों से अलग, विशेष रूप से तत्कालीन वायु सेना प्रमुख को। ऐसी धारणा है कि हम लोगों की प्रतिष्ठा को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। उदाहरण के तौर पर हमेशा बोफोर्स को याद किया जाता है, जिसकी जांच से अदालत में कुछ भी साबित नहीं किया जा सका, जबकि कई लोगों की प्रतिष्ठा को सरासर तंज के जरिये नष्ट कर दिया गया। अंत में कोर्ट ने अनिवार्य रूप से सीबीआई के कहने पर मामले को बंद कर दिया।