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शानदार शुरुआत से बना भरोसा, देश के टीका उत्पादकों ने निश्चित तौर पर हमें गर्वित किया

Mon, 18 Jan 2021 07:30 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Published by: पत्रलेखा चटर्जी Updated Mon, 18 Jan 2021 07:30 AM IST
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Corona vaccination confidence built from a Fabulous starting indigenous vaccine producers certainly made us proud
Corona vaccination - फोटो : PTI

जिस देश में कोविड-19 से मौत का आंकड़ा 1,51,000 तक पहुंच गया हो और जहां संक्रमितों की संख्या अमेरिका के बाद सबसे अधिक हो, वहां महामारी से निजात पाने के लिए टीकाकरण अभियान की शुरुआत एक स्वागतयोग्य कदम है। अपने देश में शनिवार को देश के हजारों केंद्रों पर टीकाकरण अभियान प्रारंभ हुआ, और आगामी गर्मी तक 30 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य है। पहले दिन देश भर के 3,000 से अधिक केंद्रों पर तीन लाख स्वास्थ्यकर्मियों, सैनिकों तथा स्थानीय निकाय के कर्मचारियों के टीकाकरण का लक्ष्य था, जबकि 1,91,000 से अधिक लोगों ने टीका लगाया। अगले चरण में 50 साल से ऊपर के व्यक्तियों तथा विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 50 से कम उम्र के लोगों को टीका लगाया जाएगा।


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आगामी चरणों में टीकाकरण केंद्रों की संख्या भी बढ़ेगी। भारत का यह अभियान निस्संदेह दुनिया का सबसे विशाल और महत्वाकांक्षी टीकाकरण अभियान है। लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि कम कीमत पर भारी संख्या में वैक्सीन उत्पादन करने के मामले में भारत कोई नया देश नहीं है। सस्ते भारतीय टीके अनेक वर्षों से न सिर्फ लाखों भारतीयों के साथ-साथ अनेक विकासशील देशों के लोगों की भी जान बचाते रहे हैं, बल्कि देश में हर साल 30 करोड़ टीके 2.6 करोड़ नवजात शिशुओं तथा तीन करोड़ गर्भवती स्त्रियों की जान बचाते हैं।

क्या वैक्सीन से महामारी का अंत होगा? चूंकि एक साथ पूरे देश में टीकाकरण की शुरुआत हुई है, इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ आशान्वित हैं कि जल्दी ही महामारी पर अंकुश लगेगा। हालांकि टीकाकरण से महामारी का तत्काल खात्मा नहीं होगा। दुनिया भर में वायरस से संक्रमित होने के मामले जारी हैं और कुछ देशों में तो संक्रमण का आंकड़ा बढ़ भी रहा है। इसलिए टीका लगाने के बाद भी हमें मास्क लगाना होगा तथा हाथ धोते रहने होंगे। हमें यह भी जान लेना होगा कि टीका लगा लेने से तत्काल इम्युनिटी नहीं आएगी। जिन लोगों ने टीका लगाया है, उन्हें इसका एक और डोज लेना होगा और यह भी नहीं पता कि टीके से प्रतिरोधी क्षमता कितने समय तक बनी रहेगी।

देश में टीकाकरण के तहत दो वैक्सीनों का इस्तेमाल हो रहा है। दोनों टीकों का उत्पादन यहीं हुआ है, लेकिन दोनों को मंजूरी बहुत अलग परिस्थितियों में मिली है। इनमें से पहली वैक्सीन कोविशील्ड है, जिसे ब्रिटेन की एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने मिलकर तैयार किया है, और देश में इसका उत्पादन पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ने किया है। दूसरी वैक्सीन कोवाक्सिन है, जिसे हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक ने केंद्र सरकार के सहयोग से तैयार किया है, लेकिन इसके तीसरे चरण के ट्रायल का, जिसमें किसी टीके की
प्रभावोत्पादकता की जांच होती है, आंकड़ा अभी नहीं आया है। भारत बायोटेक ने ट्रायल के पहले दो चरणों के सुरक्षा तथा प्रतिरोधी क्षमता संबंधी आंकड़े पेश किए हैं तथा आने वाले दिनों में अपने टीके की प्रभावोत्पादकता संबंधी आंकड़े भी देगी। लेकिन स्वास्थ्य प्राधिकरण ने क्लिनिकल ट्रायल श्रेणी में आपातकालीन इस्तेमाल के लिए कोवाक्सिन को मंजूरी दी है। हालांकि इसके ट्रायल के दौरान अनियमितता के तथा भोपाल में ट्रायल के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कोवाक्सिन बेहद कारगर वैक्सीन साबित हो सकती है, लेकिन जब तक इसकी प्रभावोत्पादकता से संबंधित आंकड़े नहीं मिलेंगे, तब तक प्रश्न तो खड़े होंगे ही।

