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हेडली और हमारे हाथ

बी रमन Updated Mon, 28 Jan 2013 09:07 PM IST
david headley and our hands
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यह जतलाने की कोशिश केंद्रीय गृह मंत्रालय ने की है कि वह अमेरिका में दोषी ठहराए गए डेविड कोलमैन हेडली के प्रत्यर्पण का प्रयास जारी रखेगा, मगर ऐसा संभव नहीं दिख रहा है। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हेडली को शिकागो की एक अदालत ने मुंबई के 26/11 के आतंकी हमले और पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून प्रकाशित करने वाले डेनमार्क के एक अखबार के दफ्तर पर हमले की नाकाम साजिश के मामले में 35 वर्ष की सजा सुनाई है। उसे आईएसआई और लश्कर को सहयोग करने का दोषी पाया गया है।
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कानूनी तौर पर उसके प्रत्यर्पण का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि उसके साथ हुई 'प्ली बार्गेनिंग'(आरोपी और अभियोजन पक्ष के बीच होने वाला समझौता, जिसमें आरोपी कम गंभीर आरोपों को स्वीकार कर लेता है और अभियोजन पक्ष कुछ आरोप वापस ले लेता है) में अमेरिका के फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (एफबीआई) ने उसे भारत प्रत्यर्पित न करने का वायदा किया है। इसके अलावा अमेरिकी अदालत ने 26/11 के हमले में उसे सजा सुना दी है, इसलिए एक ही अपराध में उसे दो बार सजा नहीं सुनाई जा सकती।
 
वास्तव में भारत की सरकार और 26/11 के पीड़ितों के संबंधियों को अदालत में एफबीआई की प्ली-बार्गेनिंग की अर्जी देने से पहले ही इसका विरोध करना चाहिए था, क्योंकि एक बार इसे अदालत की मंजूरी मिलने का मतलब है कि मृत्युदंड और प्रत्यर्पण की संभावनाओं का खत्म हो जाना। मगर भारत सरकार और पीड़ितों के संबंधियों की ओर से ऐसी पहल नहीं की गई।

गृह मंत्रालय को यह स्वीकार करने में ईमानदारी बरतनी चाहिए कि उसकी लापरवाही के चलते ही हेडली के प्रत्यर्पण की सारी उम्मीदें हमेशा के लिए ध्वस्त हो गई हैं। हालांकि उससे पूछताछ के प्रावधान का रास्ता अभी खुला हुआ है। हेडली ने एफबीआई से वायदा किया है कि वह भावी जांच में उसे तथा उसे सहयोग करने वाली विदेशी एजेंसियों को मदद करेगा।

इसी के तहत हमारी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की एक टीम अमेरिका जाकर न्यायिक हिरासत में एफबीआई की मौजूदगी में उससे पूछताछ कर सकती है। हालांकि इससे कुछ फायदा मिलने में संदेह है, लेकिन इससे भारत में उसके नेटवर्क की छानबीन की जा सकती है।

दूसरी ओर हेडली के जुर्म में सहयोगी रहे शिकागो में बसे तहव्वुर हुसैन राणा के प्रत्यर्पण के दरवाजे अभी खुले हुए हैं। दिलचस्प यह है कि एफबीआई ने राणा के साथ समझौता करना जरूरी नहीं समझा। हेडली और राणा के मामलों में अपनाए गए एफबीआई के दोहरे मापदंडों की एक ही तार्किक व्याख्या समझ में आती है, और वह यह कि एफबीआई हेडली को भारत की न्यायपालिका के शिकंजे से बचाना चाहती थी, क्योंकि वह ड्रग इंफोर्समेंट एजेंसी का एजेंट था। वहीं राणा ऐसी किसी एजेंसी से जुड़ा नहीं था। इसी वजह से हेडली से नजदीकी और मुंबई पर आतंकवादी हमलों की पहले से जानकारी होने के पर्याप्त प्रमाणों के बाद भी शिकागो की अदालत ने राणा को सिर्फ कोपनहेगन मामले में ही अपराधी माना। लिहाजा एक ही अपराध में दो बार सजा जैसी बात इस मामले में नहीं होगी।

साफ है कि हेडली के मामले के उलट राणा का प्रत्यर्पण कठिन नहीं है। इसलिए भारत में हेडली-राणा के नेटवर्क का पता लगाने के लिए हमें उसके प्रत्यर्पण पर जोर देना चाहिए। लेकिन दुखद यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस मामले पर ध्यान नहीं दे रही है।
 
मुंबई में हुए 26/11 हमले के पीछे एफबीआई की नैतिक विफलताएं भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। एफबीआई जानती थी कि हेडली के पास दाऊद गिलानी के नाम से अमेरिकी पासपोर्ट था। इसके बावजूद उसने पाकिस्तान और भारत की नियमित यात्राएं करने से पहले डेविड कोलमैन हेडली के नाम से एक नया अमेरिकी पासपोर्ट हासिल कर लिया।
भारत में जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे नाम से पासपोर्ट लेना चाहता है, तो उस पर उसका पुराना नाम भी अंकित होता है। कई अन्य देशों में भी सुरक्षा कारणों से इस प्रावधान का पालन किया जाता है। आश्चर्यजनक है कि एफबीआई ने ऐसी व्यवस्था नहीं की है। नतीजतन जब शिकागो में भारतीय दूतावास ने हेडली के लिए मल्टी-इंट्री वीजा जारी किया, तो वह उसके इतिहास से अवगत नहीं था। मुंबई हमले के बाद हेडली की उन भारत यात्राओं के बारे में पता चला जो उसने हेडली के नाम से की थीं, लेकिन क्या हमें उसके नाम बदलने से पहले की गई भारत यात्राओं की कोई जानकारी है?

दूसरे, एफबीआई जानती थी कि ड्रग इंफोर्समेंट एजेंसी के लिए की गई पाकिस्तान यात्राओं के दौरान वह भारत भी आता-जाता रहा है। यहां तक कि आतंकवादी हमलों के बाद भी एक बार वह भारत आया था। मुंबई हमले से पहले एफबीआई ने भारत को सचेत करने की जरूरत नहीं समझी। शायद उसे डर था कि ऐसा होने पर उसके ड्रग इंफोर्समेंट एजेंसी का एजेंट होने का भी खुलासा हो जाएगा।

दूसरी ओर भारतीय खुफिया तंत्र की ओर से भी गंभीर चूकें हुईं। शिकागो में भारतीय दूतावास ने गैर-जिम्मेदाराना तरह से मल्टी एंट्री वीजा के लिए हेडली के मामले की पड़ताल की। इस वीजा की मदद से हेडली अक्सर पाकिस्तान से भारत और फिर से पाकिस्तान की यात्राएं करता रहा। एक बार भी हमारे आप्रवासन विभाग ने उसकी इन यात्राओं पर सवाल नहीं उठाया और भारत में उस पर नजर रखने की जरूरत नहीं समझी।

अभी तक मुंबई हमले में हेडली और राणा की भूमिका का ठीक से पता नहीं चल पाया है। यह बहुत जरूरी है कि मुंबई हमले में मारे गए भारतीय, अमेरिकी, इस्राइली और अन्य विदेशियों के संबंधी इस मामले को लेकर भारत और अमेरिका की अदालतों के समक्ष ले जाएं, ताकि सच सामने आए।
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