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स्थायी आनंद की तलाश में...
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मानवता 'कुछ और' की शाश्वत खोज में लगी है, और उसे उम्मीद है कि यह उसे पूर्ण और कभी न खत्म होने वाला आनंद देगी। लेकिन जिन व्यक्तिगत आत्माओं ने ईश्वर को खोजा और अंततः उसे पा लिया है, उनकी खोज पूरी हो चुकी है : उन्होंने जो कुछ पाया है, वह भी कुछ और है।
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ईश्वर को पाना ही जीवन का उद्देश्य है, इस पर सभी लोग शायद ही विश्वास करें, लेकिन इस विचार को सभी स्वीकार कर सकते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य आनंद की प्राप्ति है। मैं कहता हूं कि ईश्वर ही आनंद है। वह परमानंद है। वह प्रेम है। वह ऐसी खुशी है, जो आपकी आत्मा से कभी अलग नहीं होगी। फिर आप इस आनंद को प्राप्त करना क्यों नहीं चाहते? दूसरा कोई आपको यह चीज नहीं दे पाएगा।
अगर जीवन आपको कभी धन, शक्ति, मित्र आदि वे चीजें दे भी, जो आप चाहते हैं, तो कुछ क्षण बाद आप फिर असंतुष्ट हो जाएंगे और कुछ दूसरी चीजें चाहेंगे। लेकिन एक ऐसी चीज भी है, जो आपके लिए कभी पुरानी नहीं पड़ेगी-यह है आनंद। आनंद के स्तर में अंतर भले हो, लेकिन इसका सत्व अपरिवर्तनीय है, यह वह भीतरी अनुभव है, जिसकी खोज सभी करते हैं। ईश्वर स्थायी और हमेशा नया रहने वाला आनंद है। अपने भीतर इस आनंद को प्राप्त कर आप महसूस करेंगे कि आपने सब कुछ पा लिया है।
सोचें कि जब आपका शरीर विश्राम चाहता है, और दंडस्वरूप आपको विश्राम की अनुमति नहीं मिल रही है, तभी अचानक कोई आपको कहता है, 'ठीक है, अब आप सोने के लिए जा सकते हैं।' सोचें कि वैसे में सोने के लिए जाते हुए आपको कितनी खुशी होगी। उस खुशी को दस लाख से गुणा करें! ईश्वर को पाने से मिली खुशी से यह तब भी कम होगी। ईश्वरीय आनंद सीमाहीन, कभी खत्म न होने वाला और चिरनवीन है। ईश्वर की गरिमा और महिमा ऐसी है कि जब आप इस चेतनावस्था में रहेंगे, तब शरीर और मस्तिष्क-कुछ भी आपका ध्यान भटका नहीं सकेगा। और वह आपको उन सब चीजों की व्याख्या करके बताएगा, जो आप अभी तक नहीं समझ पाए थे; उन सब चीजों के बारे में आपको पता चलेगा, जो आप जानना चाहते हैं।
जब आप गहरे ध्यान में बैठते हैं, तब आपके भीतर से खुशी के बुलबुले फूटते हैं। ध्यान का आनंद परिपूर्ण होता है। जिन्होंने सच्चे ध्यान की चुप्पी का अनुभव नहीं किया है, वे नहीं जानते कि सच्चा आनंद क्या है। जब आपका मस्तिष्क और आपकी सोच अंतर्मुखी होगी, तब आप ईश्वरीय आनंद को महसूस करना शुरू करेंगे। इंद्रियों का आनंद ज्यादा देर नहीं टिकता, लेकिन ईश्वरीय आनंद शाश्वत होता है। यह अतुलनीय है! आलस्य में समय न बिताएं। बहुत-से महान लोग महत्वहीन कामकाज में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा गंवा देते हैं। उनसे पूछिए कि वे क्या कर रहे हैं, तो वे कहेंगे, 'ओह, मेरा एक-एक मिनट व्यस्तता में गुजरता है।'
हालांकि उन्हें शायद ही याद होगा कि वे किस काम में इतने व्यस्त थे! एक मिनट में आपको यह दुनिया छोड़कर जाना पड़ सकता है; तब आपको अपने सारे कामकाज स्थगित कर देने पड़ेंगे। फिर आप उन दूसरे क्रियाकलापों को इतना अधिक महत्व क्यों देते हैं, जिनमें ईश्वर के बारे में सोचने का समय भी आपको नहीं मिलता है? आप जो भी करें, खुशी से और मानवता की सेवा के लिए करें। हमें अपनी सेवाओं को आध्यात्मिक बनाना सीखना होगा। फिर हम काम भी ऐसा करें, जिससे मानवता की सेवा हो। (लेखक आध्यात्मिक गुरू, योगी और संत हैं।)