मौत के सीवर
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गत 21 अक्तूबर को दिल्ली के जहांगीरपुरी में सीवर में घुसे एक सफाईकर्मी की मौत हो गई। सफाईकर्मी डोमन रॉय दिल्ली जल बोर्ड के पंप हाउस में गहरे सीवर में उतरे थे, लेकिन उस अंधी सुरंग में उनकी ऐसी हालत हो गई कि बचाया नहीं जा सका। खबरें बताती हैं कि उन्हें सुरक्षा उपकरण के बिना ही सीवर में उतरना पड़ा था। इससे पहले मुंबई में तीन सफाईकर्मी सीवर की सफाई के दौरान मारे गए। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। देश भर के विभिन्न शहरों में एक हजार से ज्यादा सफाईकर्मियों की सीवर में मौत हुई है। लेकिन ऐसी घटनाओं को रोकने की कभी कोई बात नहीं होती है। सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि सबको जीने का हक हासिल है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि इन सफाईकर्मियों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। जब भी कोई महामारी फैलती है या दुर्घटना होती है, तो उसकी रोकथाम के तत्काल उपाय किए जाते हैं, पर दुखद है कि सफाई कर्मचारियों की ऐसी मौतों को रोकने के लिए न तो केंद्र के पास और न ही किसी राज्य सरकार के पास कोई योजना है। दिल्ली, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं। हैरानी की बात है कि इतनी मौतों के बाद भी किसी राज्य सरकार नेे इसका कोई समाधान नहीं ढूंढा है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़ा धब्बा है।
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आतंकवादी घटनाओं पर रोकथाम के लिए हमने जरूरी कदम उठाए हैं, फिर इन सफाईकर्मियों की जान बचाने के लिए हम कोई उपाय क्यों नहीं तलाशते? असल में सरकारें इन मौतों की घटनाओं को कम करके बताती हैं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग सीवर में मरने वाले सफाईकर्मियों की संख्या बहुत कम बताता है, जबकि हमारे पास आठ सौ से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की मौत के दस्तावेज (पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मृत्यु प्रमाण पत्र, अखबारों की कतरन आदि) हैं। वास्तव में सीवर में मरने वाले सफाई कर्मचारियों की संख्या मुंबई और दिल्ली की घटनाओं को जोड़कर पिछले एक दशक में 1,794 हो गई है। इतने सफाई कर्मचारियों की मौत के बावजूद इसकी रोकथाम के उपाय किए बिना नए-नए शौचालय बनाए जा रहे हैं। पिछले चार वर्षों में सात करोड़ नए शौचालय बनाए गए हैं। दो साल बाद ये सेप्टिक टैंक भर जाएंगे, तो उनकी सफाई कौन करेगा, जब सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराया जाएगा और उनके कल्याण के लिए योजनाएं नहीं बनाई जाएंगी? इन मौतों पर अंकुश लगाने के लिए कोई यांत्रिक व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सरकार को तो उठानी ही होगी। लेकिन सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है।
इस तरह की मौतों को रोकने के लिए तीन तरह के यांत्रिक उपाय किए जा सकते हैं। सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए एक सकर मशीन आती है, जो मल को खींचकर बाहर निकालती है और टैंक में डालती है। यह सबमर्सिबल पंप की तरह होती है। हर नगरपालिका में पर्याप्त संख्या में इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें सफाईकर्मियों को सेप्टिक टैंक के भीतर घुसने की जरूरत नहीं होगी। हमारे नगरों में सीवेज सिस्टम है, जिसे हम मैनहोल भी कहते हैं। एक मैनहोल से दूसरे मैनहोल के बीच में अगर कोई रुकावट आ जाए, तो दूसरा उपाय है कि सीवेज की सफाई के लिए रोबोट तकनीक का उपयोग किया जाए। हमारे देश की एक कंपनी ने ऐसा रोबोटिक मशीन बनाया है। वह रोबोट मैनहोल में घुसकर सफाई का काम करके बाहर निकल आएगा। इसमें भी सफाईकर्मियों को मैनहोल में घुसने की जरूरत नहीं है। हमारे यहां आज भी अंग्रेजों के जमाने के पाइपों के जरिये ही सीवर की सफाई की जाती है। तीसरे उपाय के तौर पर इन पाइपों को आधुनिक ढंग से तैयार करने की जरूरत है। कहीं भी सीवर में पानी भरने से पहले हम सेंसर का उपयोग करके उसका पता कर सकते हैं।
इसके अलावा सफाई कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपकरण की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इन सब उपायों के साथ सफाई कर्मचारियों के पुनर्वास और प्रशिक्षण के लिए भी सरकार को योजना बनानी चाहिए। बिना प्रशिक्षण के कर्मचारियों को ऐसे काम करने के लिए नहीं भेजना चाहिए। इन सब चीजों के लिए निवेश की जरूरत है, लेकिन इस पर सरकार कोई खर्च नहीं करना चाहती है। जिस तरह परिवहन के क्षेत्र में हम बैलगाड़ी से आगे बढ़कर बस, ट्रेन, मेट्रो, हवाई जहाज आदि के चरण में पहुंचे हैं, उसी तरह सफाई के क्षेत्र में भी आधुनिकता की जरूरत है। लेकिन वास्तविकता यह है कि तब भी इंसान ही सफाई करते थे, और आज भी इंसान ही सफाई करते हैं। सभी विभागों में आधुनिकीकरण किया गया है, लेकिन इस क्षेत्र में नहीं। ज्यादातर नगरपालिकाओं में सफाईकर्मी को ठेके पर रखा जाता है। सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता है। सरकारें सोचती हैं कि ये लोग मर भी गए तो क्या होगा! असल में वर्षों से इस समुदाय के प्रति जो घृणा और उपेक्षा की भावना है, उसमें बदलाव नहीं आया है, इसलिए मानसिकता बदलने की जरूरत है।
हमारी मांग पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मृत सफाईकर्मियों के परिवार के कल्याण के लिए सरकार को कई निर्देश दिए हैं। उनमें सबसे पहला है, ऐसे लोगों की पहचान करना, जो सफाई का काम करते हुए मर गए हैं। 1993 से अब तक कितने लोग मरे, उसकी पहचान करना। मृत सफाईकर्मियों के आश्रितों के कल्याण के लिए योजनाएं बनाना। उन्हें दस लाख रुपये मुआवजा देना, हाउसिंग प्लॉट देना या उनके लिए घर की व्यवस्था करना, उनके बच्चों को दसवीं तक शिक्षा देना-ये सब निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं, लेकिन कोई भी सरकार ठीक से इस पर अमल करने के लिए तैयार नहीं है। सरकार का ध्यान अभी केवल शौचालय बनाने पर है, खुले में शौच मुक्त भारत बनाने पर है, जबकि हमारा ध्यान मैनुअल स्कैवेंजिंग फ्री इंडिया बनाने पर होना चाहिए। सफाईकर्मियों के पुनर्वास के बजट को लगातार सरकार घटाती रही है। ऐसे में स्वच्छ भारत का सपना कैसे साकार होगा!
लेखक रैमन मैगसायसाय पुरस्कार विजेता और सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक हैं।