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जैव विविधता के विनाश की कीमत, वैश्विक अर्थतंत्र के साथ-साथ सरकारों की आर्थिक रणनीतियों को भी चौपट कर दिया

Mon, 24 May 2021 05:38 AM IST
VEER SINGH VEER SINGH
Updated Mon, 24 May 2021 05:38 AM IST
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सार
जैव विविधता से शनै: शनै: रीत रही जिस दुनिया को हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ेंगे, वह नई-नई घातक बीमारियों की मार झेलने के लिए अभिशप्त होगी।
 
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Corona Pandemic is cost of destruction of biodiversity
बंगलूरू के उल्सूर झील में पक्षी। - फोटो : PTI

विस्तार

अफ्रीका के गाबोन देश में इविंडो नदी के किनारे बसा 150 लोगों का मेबॉट-2 गांव 1996 में दुनिया भर में अचानक चर्चा में आया। इस गांव में अन्य अफ्रीकी बस्तियों की तरह मलेरिया, डेंगू, पीला बुखार और नींद के रोगों का प्रकोप होता था, परंतु गांववासी इन रोगों का अच्छा प्रबंध कर लेते थे। जनवरी के महीने में एक दिन गांव के कुछ लड़के कुत्तों के साथ जंगल में गए। कुत्तों ने एक चिम्पैंजी को मार दिया। गांव वालों ने चिम्पैंजी की खाल उतारी और उसे खा गए। चिम्पैंजी की खाल उतारने, मांस पकाने और उसे खाने वाले 31 लोगों को कुछ ही घंटे बाद तेज बुखार आ गया और उनमें से 21 की मौत हो गई।



बुखार और मौत का कारण था इबोला वायरस, जो मारे गए चिम्पैंजी के साथ गांव में आ गया था। जंगल का एक निरापद विषाणु मानव का काल बनकर बस्ती में आया। यह विषाणु, जो 90 प्रतिशत संक्रमितों को मारता है, अब मानव समाज का हिस्सा बन गया था। मेबॉट-2 गांव की यह घटना एक ट्रेलर थी उस महामारी की, जो नवंबर-दिसंबर, 2019 में चीन के वुहान से प्रारंभ हुई और कुछ ही माह में दुनिया भर के करोड़ों लोगों के फेफड़ों को खा गई। इसने लोगों को उन्हीं के घरों में बंद कर दिया। इसने वैश्विक अर्थतंत्र के साथ-साथ सरकारों की आर्थिक रणनीतियों को भी चौपट कर दिया। प्रारब्ध यहां भी वही था-एक वन्यजीव से मांस बाजार के रास्ते अब मानव प्रजाति पर पलने वाला एक और नवीन विषाणु-कोरोना वायरस।


यह केवल एक-दो दशक पहले ही हमारी सोच में आया था कि उष्णकटिबंधीय वनों और प्राकृतिक परिवेशों में रहने वाले वन्यजीवों के संपर्क में आने से मनुष्यों में वायरस और अन्य कई तरह के रोगाणु फैल जाते हैं। इबोला, एचआईवी, सार्स, बर्ड फ्लू और डेंगू के बाद कोविड-19 के विषाणु का मनुष्य तक पहुंचने का यही मार्ग है। अब यह सर्वविदित है कि ये सब रोग पशु-जनित हैं। पशु-जनित इन संक्रामक रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। रैबीज और प्लेग जैसे कुछ रोग सदियों पहले जानवरों से पार होकर मनुष्यों तक पहुंच गए थे। चमगादड़ द्वारा प्रेषित मारबर्ग हालांकि अब भी दुर्लभ है।

