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हम लोग और हमारे लोग
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जम्मू में लॉकडाउन के दौरान लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया।
- फोटो : PTI
जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है, राजनीति में एक हफ्ते का वक्त लंबा समय होता है। लेकिन भारत की व्यवस्थागत उदासीनता के परिदृश्य में छह हफ्ते का लंबा समय भी राजनीतिक दलों और नीति निर्माताओं के लिए पर्याप्त नहीं है कि वे प्रवासी श्रमिकों को घर लौटने की सुविधा प्रदान करने के लिए एक ठोस नीति तैयार कर सकें।
बीते शुक्रवार को सुबह साढ़े पांच बजे औरंगाबाद के पास मालगाड़ी की चपेट में आने से 16 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई, जब वे जालना से शहडोल तक की 900 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर रहे थे। थके हुए वे मजदूर यह उम्मीद कर रहे थे कि 'वो सुबह कभी तो आएगी', लेकिन दिन की शुरुआत होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।
24 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ये मजदूर अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं और अपने नियोक्ताओं तथा राज्य द्वारा कोई सुध नहीं लिए जाने के कारण भय के चलते पैदल ही अपने गांव घर की ओर जा रहे हैं अथवा विभिन्न राज्यों में नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे फंसे हुए हैं।
प्रवासी मजदूर, जो 28 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के चक्र को चलाते हैं, खुद को बेरोजगार, भूखा पा रहे हैं, जिनसे उम्मीद की किरणें और बुनियादी अधिकार छीन लिए गए हैं और उन्हें बेआवाज छोड़ दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवासी श्रमिक इस व्यवस्था में अनाथ या कम से कम नाथहीन हैं और इस पर हमें आश्चर्य करना चाहिए-अजब तोरी दुनिया हो मोरे रामा!
औरंगाबाद में हुई त्रासदी अनसुलझी रह गई समस्या का केवल एक नृशंस उदाहरण है। इस त्रासदी की व्यापकता पर विचार कीजिए। आवाजाही करने वाले प्रवासी मजदूरों की अनुमानित संख्या दस करोड़ से ज्यादा है, जो मोटे तौर पर जर्मनी, ब्रिटेन और कनाडा के संयुक्त कार्यबल के बराबर है।
एक राष्ट्र, जो अपनी व्यापकता और जटिलताओं पर गर्व करता है- एक अरब से अधिक की आबादी, 90 करोड़ मतदाताओं के साथ चुनाव का प्रबंधन, एक अरब लोगों को आधार से पंजीयन, और चंद्र मिशनों का शुभारंभ इत्यादि- खुद को विचित्र निर्णयों के बाद अनिर्णय की स्थिति में पा रहा है!
विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक गुस्से की घटनाओं के कारण अंततः भारत सरकार ने घोषणा की कि भारतीय रेलवे प्रवासी मजदूरों को ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाएगा। हालांकि इस योजना का कार्यान्वयन कई मंजूरियों पर निर्भर था। गाड़ियों की मांग राज्यों से अपेक्षित थी।
आम तौर पर सवाल यह था कि रेल का किराया कौन देगा। 'किराये का भुगतान हम करेंगे' की भगदड़ के बाद काफी राजनीतिक बयानबाजी हुई। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिरकार कौन किराये का भुगतान करेगा-रेलवे या राज्य। लेकिन आप मानें या नहीं, राज्यों ने बेरोजगार श्रमिकों को टिकट की कीमत का 15 फीसदी भुगतान करने के लिए कहा है!
महत्वपूर्ण बात यह है कि लॉकडाउन में प्रवासी श्रमिक केवल तभी घर जा सकते हैं, जब उनके गृह राज्य उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं। कई राज्यों, मसलन बिहार और पश्चिम बंगाल ने इसका विरोध किया और यहां तक कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र से आने वाली ट्रेनों की मंजूरी रद्द कर दी। बिहार के हजारों मजदूर, जो ट्रेन से जाने के लिए केरल का कैंप छोड़ चुके थे, अपने घर नहीं जा सके।
संक्रमण का डर समझ में आता है। लेकिन संकट खौफनाक राजनीतिक दर्पण में खुद को चमकाने का अवसर नहीं होता है, जिसमें लोगों को बाहर रखकर राज्य मामलों का बोझ कम करना चाहता है! विज्ञान और सिंगापुर का अनुभव दर्शाता है कि संकरी जगहों पर श्रमिकों को ठूंसकर रखने से संकामक रोगों का प्रसार बढ़ता है।
राजनीतिक उदासीनता के कारण बहुत से भारतीय घर से निकलना शुरू कर चुके हैं, जो घातक संक्रमण को बढ़ा रहा है। श्रमिकों के परिवहन की निर्विवाद आवश्यकता लगातार विवादों में है। नीति आयोग के एक सदस्य ने कहा कि प्रवासी मजदूरों की भगदड़ को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ने के लिए तैयार है, मानो प्रवासी श्रमिक बंधुआ मजदूरों का आधुनिक संस्करण हैं!