चूंकि टीकाकरण अभियान अभी शुरू ही हुआ है, ऐसे में, आने वाले दिनों में पूरे देश पर नजर बनी रहेगी, क्योंकि पूरी दुनिया में यह सबसे बड़ा अभियान है। लिहाजा इस दौरान आने वाली चुनौतियों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हालांकि शनिवार को महाराष्ट्र को छोड़कर, जहां सॉफ्टवेयर की समस्या के कारण टीकाकरण अभियान दो दिन के लिए रोक दिया गया है, बाकी देश में यह अभियान सफल रहा, लेकिन इस बारे में आने वाले दिनों में ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। टीकाकरण अभियान की पहली चुनौती वस्तुतः दोनों ही टीकों के प्रति आम लोगों में भरोसा पैदा करने की होगी। हालांकि इंटरनेट पर वैक्सीन के बारे में काफी भ्रामक जानकारियां हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के भी कुछ जायज सवाल हैं।

ध्यान रखना चाहिए कि ये स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी वैक्सीन के खिलाफ नहीं हैं। उदाहरण के लिए, कोवाक्सिन का टीका लगाने वालों को एक सहमति पत्र दस्तखत करने के लिए दिया जा रहा है, जिसमें लिखा हुआ है कि इसकी चिकित्सकीय प्रभावोत्पादकता का आंकड़ा आना अभी बाकी है। चिकित्सकीय प्रभावोत्पादकता का अर्थ यह बताना है कि वैक्सीन बीमारी को रोकने में सक्षम है या नहीं, और अगर सक्षम है, तो किस हद तक?

टीकाकरण शुरू करने से पहले देश में कई बार ड्राई रन हो चुका है, इसके बावजूद जर्जर स्वास्थ्य ढांचे तथा बेहतर परिवहन व संपर्क सुविधा के अभाव में कई राज्यों में भविष्य में कुछ समस्याएं खड़ी हों, तो आश्चर्य नहीं। वैक्सीन कवरेज के मामले में भी देश में एकरूपता नहीं है। लाखों लोग टीके से वंचित रह जाते हैं। महामारी से पहले भी बच्चों के टीकाकरण के मोर्चे पर कमियां तो थीं ही। खासकर आदिवासी समुदाय में टीकाकरण का आंकड़ा चिंतनीय है, जहां 56 फीसदी नवजात शिशुओं को ही टीका लग पाता है। इसके अलावा कोविशील्ड तथा कोवाक्सिन का भंडारण हमेशा कम तामपान पर करना होगा, जबकि गर्मी का मौसम आने वाला है। हालांकि देश इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।

टीकों के भंडारण के लिए 45,000  विशेष रेफ्रिजरेटर, 41,000 डीप फ्रीजर तथा 300 सोलर रेफ्रिजरेटर तैयार हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने टीकाकरण को अंजाम देने वाले दो लाख से अधिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित भी किया है। देश के टीका उत्पादकों ने निश्चित तौर पर हमें गर्वित किया है। भूलना नहीं चाहिए कि भारत ने पोलियो के खिलाफ लड़ाई जीती है। लेकिन मौजूदा चुनौती की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। अभी टीकाकरण देश में अनिवार्य नहीं है। इसलिए लोगों को वैक्सीन से संबंधित जायज सवाल पूछने देना चाहिए, ताकि सही जानकारी के आधार पर वे फैसला ले सकें। लोगों में भरोसा पैदा करने का यही तरीका है, जिसके बगैर स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी कोई भी सरकारी पहल सफल नहीं हो सकती।

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