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दरिया की पेशानी पर..

Sat, 21 Dec 2013 08:42 PM IST
अखिलेश तिवारी
अखिलेश तिवारी Updated Sat, 21 Dec 2013 08:42 PM IST
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Darya on the forehead ..

दरिया की पेशानी पर...

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हंसना-रोना, पाना-खोना, मरना-जीना, पानी पर
पढ़िए तो क्या-क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर।

महंगाई है दाम मिलेंगे सोचा था हमने लेकिन
शर्मिंदा होकर लौटे है ख्वाबों की अर्जानी पर।

अब तक उजड़ेपन में शायद कुछ नज्जारों लायक है
वरना जमघट क्यों उमड़ा रहता है इस वीरानी पर।

रात जो आंखों में चमके जुगनू मैं उनका शाहिद दूं
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर।

सुबह-सवेरा दफ्तर, बीवी, बच्चे, महफिल, नींदें, रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर।

उसकी सपनों वाली परियां क्यों मैं देख नहीं पाता
बच्चा हैरां है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर।

एक अछूता मंजर मुझको छूकर गुजरा था, अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर।

-अखिलेश तिवारी
इनके शब्दों से गुजरते हुए लगता है कि अतीत वर्तमान बनकर सामना कर रहा हो। लखनऊ में रहते हैं।

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