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घटती विकास दर, बढ़ती बेरोजगारी

Mon, 08 Jul 2013 04:48 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 08 Jul 2013 04:48 PM IST
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declining growth rates, rising unemployment

हाल ही में केंद्र सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा देश में बेरोजगारी के बारे में किए गए सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट में कहा गया है कि जून, 2010 से जून, 2012 के बीच बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। पिछले दो साल के दौरान देश में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी, 2012 में देश में पूर्ण बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी, जबकि दो साल पहले यह आंकड़ा 98 लाख था। इस आंकड़े के अलावा कई सरकारी एवं गैरसरकारी सर्वेक्षणों के आंकड़े भी बहुत बड़ी संख्या में बेरोजगारी की बात कह रहे हैं।
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योजना आयोग के मुताबिक, देश में 3.60 करोड़ पूर्ण बेरोजगार हैं। कुछ सर्वेक्षणों में पूर्ण बेरोजगारों की संख्या जहां पांच करोड़ के लगभग बताई जा रही है, वहीं अन्य प्रकार के अर्ध बेरोजगारों एवं मौसमी बेरोजगारों की संख्या इससे तीन गुना अधिक बताई जा रही है।
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उद्योग एवं वाणिज्य संगठन, एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, हाल के वर्षों में आर्थिक विकास दर में तो वृद्धि हुई है, लेकिन संगठित क्षेत्र में रोजगार में गिरावट आई है। आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो विदेशी निवेश आया है, वह रोजगार में तब्दील नहीं हो सका है।

कृषि क्षेत्र में रोजगार कम हुए हैं। औद्योगिक विकास दर कम रही है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के अवसर मंद गति से बढ़ रहे हैं। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश की कमी से रोजगार के अवसर नहीं बढ़ पा रहे।

विभिन्न रोजगार सर्वेक्षणों में यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि ऊंची प्रोफेशनल डिग्री रखने वाले करीब 20 फीसदी विद्यार्थियों को ही अच्छा रोजगार प्राप्त हो रहा है, जबकि 47 फीसदी ग्रेजुएट रोजगार के लायक ही नहीं हैं।

जो छात्र कंप्यूटर, आईटी, प्रबंधन जैसी विशेषज्ञता के साथ श्रेष्ठतम शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित-प्रशिक्षित होकर आ रहे हैं, उन्हें बड़ी-बड़ी कंपनियां मोटे वेतन पर रोजगार दे तो रही हैं, पर दूसरी ओर, डिग्री हाथ में लिए हुए लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।

कई युवा बतौर पेशेवर पहचान इसलिए नहीं बना पा रहे, क्योंकि देश के अधिकांश शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षा का स्तर बहुत ही खराब है। अनेक इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्रों को प्रैक्टिकल कराए बिना ही ग्रेजुएट बना दिया जा रहा है।

देश के अधिकांश कॉलेजों-विश्वविद्यालयों का ध्यान सिर्फ एमबीए और अन्य विषयों के छात्रों को प्लेसमेंट प्रक्रिया में बैठाने तक ही सीमित दिखाई दे रहा है। छात्रों के समग्र विकास के लिए वे कुछ खास नहीं कर पा रहे।

उद्यमपरक मानव संसाधन तैयार करने की ओर अब भी सरकारें, सक्षम प्राधिकरण व अन्य संबंधित संगठन ज्यादा संजीदा नहीं हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए न तो प्रशिक्षण व पढ़ाई के स्तर पर ठोस पहल की जा रही है, न बाजार के अनुरूप रोजगार के लिए माहौल विकसित किया जा रहा है।

निजी क्षेत्र में प्रोफेशनल शिक्षा के जो गिने-चुने संस्थान हैं, वहां प्रवेश और ऊंची फीस की व्यवस्था दुष्कर कार्य है। ऐसे में पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थानों की स्थापना एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर, किंतु प्रतिभाशाली छात्रों को अच्छा रोजगार पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

इस देश में 1,200 से अधिक पॉलीटेक्निक और 5,000 से अधिक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं। हजारों की संख्या में राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान और निजी क्षेत्र द्वारा संचालित औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र हैं। पर स्थिति यह है कि मात्र 20 फीसदी श्रमिकों को कुशलता का प्रशिक्षण मिलता है। दूसरी ओर, चीन में 91 फीसदी लोग कौशल प्रशिक्षण से सुसज्जित हैं।

उल्लेखनीय है कि जनसांख्यिकीय बढ़त हासिल करने के साथ-साथ दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी रखने वाला भारत कौशल प्रशिक्षण की कमी दूर कर आर्थिक विकास को भारी ऊंचाई दे सकता है।

देश की जनसंख्या में पचास प्रतिशत से ज्यादा संख्या उन लोगों की है, जिनकी उम्र पच्चीस से कम है। ये प्रतिभाएं सस्ते एवं गुणवत्तापूर्ण काम से जहां आउटसोर्सिंग को बढ़ाकर नई कमाई का ढेर लगा सकती हैं, वहीं विदेशी अर्थव्यवस्थाओं का सहारा बनकर डॉलर, यूरो और येन की कमाई कर देश को भेज सकती हैं।

यह जरूरी है कि अच्छे रोजगार के लिए सरकार गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या में वृद्धि करे। चूंकि औसत योग्यता वाले युवाओं के लिए व्यावसायिक व कौशल प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम करने के बाद रोजगार की डगर पर अवसरों को पाने की अपार संभावनाएं हैं, अतएव उन्हें रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों से शिक्षित-प्रशिक्षित करना होगा।

गांवों में काफी संख्या में जो गरीब, अशिक्षित और अर्धशिक्षित लोग हैं, उन्हें बेहतर रोजगार देने के लिए कौशल प्रशिक्षण से सुसज्जित करना होगा।

वैश्विक उद्योग-व्यवसाय की आवश्यकताओं के अनुरूप मानव संसाधन के रूप में पेशेवर और कौशल प्रशिक्षण से सुसज्जित देश की नई पीढ़ी देश और दुनिया के आर्थिक विकास की सहभागी होगी।


लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि वैश्वीकरण के इस दौर में रोजगार विहीन विकास से आर्थिक विषमता की जो स्थिति पैदा हो रही है, उससे देश के ढेर सारे बेरोजगारों का असंतोष किसी भी वक्त उग्र रूप धारण कर सकता है।

अतएव सरकार को संसद और उसके बाहर रोजगार विहीन विकास के प्रति गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए, साथ ही, उसके निराकरण के ठोस उपाय भी करने चाहिए।

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