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कोरोना संकट के बीच निर्यात पर नजर

Wed, 29 Apr 2020 01:32 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Wed, 29 Apr 2020 01:32 AM IST
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Coronvirus News In Hindi : close eye on Export
Export - फोटो : Export

यकीनन कोरोना संकट की वजह से दुनिया में संरक्षणवाद की चुनौती बढ़ती दिखाई दे रही है। ऐसे में भारत को वैश्विक संरक्षणवाद से अपने लोगों और अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने की नई रणनीति पर काम करना होगा। वैश्विक संरक्षणवाद से देश को बचाने और तेजी से विकास करने के लिए पंचायती राज दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का जो मंत्र दिया है, उसे अब कारगर बनाना होगा। गौरतलब है कि अब भी कोविड-19 से भारत के ज्यादा प्रभावित न होने का प्रमुख कारण हमारे घरेलू बाजार की मजबूती और विदेश व्यापार पर कम निर्भरता ही है। दुनिया के कुल निर्यात में भारत का योगदान मात्र 1.7 फीसदी है और दुनिया के कुल आयात में भारत का हिस्सा 2.5 फीसदी ही है।


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हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक आदेश जारी कर अमेरिका में आप्रवास (इमिग्रेशन) पर साठ दिनों के लिए पाबंदी लगा दी है। डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से एच-1बी वीजा के जरिये अमेरिका में प्रवेश पाने वाले प्रभावित होंगे। एच-1बी वीजा एक गैर प्रवासी वीजा है, जो भारत के आईटी प्रोफेशनल के बीच काफी लोकप्रिय है। अमेरिका हर साल करीब 85,000 विदेशियों को एच-1बी वीजा जारी करता है। इस श्रेणी का 70 प्रतिशत से अधिक वीजा भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को मिलता है। अभी करीब 100 भारतीय कंपनियां अमेरिका में काम करती हैं। इनके कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड भी एक बड़ा मुद्दा है। इसलिए अमेरिका के नए संरक्षणवादी कदम से भारतीय आईटी कंपनियों को भारी हानि होगी।

हालांकि पहले भी ट्रंप का संरक्षणवादी चेहरा दुनिया देख चुकी है। बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने पहले भाषण में डोनाल्ड ट्रंप का संदेश बिल्कुल स्पष्ट था-'अमेरिका फर्स्ट'। यह संदेश अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संरक्षणवादी दौर में दाखिल होने की एक तरह से घोषणा ही थी। अब स्पष्ट है कि कोविड-19 की चुनौतियों के बीच अमेरिका और अन्य कई देश कोरोना संक्रमण से बचने और अपने कारोबार को बचाने के लिए अधिक संरक्षणवादी रवैया अपना रहे हैं। इसमें दोमत नहीं है कि सभी देशों के सामने जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में हिस्सेदारी को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है, वहीं घरेलू उत्पादन और उपभोग को विदेशी अर्थव्यवस्थाओं से बचाने की चिंताएं भी खड़ी हो गई हैं। ऐसे में भारत के लिए भी संरक्षणवाद नई जरूरत बन गई है।

पिछले दो वर्षों-2018 और 2019 में जहां अमेरिका, चीन, मैक्सिको, कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीना, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और यूरोपीय संघ के विभिन्न देशों ने भारत की कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर भारत के निर्यात को हतोत्साहित किया, वहीं कई देशों ने भारत के बाजार को खोलने और भारत में आयात बढ़ाने का अनुचित दबाव बढ़ाया। ऐसे में भारत का विदेश व्यापार असंतुलन बना हुआ है। हाल ही में जारी भारत के विदेश व्यापार के नए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 में देश का निर्यात 4.78 प्रतिशत गिरकर 314 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 467 अरब डॉलर रहा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा 153 अरब डॉलर रहा। इसलिए अब भारत को भी आयात-निर्यात के क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने के लिए संरक्षण की नई रणनीति पर आगे बढ़ना होगा।

इसमें कोई दोमत नहीं है कि कोरोना वायरस की चुनौतियों के बीच भी भारत निर्यात बढ़ाने की पूरी संभावनाएं रखता है। इसके लिए जरूरी है कि सरकार द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज), एक्सपोर्ट ओरिएंटेड यूनिट (ईओयू), औद्योगिक टाउनशिप एवं ग्रामीण इलाकों में काम कर रही निर्यात इकाइयों को और अधिक प्रोत्साहन दिए जाएं। देश में 238 सेज के तहत 5,000 से अधिक इकाइयों में 21 लाख से अधिक लोग काम कर रहे हैं। पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में सेज इकाइयों से करीब 7.85 लाख करोड़ रुपये का निर्यात किया गया था। निश्चित रूप से नए प्रोत्साहनों से सेज और ईओयू में कार्यरत निर्यातक इकाइयों से निर्यात में बड़ी वृद्धि की जा सकती है।

इस समय देश के निर्यात क्षेत्र को उत्पादक बनाने के लिए सरकार को सहारा बनकर खड़ा होना होगा। देश के निर्यात क्षेत्र की नौकरियां भी बचानी होंगी। चूंकि अमेरिका यूरोप सहित कई देशों के बड़े ग्राहकों की ओर से दिए गए विदेशी ऑर्डर रद्द किए जा रहे हैं। ऐसे में आगामी दो माह-मई और जून की अवधि निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि इन महीनों में भारत निर्यात के लिए उपयुक्त उत्पादन नहीं करता है, तो वह पूरे वर्ष के लिए विदेशी खरीदारों की योजना से बाहर हो जाएगा। इसलिए इस क्षेत्र द्वारा जिस राहत पैकेज की अपेक्षा की जा रही है, उसके लिए सरकार को शीघ्र कदम उठाने चाहिए।

यह भी जरूरी है कि वैश्विक निर्यात-बाजार में चीन के प्रति बढ़ती हुई नकारात्मकता और भारत की बढ़ती अहमियत के मद्देनजर अब कोविड-19 के बीच निर्मित हो रहे नए निर्यात अवसरों को मुट्ठी में करने के लिए सरकार द्वारा देश के निर्यातकों को निर्यात संरक्षण दिया जाए। भारतीय निर्यातकों के संगठनों का कहना है कि कोविड-19 के बीच भारत के मुकाबले कई छोटे-छोटे देश मसलन, बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड जैसे देशों ने अपने निर्यातकों को कई सुविधाएं देकर भारतीय निर्यातकों के समक्ष कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। इसलिए निर्यात को प्राथमिकता वाले क्षेत्र में शामिल किया जाना होगा। सभी निर्यातकों के लिए सस्ती दर पर कर्ज और ब्याज सब्सिडी बहाल की जानी होगी।

हमें संरक्षणवाद की चुनौतियों के बीच आत्मनिर्भरता के छिपे हुए अवसर भी तराशने होंगे। देश को आत्मनिर्भर बनाने की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ाना होगा। प्रधानमंत्री के मुताबिक, कोरोना संकट ने हमें सबसे बड़ा सबक यह दिया है कि अब हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। बिना आत्मनिर्भर बने कोरोना जैसे संकटों का मुकाबला नहीं हो सकता। उम्मीद करें कि वैश्विक संरक्षणवाद की बढ़ती हुई चुनौतियों के बीच आयात-निर्यात संबंधी नई रणनीति तथा देश की नई पीढ़ी के द्वारा ग्रामीण और शहरी भारत के अमूल्य संसाधनों के पूर्ण उपयोग से देश आत्मनिर्भर और विकसित बन सकेगा। (लेखक आर्थिक विश्लेषक हैं।)

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