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बैसवारा में कविता की खेती
कैलाश वाजपेयी
Updated Sat, 30 Mar 2013 11:07 PM IST
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कविता हमें मुंबई ले आई थी और झोली में आ गिरी नौकरी। राममनोहर के ससुर पंडित शिवकुमार वाजपेयी को जब यह सूचना मिली तब उन्होंने आशीष देते हुए कहा, ‘अब विधिवत गृहस्थी बसाने की बात सोचो।’
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हमने झिझकते हुए कहा, ‘अपना इरादा तो अजीवन अविवाहित रहने का है’ हमारा उत्तर सुनकर शिवकुमार जी जोर से हंसे, फिर बोले, ‘प्रकृतिं यांति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति’ जानते हो यह किसने कहा है? हमें गुमसुम देखकर उन्होंने समझाना शुरू किया-
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प्रकृतिं- प्रकृति को
यांति-प्राप्त होते हैं
भूतानि-सभी प्राणी
निग्रह: -हठ
किं-क्या
करिष्यति- करेगा।
‘सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं , फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा’, ये हैं महाभारतकार वेदव्यास के शब्द। इस महाकवि की ऋषिप्रज्ञा का ध्वन्यर्थ समझो। यहां अपनी खुशी से न कोई आता है, न जाता है। एक नहीं दिख पड़ने वाला जाल है। हम सब इसी जाल में फंसे भुनगे हैं। भुनगे भी नहीं, एक त्रसरेणु। जो हुआ नहीं कि होकर फिर नहीं भी हो जाता है।' हम बिना हस्तक्षेप किए देर तक शिवकुमार जी को सुनते रहे।
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फिर एक यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा धकियाए जाकर अगले दिन टाइम्स ऑफ इंडिया पहुंच गए। वहीं दूसरे तल के एक हिस्से पर बैठते थे श्री रतनलाल जोशी, जिनके लिए अपारदर्शी शीशा लगाकर बनाया गया था एक प्रकोष्ठ। रतनलाल जोशी, समस्त प्रकाशनों, के सलाहकार के रूप में वहीं स्थापित थे। हमारे लिए इसी प्रकोष्ठ में एक और मेज कुर्सी पहले से ही खाली पड़ी थी। अस्तु यहीं से अपनी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ।
रतनलाल जोशी से मिलने जो भी आता, हमारा भी परिचय उस अध्यागत से करवाया जाता। दूसरे दिन हमसे मिलने, धर्मयुग के उपसंपादक संपत ठाकुर आए। सालों पहले के बैसवारा अंचल छोड़कर मुंबई आ गए थे। कुछ समय पूर्व ही बांद्रा की 246 वाटरफील्ड रोड पर बने मंजु विला नामक भवन में उन्होंने एक फ्लैट खरीदा था। बैसवारा के डॉ. राम विलास शर्मा और निराला जी का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि मात्र सौ रुपया महीने पर वे मुझे अपने यहां पेइंग गेस्ट के रूप में रख लेंगे। उनकी पत्नी नीला को भी इस प्रस्ताव पर कोई एेतराज न होगा।
हमने संपत ठाकुर से उसी क्षण हां कहकर दूसरी शाम अपना डेरा बदल दिया। लंबे अंतराल के बाद जब लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित द्वारा लिखित 'अवध के बैसवारा अंचल' का विशद विवरण पढ़ने को मिला, तब अपनी आंखें खुलीं। प्रो. दीक्षित के अनुसार -बैसवारा में कविता की खेती होती रही है। बैसवारा के आदि कवि हैं, मुल्ला दाउद, जिन्हें प्रेमाख्यानक काव्य परंपरा का प्रथम सूफी कवि माना जाना चाहिए।
'चंदायन' के रचयिता मुल्ला दाउद, 'पद्मावत' के जायसी और 'इंद्रावती' के रचयिता नूरमुहम्मद, ये तीनों महाकवि बैसवारा ही में जन्में। लोककला, दर्शन, अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना की दृष्टि से ये सभी कृतियां अनमोल हैं। सुवंश शुक्ल ने उमराव कोश नाम से अमरकोश का अनुवाद किया। शंभुनाथ बंदीजन ने 'रामविलास रामायण' और उनके प्रपौत्र ने 'राधा भोगविलास' जैसी कृतियों का सृजन किया, जबकि थान कवि ने दौलत प्रकाश का, शिवसिंह सरोज के लेखक शिवसिंह सेंगर यहीं हुए। सरस्वती पत्रिका के संपादक युग निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मस्थली भी अपना बैसवारा ही है। यहां हुए शताधिक कवि-साहित्यकारों में से कुछ के नाम हम पाठकों की सूचना के लिए दे रहे हैं।
महाप्राण निराला, शिवमंगल सुमन, तीसरा सप्तक के कवि प्रयागनारायण त्रिपाठी, माधुरी के संपादक, रूपनारायण पांडे, यशस्वी साहित्यकार पं.प्रताप नारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा, कृष्णायन के रचयिता द्वारका प्रसाद मिश्र, राममनोहर, युगगुरु गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, विद्यावती जी, सुमित्राकुमारी सिन्हा, रामचंद्रोदय के रचयिता महाकवि रामनाथ शुक्ल, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त अशोक वाजपेयी (रेडियो समाचार वाचक), रमई काका, देवीशंकर अवस्थी, अजित कुमार, आधुनिक रसखान, सुकवि रशीद, प्रो.कृष्णदत्त वाजपेयी, कीर्ति चौधरी नवीन, अमर बहादुर सिंह, चित्रा मुद्गल, काका बैसवारी, दिवाकर जी एवं राजेंद्र अवस्थी आदि।