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कोरोना का दूसरा पक्ष
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कोरोना वायरस- सांकेतिक
- फोटो : PTI
चिकित्सा विशेषज्ञ कहते आ रहे हैं कि कोरोना वायरस वुहान के पशु बाजारों में बिकने वाले जंगली जानवरों से फैला है। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि वुहान चीन के एकमात्र और चौथे स्तर की उच्चतम माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला के लिए भी जाना जाता है।
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यह वायरस वुहान की माइक्रोबायोलॉजी लैब से भी आया हो सकता है। संजीव शुक्ला ने एक अंग्रेजी अखबार के अपने ब्लॉग में लिखा है कि पिछले वर्ष अगस्त में कनाडा की पुलिस ने विन्नीपेग (जहां कनाडा की एकमात्र चौथे स्तर की माइक्रोबायोलॉजी लैब है) में बौद्धिक संपदा चुराने के आरोप में चीन के एक जोड़े को गिरफ्तार किया था, ये दोनों वुहान स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी का दौरा भी कर चुके थे।
संजीव शुक्ला ने यह भी बताया है कि चीनी सेना के जनरल झैंग शिबो ने अपनी किताब 'वार'स न्यू हाई लैंड' (2017) में नस्लीय जैविक हमलों का जिक्र किया था। उससे पहले 2015 में चाइनीज एकेडेमी ऑफ मिलिटरी मेडिकल साइंसेज के उपाध्यक्ष हे फुचु ने युद्ध की नई रणनीतिक ऊंचाई के तौर पर जैविक चीजों का जिक्र किया था।
इसे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2017 में दिए गए उस बयान से जोड़ें, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि वह चीन को 2035 तक शीर्ष स्तर का नवोन्मेषी और दुनिया को प्रभावित करने वाला अग्रणी राष्ट्र बनाना चाहते हैं। चीन अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और वह अपनी सैन्य क्षमताओं को भी मजबूत कर रहा है, पर जैव-रासायनिक युद्ध क्षमता के मामले में वह पश्चिम की बराबरी नहीं कर पाया है।
एक अंग्रेजी अखबार में छपे एक लेख के मुताबिक, चीन इस समय पांच जैव-रासायनिक हथियार प्रयोगशालाओं की स्थापना कर रहा है, जबकि अमेरिका, यूरोप, रूस और ऑस्ट्रेलिया में ऐसी लगभग 50 प्रयोशालाएं काम कर रही हैं या निर्माणाधीन हैं। लेकिन इबोला या मारबर्ग जैसे खतरनाक वायरसों का अध्ययन देश में वायरस का आयात किए बिना नहीं किया जा सकता। और अब ऐसी खबरें हैं कि कैसे चीनी वैज्ञानिकों को अमेरिका में प्रयोगशालाओं से जानकारी और जैव रासायनिक सामग्री चुराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
पिछले सप्ताह अमेरिकी न्याय विभाग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर चार्ल्स लेइबर की वुहान विश्वविद्यालय के साथ संबद्धता के कारण गिरफ्तारी की, उन्हें 50,000 डॉलर और अन्य खर्चों के लिए 1,58,000 डॉलर प्रति माह मिलते थे। चार्ल्स अन्य वैज्ञानिकों को लुभाने के लिए लाखों डॉलर का एक कार्यक्रम भी चला रहे थे, ताकि वे अपनी अनुसंधान विशेषज्ञता चीन के साथ साझा करें। एक और चीनी नागरिक जेंग झाओ जैंग को तब गिरफ्तार किया गया, जब वह चीन जाने के लिए विमान में सवार था। उसके सामान में से अमेरिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान केंद्र से चुराई गई जैविक सामग्रियों की 21 शीशियां पकड़ी गईं। हाल ही में अमेरिकी अटॉर्नी जनरल ने चीन को अमेरिका का प्राथमिक दुश्मन बताया था।
लेकिन अब कोरोना के कारण पश्चिमी दुनिया में हजारों लोगों की मौत यूरोपीय देशों के लिए भी चिंतित करने वाली है कि यह दुनिया में सर्वोच्च शक्ति के रूप में उभरने के चीन के निर्मम एजेंडे का हिस्सा हो सकता है। हालांकि चीन पहले ही वायरस को चीन में लाने और उसकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर देने के लिए अमेरिका को दोषी ठहरा चुका है। पहले यह आरोप सही प्रतीत होता था, क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था को लगभग 348 अरब डॉलर और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को करीब 15 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान था। पर अब जब दुनिया वायरस से लड़ रही है, तब चीन की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है।
जो लोग तर्क देते हैं कि चीन में भी वायरस ने भारी संख्या में लोगों की जान ली, तो उसका जवाब यह है कि चीन ने अपने यहां इस वायरस को फैलने दिया। वुहान में वायरस की पहली रिपोर्ट आने के बाद बीजिंग ने यह सुनिश्चित हो जाने के लिए दो हफ्ते तक इंतजार किया कि कोरोना वायरस एक से दूसरे मनुष्य में फैल रहा है। क्या वुहान में संक्रमित लोग नए दौर के गिनिपिग थे? जिन डॉक्टरों ने वायरस के प्रति आगाह किया, उन्हें खामोश कर दिया गया। याद रखना चाहिए कि 1958 से 1962 के बीच चीन में माओ के 'ग्रेट लीप फॉरअर्ड' के दौरान 4.5 करोड़ मारे गए थे। पर माओ को उसकी परवाह नहीं थी।
दूसरी तरफ भारतीय मूल के अमेरिकी डॉ. शिवा जैसों का तर्क है कि अमेरिकी फार्मा उद्योग द्वारा कीटाणुओं को छोड़ा गया है, जिन्हें दवा की बिक्री के साथ मुनाफा कमाने की जरूरत है। उन्होंने जो डर पैदा किया है, वह हम सबको इस वायरस से लड़ने के लिए टीकाकरण को प्रेरित करेगा। चूंकि मानव शरीर हजारों तरह के वायरस के प्रति संवेदनशील है, इसलिए इन कीटाणुओं से बचाव के लिए कोई एक टीका नहीं हो सकता। पर अमेरिकी दिग्गज दवा कंपनियां नियमित रूप से टीकाकरण को हमारी नियति बना देंगी।
ऐसे में, यह बेहद प्रासंगिक सवाल है कि क्या चीन या अमेरिका इस तरह की योजना पर काम कर रहे हैं। इससे मुकाबला करने के लिए हमारे पास क्या तैयारी है? वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने अभी तक कोविड-19 का ठीक ही मुकाबला किया है। पर जैव-रासायनिक हमले से निपटने की हमारी तैयारी क्या है?
पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया ने लिखा था कि हालांकि भारतीय सेना को रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु हमलों के लिए तैयार रहने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, पर ये कार्यक्रम संसाधनों की कमी के कारण ठंडे बस्ते में हैं। हमारी विशाल आबादी फैली हुई है, स्वास्थ्य सुविधाएं खराब हैं, कनेक्टिविटी खराब है और हर राज्य सरकार अपने-अपने तरीके से इससे जूझ रही है। ऐसे में अगर जैव-रासायनिक हमला होता है, तो उसका नतीजा भीषण हो सकता है। (लेखक रणनीतिक विश्लेषक हैं।)