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कोरोना एक युद्ध अनेक

Sun, 17 May 2020 05:29 AM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Sun, 17 May 2020 05:29 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : war on many front
लॉकडाउन - फोटो : PTI

आपदा का सामना कर रहे देश के समक्ष सबसे बड़ा संकट वे लोग प्रस्तुत करते हैं, जो समाज की एकता के स्वरों में सांप्रदायिक जहर घोलने लग जाते हैं। हमें तो कभी पता ही नहीं था कि दवा की गोली भी मुसलमान हो सकती है, जब तक एक सेक्युलर पत्रकार ने नहीं बताया कि फलां फलां कंपनी मुस्लिम मालिक के तहत काम कर रही है।


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शाहरुख और ताजमहल का भी जिक्र हो गया। तौबा यह क्यों किया गया? क्या इसके जवाब में उनके ही तर्क से 'हिंदू पानी' की बात करने की मूर्खता की जाए, क्योंकि बिसलेरी हिंदू मालिक बनाता है? यह तब किया जा रहा है, जब अधिकांश हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख अपने-अपने रंग और दीवारें भूल कर एक साथ कोरोना के खिलाफ लड़ रहे हैं।

अजीम प्रेमजी से लेकर जामा मस्जिद के मुख्य इमाम और अन्य अनेक मुस्लिम नागरिकों ने सभी नियमों के पालन की अपील भी की और सरकार का साथ भी दिया। लेकिन एक तब्लीगी जमात, जिसका दफ्तर तक गैरकानूनी बना और जिसने मानवीयता के तमाम कायदे तोड़ दिए, सब मुस्लिमों की प्रतिनिधि बनाकर उसकी गलतियों पर कार्रवाई को तमाम हिन्दुस्तानी मुसलमानों के खिलाफ साजिश बताने वाले वस्तुतः आईएस का ही काम आसान कर रहे हैं।

इस्लामिक स्टेट पर नेटफ्लिक्स में खिलाफत शृंखला बनी है, जो सबको जरूर देखनी चाहिए जिसमें बहुत बारीकी से बताया गया है कि कैसे भावनात्मक ज्वार का झूठा प्रपंच फैलाकर आईएस दुनिया के अनेक देशों से नौजवान लड़के लड़कियां भर्ती करता है। इस प्रचार का मूल स्वर रहता है, जो हमने केरल से आईएस में भर्ती दो युवतियों के बयानों में भी देखा कि पहला, भारत में हिंदू राज है, जो मुस्लिमों के खिलाफ है।

दूसरा, हर स्तर पर हर अधिकारी और मोदी की पार्टी के नेताओं द्वारा मुस्लिमों के साथ भेदभाव किया जाता है। मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। तीन, मुस्लिमों की जान और संपत्ति को खतरा है, हर जगह हिंदू उन्मादी उनको मार रहे हैं। वे जान बचाकर भाग रहे हैं। चार, अगर मुस्लिमों को बचना है, तो हिंदुओं के खिलाफ हथियार उठाने होंगे और एक ही रास्ता है- आईएस में शामिल हो जाओ।

भारत से लेकर स्वीडन, अमेरिका तक प्रचार की यही लाइन है। जबकि सत्य यह है कि हर मुस्लिम देश पहले अपने देश का हित देख रहा है, किसी अन्य मुस्लिम देश के साथ गठबंधन तक नहीं है, आईएस सबसे ज्यादा मुस्लिमों को ही मार रही है, और आज के विश्व में प्रतिदिन सर्वाधिक मुस्लिम, केवल मुस्लिम अंतर्विरोधों और आपसी हिंसा में मारे जा रहे हैं।

भारत के मुस्लिम दुनिया के किसी भी देश, और किसी भी इस्लामिक देश के मुस्लिमों की तुलना में स्वतंत्र, मुक्त, अपने हिसाब और पद्धति से बढ़ने वाला समाज है। लेकिन यहीं तब्लीगी ठगों को जो सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में तबाही का पर्याय बन गए हैं,सऊदी में तो इन पर प्रतिबंध है, संपूर्ण मुस्लिमों का प्रतिनिधि बनाकर पेश किया जा रहा है, ताकि उनके आपराधिक व्यवहार के खिलाफ भारतीय संविधान के तहत कोई कार्रवाई न हो।

इसमें अनेक सोशल मीडिया के ऐसे शूरवीर, हिंदू मुस्लिम दोनों, आग में घी डालने का काम करते हैं, जिनका अपने हिंदू मुस्लिम समाज के हित और इसके भविष्य के अध्ययन से कोई वास्ता नहीं होता। वे जिस प्रकार के गाली गलौज को अपनी वीरता मानते हैं, विदेशी अखबार और इस्लामिक स्टेट वाले उनकी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं।

भारत के कुछ लेखक और स्तंभकार तथा राजनीतिक नेता जिस प्रकार की पंक्तियां लिख और बोल रहे हैं, उनकी कुछ बानगियां देखिएः 

1. जर्मनी के एक मीडिया प्लेटफार्म डीडब्लू, पर अरुधंती रॉय कहती हैं,-जबसे यह सरकार आई है, भारत के मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा की लहर चल पड़ी है। कोरोना वायरस के दौरान भारत का मुस्लिमों के प्रति रवैया नरसंहारात्मक। वैसा ही जैसा होलोकॉस्ट के दौरान नाजियों का था। 

2. चीनी सरकारी टीवी सीजीटीएन, वाशिंगटन पर कांग्रेस प्रवक्ता सलमान अनीस सोज का परिचय अर्थशास्त्री और लेखक के नाते कराया जाता है, कांग्रेस प्रवक्ता के रूप में नहीं। वह इस शो में दिल्ली में भाजपा- मोदी राज में मुसलमानों के नरसंहार (पोग्रोम) शब्द का उल्लेख करते हैं। शो उस समय दिल्ली के दंगों पर केंद्रित किया गया, जब देश कोरोना से लड़ रहा था और दंगों की आग बुझ चुकी थी। यह वही वर्ग है, जो गुजरात में भी मोदी के खिलाफ था। उन्हें अयोध्या, कश्मीर से अनुच्छेद 370 और तीन तलाक हटने से नाराजगी है। वे इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाए कि मोदी के सऊदी अरब, ईरान, खाड़ी के देशों, पश्चिम एशिया और इस्रायल के साथ अच्छे संबंध बने। भारत की छवि चमकी। इस परिदृश्य ने उनके अभी लिखे गए तमाम आख्यानों को झूठा साबित कर दिया।

देश हर वर्ग, राजनीति और मजहब, संप्रदाय से बड़ा है। देश है, तो सब होंगे। देश हारेगा तो जीतेगा कौन? सवाल है कि जब देश एकजुट कोरोना से जीत रहा है, तो उसको हारने की ओर धकेलने की कोशिश कौन कर रहा है? और क्यों?

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