कोविड-19 और मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस (मर्स), जो पश्चिम एशिया में ऊंटों से फैला, मनुष्यों के लिए नए रोग हैं, जो विश्व स्तर पर फैल रहे हैं। जानवरों से पार हो मनुष्य तक पहुंचने वाले अन्य रोगों में हैं लासा बुखार, जिसे पहली बार 1969 में नाइजीरिया में पहचाना गया था, मलयेशिया में निपाह और 2002-03 में चीन से 30 देशों में फैलने वाला और सैकड़ों लोगों को मार देने वाला सार्स। जीका और वेस्ट नाइल वायरस जैसी बीमारियां अफ्रीका में उभरीं और उत्परिवर्तित होकर अन्य महाद्वीपों में स्थापित हो गईं। अमेरिकी शोधकर्ताओं के एक दल ने 2008 में 335 रोगों की पहचान की, जो 1960 और 2004 के बीच मानव समाज में उभर कर आए, और जिनमें से कम से कम 60 प्रतिशत जानवरों से आए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये पशु-जनित (जूनोटिक) रोग पर्यावरण परिवर्तन और मानव व्यवहार से जुड़े हैं। दुर्गम और जैव विविधता से परिपूर्ण क्षेत्रों में सड़कों का जाल, भवन निर्माण, द्रुत गति से बढ़ता शहरीकरण और जनसंख्या विस्फोट के कारण प्राकृतिक वनों का विनाश किया जा रहा है, फलस्वरूप मनुष्य जंगली जानवरों के परिवेश में उनके निकट पहुंच गए हैं। वन्यजीवों से मनुष्यों तक रोगों का संचरण मानव आर्थिक विकास के आधुनिक मॉडल की एक अदृश्य कीमत है। यह कीमत उन समाजों और व्यक्तियों को सर्वाधिक चुकानी पड़ती है, जिनके पास रोगों से बचाव और उनके उपचार के लिए साधन तक नहीं। प्राकृतिक आवास के जंतुओं के रोगाणु से मनुष्य में उत्पन्न रोग के जोखिमों
का परस्पर क्या संबंध है, इसका गहन अध्ययन एमोरी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में सुप्रसिद्ध रोग पारिस्थितिकीविद प्रोफेसर थॉमस गिलेस्पी ने किया है। गिलेस्पी कहते हैं, 'मैं कोरोना वायरस प्रकोप के बारे में बिल्कुल आश्चर्यचकित नहीं हूं।

अधिकांश रोगजनक जीवों की खोज अभी की जानी है। यह (कोरोना वायरस) तो केवल छोटा-सा नमूना है।' बाजार प्राकृतिक जैव विविधता का एक वाणिज्यिक संग्रहालय है, जहां से अनेक प्राणी-जनित (जूनोटिक) रोगों का व्यापार चलता है। दुनिया में द्रुत गति से बढ़ती शहरी आबादी को ताजा मांस चाहिए, जिस कारण ये बाजार फल-फूल रहे हैं। इन बाजारों में चीन सबसे आगे है। जिन बाजारों में जिंदा जानवर, उनके मांस तथा उनके अनेक उत्पाद बेचे जाते हैं, उन्हें गीला बाजार (वेट मार्केट) कहते हैं। चीन के वुहान में ‘गीला बाजार'(वेट मार्केट) में विभिन्न प्रकार के वन्य-जीवों को जिंदा और उनका ताजा मांस बेचा जाता है। वहां भेड़ियों के बच्चे, सैलामैंडर, मगरमच्छ, लोमड़ी, चूहे, गिलहरी, चील, कछुए, बिच्छू और सभी तरह के कीट-पतंगों से लेकर अनेक तरह के समुद्री जीव तक बेचे जाते हैं।

इसी तरह, पश्चिम और मध्य अफ्रीका के शहरी बाजारों में बंदर, चमगादड़, चूहे, और स्तनपाइयों की दर्जनों प्रजातियों की मांस के लिए हत्या की जाती है। जब यह बात सामने आई थी कि कोरोना वायरस वहां के गीले बाजार से फैला है, तो चीन के अधिकारियों ने फरवरी, 2020 में वुहान बाजार में जिंदा जानवरों को बेचने और मछली और समुद्री जीवों को छोड़कर अन्य वन्यजीवों के मांस पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन बाद में गीले बाजार में सब पहले जैसा ही होने लगा। अफ्रीका में लेगोस का गीला बाजार बहुत ही कुख्यात है, जहां महामारी का एक और बम कभी भी फट सकता है।

जैव विविधता से शनैः शनैः रीत रही जिस दुनिया को हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ेंगे, वह नई-नई घातक बीमारियों की मार झेलने के लिए अभिशप्त होगी। अगर अपनी 'अगली दुनिया' को पूर्णरूपेण स्वस्थ और सकारात्मकता, नई कल्पनाओं एवं प्रफुल्लता से भरी देखना चाहते हैं, तो वह इस पर निर्भर करेगा कि हम अपने ग्रह पर जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में कितना सार्थक प्रयास करते हैं। यदि कोविड-19 महामारी हमारी समकालीन दुनिया को जागरूकता का यह पाठ पढ़ा पाई, तो कोविड के बाद की दुनिया नई उमंगों और संभावनाओं से सराबोर होगी।

-पूर्व प्रोफेसर, जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय।

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