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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Coronavirus Case News In Hindi : Closed before, now opening

बंद पहले था, अब तो खुल रहा है

Fri, 17 Apr 2020 07:00 AM IST
Jawahar Choudhary जवाहर चौधरी
Updated Fri, 17 Apr 2020 07:00 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Closed before, now opening
lockdown in prayagraj - फोटो : lockdown in prayagraj

वैसे तो मैं अक्सर इस खिड़की के पास बैठता हूं, लेकिन इन दिनों यही एक जगह है, जहां मुझे बैठने का मौका मिल रहा है। यह खिड़की खास तौर पर मुझे पसंद है, क्योंकि यह आंगन में खुलती है और सड़क से होते हुए दूर खड़े आसमान छूते टीवी टावर और उसके बाद अनंत तक दृष्टि को विस्तार दे देती है। नीला साफ आकाश, कुछ टुकड़े बादल, मंडराती चीलें इस वक्त दीख रही हैं।


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अभी लॉकडाउन के चलते प्लेन बंद हैं, वर्ना रोजाना सुबह सात बीस पर मुंबई की पहली उड़ान इसी खिड़की से जाती दिखती है। बांग्ला फिल्मों में जब नायक या नायिका कोई महत्वपूर्ण संवाद बोलकर खिड़की से बाहर देखते हैं, तो दृश्य में दूर एक ट्रेन धुआं उड़ाती गुजरती है। लगता है, ढेर सारा अवसाद ट्रेन के साथ छुक-छुक करता चला गया।

दर्शक एक राहत-सी महसूस करते होंगे। ऐसा ही कुछ प्लेन को देखकर भी लगता है। कई बार जब मन उदास होता है, इस खिड़की से जरूरी ऊर्जा लेकर उठता हूं। आज जब क्वारंटीन में हूं, तो ऑक्सीजन भी यहीं से मिल रही है, ताजा हवा। खिड़कियां हवाओं से कितना याराना रखती हैं। चालीस दिनों के क्वारंटीन में जीवन मानो इस खिड़की पर सिमट आया है।

उम्र के बढ़ते जाने के साथ व्यक्ति का संसार सिकुड़ता जाता है। पिताजी की याद आती है। आपाधापी इतनी कि भोर में निकलते, तो शाम से पहले कभी घर लौटना उनके लिए संभव नहीं था। लेकिन उम्र के साथ वह अनिच्छापूर्वक सिमटते चले गए। शहर से मोहल्ला, गली,  उसके बाद घर आंगन और अंत में बिस्तर। संसार इसी तरह किस्तों में छूटता है शायद।

उस पुराने घर में ऐसी खिड़की नहीं थी, जैसी अभी मेरे सामने है। सही दिशा में खुलने वाली खिड़की हो, तो लगता है, जीवन है और गति बनी हुई है, चाहे बंद क्यों न हो। आप कहेंगे यह भ्रम है। तो बना रहे भ्रम। भ्रम ही आदमी को संन्यास आश्रम तक खेंच लाता है। और सच! राम नाम के साथ मिलकर सत्य हो जाता है। चौबीस दिन हो गए बंद हुए, लेकिन इस खिड़की की वजह से लगता नहीं कि कहीं कुछ छूट रहा है। बल्कि रोज ही ऐसा कुछ नया जुड़ रहा है, जो पहले संज्ञान में नहीं था। मानो बंद पहले था, अब तो खुल रहा है।

सामने अशोक का पेड़ है। पैंतीस-छत्तीस वर्ष हुए इसे बच्चे की तरह लाया था एक नर्सरी से। आज देखता हूं कि कितना बड़ा हो गया है! आम दिनों में इसकी ओर ध्यान ही नहीं गया कभी। हालांकि मई-जून में जब खूब तपन होती है, अपना स्कूटर इसी की छाया में रखता आया हूं, और बारिश में भी। कभी-कभी जब खुले में बैठने का मन होता है, इसके नीचे कुर्सी डालकर बैठता हूं, किंतु ध्यान नहीं दिया। लग रहा है स्वार्थी हूं, मतलबी कहीं का।

लेकिन आज इस खिड़की से अपने इस अशोक को देखते हुए जाने क्यों लग रहा है, जैसे बरसों बाद अपने युवा बेटे से मिल रहा हूं! जैसे आंगन में खड़ा वह मुस्करा रहा है, अभी भी। उसकी खुशी हिलते पत्तों और झूलती डालों से व्यक्त हो रही है। यंत्रवत मेरा हाथ उठता है और अशोक की ओर देखते हुए हिला देता हूं, कुछ ऐसे, जैसे उसे पहचान गया हूं। वह भी झूम उठता है। अशोक ने भी देखा होगा आज मुझे शायद पहली बार गौर से, वर्ना घंटियां-सी क्यों बज रही हैं कानों में। सुना है, अशोक खूब सारी ऑक्सीज़न देता है। देना ही चाहिए, बच्चे ही तो काम आते हैं जीवन के उत्तरार्ध में।

अशोक के नीचे छाया में एक पटिया लगाया हुआ है। बहुत पहले जब लकड़ी का काम चल रहा था घर में, तब पत्नी ने कारपेंटर से खास तौर पर बनवाया था। इस पर मिट्टी के दो सकोरे रखे हैं। एक पानी का और दूसरे में चूरी हुई रोटी होती है। देख रहा हूं कि यहां गिलहरियों का एक कुनबा दिन भर उछल-कूद करता रहता है। बहुत-सी चिड़ियाएं हैं, गौरैया, ललमुनिया, मैना का जोड़ा और कबूतर भी। बहुत छोटी, गहरे काले रंग की दो चिड़िया भी आती है लंबी चोंच वाली। ये रोटी नहीं खाती हैं, गुड़हल का पौधा है, उसके फूलों से कुछ चुनती-सोखती रहती हैं।

इतना मीठा बोलती हैं कि लगता है, जैसे अपने होने का कर्ज उतार रही हैं। आप बैठे सुनते रहिए, जब तक मौका मिले। अमरूद के पेड़ से एक कच्चा फल गिरता है, कुतरा हुआ। यह गिलहरी का काम है, बहुत शैतान है। कितने सारे फल रोज गिरा देती है। सोचता हूं ये आंगन, ये फल वाले पेड़, किलकारियों और उछल-कूद के नाम ही तो थे। लगता है, अकेला नहीं हूं, भरा-पूरा घर है। सबने मिलकर इसे अपना घर बनाया है। जॉइंट फैमिली है हमारी, और हुकुम है क्वारंटीन में रहो! (लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

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