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बना रहा हूं शब्दों का घर

Shamsur Rahman Faruqi शम्सुर्रहमान फारुकी
Updated Wed, 08 Apr 2020 02:48 AM IST
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coronavirus : Making words home

इसमें तो कोई शक नहीं कि ऐसी मुसीबत दुनिया में पहले कभी नहीं आई। हां, दशकों पहले फ्लू आया था। चिंताजनक बात यह है कि फ्लू की तरह ही कोरोना का भी कोई आसान और सटीक इलाज नहीं है। बहरहाल हम फिर भी बहुत खुशकिस्मत लोग हैं कि यूरोप सहित दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा हमारे देश में इसका प्रकोप उस तरह से भयावह नहीं है, जैसा वहां है। जबकि हमारे देश की अपेक्षा यूरोपीय देशों में बहुत ज्यादा साफ-सफाई है।


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अब इस दौर में हमें उस पर अमल करना है, जो प्रधानमंत्री की अपील और शासन के निर्देश हैं। इनका ज्यादा से ज्यादा पालन करें। ज्यादा मेल-मिलाप न करें और अपने घरों में ही सीमित रहें। हां, इस दौर में उनके लिए ज्यादा मुसीबत बढ़ गई है, जो रोज कुआं खोदते और पानी पीते यानी रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं। लॉकडाउन करने के बाद तमाम तरह के इंतजामों के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन नोटबंदी की तरह से ही लॉकडाउन करने के बारे में भी पहले से कोई तैयारी नहीं की गई।

लोगों को लगता है कि लॉकडाउन के दौरान बहुत ज्यादा वक्त मिल गया है लेकिन मेरी दिनचर्या और मसरूफियत में कोई खास तब्दीली नहीं आई है। उम्र का तकाजा है, बहुत ज्यादा चल-फिर नहीं सकता, इसलिए कहीं आने-जाने की बात नहीं है, घर में ही हूं। वैसे भी मेरी बहुत घूमने-फिरने की आदत नहीं है। लिखने-पढ़ने में अब भी ज्यादा वक्त बीत रहा है। हां, ज्यादा हो जाता है, तो ज्यादा आराम कर लेता हूं, बस।

उर्दू से उर्दू की एक ऐसी डिक्शनरी तैयार कर रहा हूं, जिसमें शायरी और दास्तानों में शामिल तमाम पुराने अलग तरह के शब्द शामिल हैं। फिलहाल पंद्रहवीं शताब्दी के बाद से लेकर अब तक के तकरीबन ग्यारह हजार ऐसे शब्द जुटा लिए हैं, जिनके आसान मायने तलाशे हैं। हां, इस काम की रफ्तार जरा धीमी है। अगर रोजाना दस-पंद्रह शब्द भी मिल गए, तो बड़ी बात है। इसमें उत्तर भारत के ज्यादातर शब्द हैं, दक्षिण में प्रचलित शब्द कुछ कम ही हैं।

जहां तक पढ़ने की बात है, गालिब और मीर तो वैसे भी हर वक्त मेरे साथ, मेरे जेहन में रहते हैं, इन दिनों कई पुरानी किताबें दोहरा रहा हूं। इसमें उपन्यास ज्यादा हैं। आरएसएस के बारे में भी पढ़ रहा हूं। मेरे नीचे के कमरे में ही तकरीबन आठ हजार किताबें होंगी और इतनी ही किताबें ऊपर भी रखी हैं। इन दिनों इकबाल के अतिरिक्त शेक्सपीयर की कहानियां पढ़ रहा हूं।

इनमें कई तथ्य ऐसे मिल रहे हैं, जो मेरी कहानी में काम आने लायक हैं। शेक्सपियर की रचनाओं के इतने पहलू हैं कि जब भी कोई किताब पढ़ो, हमेशा एक नई बात खुलती है और हम अचरज में पड़ जाते हैं कि अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। हर बड़े लेखक के साथ यही बात होती है, इसलिए यह किताबें हर दौर में मौजूं बनी रहती हैं। फिलहाल एक लंबी कहानी लिख रहा हूं, इंसान के  बारे में।

मसलन हम कौन हैं, हमारा क्या होगा। इस दुनिया में किस मकसद से आए, क्या वह मकसद पूरा कर पा रहे हैं। हम दुनिया को क्या देकर या यहां से क्या लेकर जाएंगे, वगैरह, वगैरह। सवाल पुराने हैं, हर दौर में लोगों ने अपने-अपने ढंग से इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है। मैं भी कर रहा हूं। हो सकता है कि कोई नई बात समझ में आए। हो सकता है कि पढ़ने वालों को कुछ ऐसा मिले, जो उनके जानने में कुछ नया जोड़े। (लेखक मशहूर साहित्यकार हैं।)

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