कर्नाटक सरकार को बिल्डरों ने समझाया कि प्रवासी मजदूरों के जाने से काम रुक जाएगा, इसलिए ट्रेनों को रद्द कर दिया गया। ओडिशा में, जहां अन्य राज्यों के पांच लाख से अधिक श्रमिक हैं, उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जो कोविड-19 की जांच में निगेटिव पाए जाएंगे, सिर्फ उन्हें ही वापस जाने की अनुमति मिलनी चाहिए, इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
इन तमाम अराजकता के बीच रेलवे, जो हर दिन 250 से ज्यादा ट्रेनें चला सकता है, छह दिनों में केवल 250 ट्रेनें ही चला पाया। हैरानी की बात नहीं कि इसके बाद हिंसक प्रदर्शन हुए। सूरत में घर जाने की अनुमति मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों पर आंसू गैस के गोले दागे गए। हैदराबाद में श्रमिक शिवरों में रहने वाले मजदूर घर जाने की व्यवस्था करने के लिए सड़कों पर उतर पड़े। मंगलौर में श्रमिकों ने रेलवे स्टेशन को अवरुद्ध कर दिया।
अगर बड़े पैमाने पर नागरिक अशांति फैल रही है, तो इसका सबसे बड़ा कारण व्यवस्थागत और राजनीतिक सुस्ती है। नौकरशाही के लोग खुद को शासन करने वाले देवता समझते हैं। हालांकि, यह संकट अभूतपूर्व है और इसे पहले से तैयार फार्मूलों से नहीं सुलझाया जा सकता, लेकिन संवाद के माध्यम से राजनीतिक मतभेदों को सुलझाया जा सकता है।
दुखद है कि राजनीतिक सहानुभूति और एकजुटता की गैर मौजूदगी सुस्पष्ट है। यह कोई रहस्य नहीं है कि प्रवासी श्रमिक समूहों में रोजगार क्षेत्रों में जाते हैं। आमतौर पर, राजनीतिक दल चुनावों के दौरान भाषायी और जातिगत समूहों तक पहुंचते हैं। भारत और भारतीयों का प्रतिनिधित्व 788 सांसदों और 4,100 से अधिक विधायकों द्वारा किया जाता है।
यह जानना दिलचस्प होगा कि श्रमिकों के राज्यों के कितने विधायकों और सांसदों ने राहत या श्रमिकों की आवाजाही के लिए नियोक्ता राज्यों में अपने समकक्षों के साथ बात करने के लिए फोन किया। राजनीतिक दलों को यह याद रखना चाहिए, जो पवित्र तिरुक्कुरल में संत कवि तिरुवल्लुवर ने कहा है-गरीबों के आंसू साम्राज्य को डुबो सकते हैं।
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बीते शुक्रवार को सुबह साढ़े पांच बजे औरंगाबाद के पास मालगाड़ी की चपेट में आने से 16 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई, जब वे जालना से शहडोल तक की 900 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर रहे थे। थके हुए वे मजदूर यह उम्मीद कर रहे थे कि 'वो सुबह कभी तो आएगी', लेकिन दिन की शुरुआत होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।
24 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ये मजदूर अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं और अपने नियोक्ताओं तथा राज्य द्वारा कोई सुध नहीं लिए जाने के कारण भय के चलते पैदल ही अपने गांव घर की ओर जा रहे हैं अथवा विभिन्न राज्यों में नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे फंसे हुए हैं।
प्रवासी मजदूर, जो 28 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के चक्र को चलाते हैं, खुद को बेरोजगार, भूखा पा रहे हैं, जिनसे उम्मीद की किरणें और बुनियादी अधिकार छीन लिए गए हैं और उन्हें बेआवाज छोड़ दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवासी श्रमिक इस व्यवस्था में अनाथ या कम से कम नाथहीन हैं और इस पर हमें आश्चर्य करना चाहिए-अजब तोरी दुनिया हो मोरे रामा!
औरंगाबाद में हुई त्रासदी अनसुलझी रह गई समस्या का केवल एक नृशंस उदाहरण है। इस त्रासदी की व्यापकता पर विचार कीजिए। आवाजाही करने वाले प्रवासी मजदूरों की अनुमानित संख्या दस करोड़ से ज्यादा है, जो मोटे तौर पर जर्मनी, ब्रिटेन और कनाडा के संयुक्त कार्यबल के बराबर है।
एक राष्ट्र, जो अपनी व्यापकता और जटिलताओं पर गर्व करता है- एक अरब से अधिक की आबादी, 90 करोड़ मतदाताओं के साथ चुनाव का प्रबंधन, एक अरब लोगों को आधार से पंजीयन, और चंद्र मिशनों का शुभारंभ इत्यादि- खुद को विचित्र निर्णयों के बाद अनिर्णय की स्थिति में पा रहा है!
विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक गुस्से की घटनाओं के कारण अंततः भारत सरकार ने घोषणा की कि भारतीय रेलवे प्रवासी मजदूरों को ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाएगा। हालांकि इस योजना का कार्यान्वयन कई मंजूरियों पर निर्भर था। गाड़ियों की मांग राज्यों से अपेक्षित थी।
आम तौर पर सवाल यह था कि रेल का किराया कौन देगा। 'किराये का भुगतान हम करेंगे' की भगदड़ के बाद काफी राजनीतिक बयानबाजी हुई। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिरकार कौन किराये का भुगतान करेगा-रेलवे या राज्य। लेकिन आप मानें या नहीं, राज्यों ने बेरोजगार श्रमिकों को टिकट की कीमत का 15 फीसदी भुगतान करने के लिए कहा है!
महत्वपूर्ण बात यह है कि लॉकडाउन में प्रवासी श्रमिक केवल तभी घर जा सकते हैं, जब उनके गृह राज्य उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं। कई राज्यों, मसलन बिहार और पश्चिम बंगाल ने इसका विरोध किया और यहां तक कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र से आने वाली ट्रेनों की मंजूरी रद्द कर दी। बिहार के हजारों मजदूर, जो ट्रेन से जाने के लिए केरल का कैंप छोड़ चुके थे, अपने घर नहीं जा सके।
संक्रमण का डर समझ में आता है। लेकिन संकट खौफनाक राजनीतिक दर्पण में खुद को चमकाने का अवसर नहीं होता है, जिसमें लोगों को बाहर रखकर राज्य मामलों का बोझ कम करना चाहता है! विज्ञान और सिंगापुर का अनुभव दर्शाता है कि संकरी जगहों पर श्रमिकों को ठूंसकर रखने से संकामक रोगों का प्रसार बढ़ता है।
राजनीतिक उदासीनता के कारण बहुत से भारतीय घर से निकलना शुरू कर चुके हैं, जो घातक संक्रमण को बढ़ा रहा है। श्रमिकों के परिवहन की निर्विवाद आवश्यकता लगातार विवादों में है। नीति आयोग के एक सदस्य ने कहा कि प्रवासी मजदूरों की भगदड़ को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ने के लिए तैयार है, मानो प्रवासी श्रमिक बंधुआ मजदूरों का आधुनिक संस्करण हैं!
कर्नाटक सरकार को बिल्डरों ने समझाया कि प्रवासी मजदूरों के जाने से काम रुक जाएगा, इसलिए ट्रेनों को रद्द कर दिया गया। ओडिशा में, जहां अन्य राज्यों के पांच लाख से अधिक श्रमिक हैं, उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जो कोविड-19 की जांच में निगेटिव पाए जाएंगे, सिर्फ उन्हें ही वापस जाने की अनुमति मिलनी चाहिए, इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
इन तमाम अराजकता के बीच रेलवे, जो हर दिन 250 से ज्यादा ट्रेनें चला सकता है, छह दिनों में केवल 250 ट्रेनें ही चला पाया। हैरानी की बात नहीं कि इसके बाद हिंसक प्रदर्शन हुए। सूरत में घर जाने की अनुमति मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों पर आंसू गैस के गोले दागे गए। हैदराबाद में श्रमिक शिवरों में रहने वाले मजदूर घर जाने की व्यवस्था करने के लिए सड़कों पर उतर पड़े। मंगलौर में श्रमिकों ने रेलवे स्टेशन को अवरुद्ध कर दिया।
अगर बड़े पैमाने पर नागरिक अशांति फैल रही है, तो इसका सबसे बड़ा कारण व्यवस्थागत और राजनीतिक सुस्ती है। नौकरशाही के लोग खुद को शासन करने वाले देवता समझते हैं। हालांकि, यह संकट अभूतपूर्व है और इसे पहले से तैयार फार्मूलों से नहीं सुलझाया जा सकता, लेकिन संवाद के माध्यम से राजनीतिक मतभेदों को सुलझाया जा सकता है।
दुखद है कि राजनीतिक सहानुभूति और एकजुटता की गैर मौजूदगी सुस्पष्ट है। यह कोई रहस्य नहीं है कि प्रवासी श्रमिक समूहों में रोजगार क्षेत्रों में जाते हैं। आमतौर पर, राजनीतिक दल चुनावों के दौरान भाषायी और जातिगत समूहों तक पहुंचते हैं। भारत और भारतीयों का प्रतिनिधित्व 788 सांसदों और 4,100 से अधिक विधायकों द्वारा किया जाता है।
यह जानना दिलचस्प होगा कि श्रमिकों के राज्यों के कितने विधायकों और सांसदों ने राहत या श्रमिकों की आवाजाही के लिए नियोक्ता राज्यों में अपने समकक्षों के साथ बात करने के लिए फोन किया। राजनीतिक दलों को यह याद रखना चाहिए, जो पवित्र तिरुक्कुरल में संत कवि तिरुवल्लुवर ने कहा है-गरीबों के आंसू साम्राज्य को डुबो सकते हैं।