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कॉप-29: नहीं होती कोई ठोस पहल तो ऐसे सम्मेलनों की रस्म अदायगी का क्या अर्थ?
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कॉप-29।
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अमर उजाला
विस्तार
फिर एक बार वार्षिक रस्म अदायगी के तहत अजरबैजान के बाकू शहर में पूरी दुनिया के शीर्ष प्रतिनिधि, संयुक्त राष्ट्र संगठन और स्वैच्छिक संस्थाएं जलवायु परिवर्तन पर चिंता जाहिर करते हुए नए संकल्पों के साथ कॉप-29 के आयोजन में शिरकत कर रही हैं। यह मेला ठीक उसी तरह है, जैसे जगदंबा प्रसाद मिश्र रचित ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...’।
बातें बहुत होंगी, बहुत आंसू बहेंगे दुनिया में बढ़ रही आपदाओं और गर्म होते वातावरण को लेकर, लेकिन सबक लेकर परिवर्तन की राह पर चलने की बस चर्चा होगी। बीते वर्षों में हर वर्ष कार्बन उत्सर्जन को कम करने, तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस प्रतिवर्ष तक सीमित करने और उसके कारकों पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए लगभग दो सप्ताह तक समस्त साझेदार और प्रभावित पक्ष एकत्रित होकर अपनी चिंताएं जाहिर करते हैं। इतने सघन प्रयासों और आपसी सहमति के बावजूद अब भी यथार्थ से बहुत लंबी दूरी बनी हुई है। इस बार का कॉप-29 कई मायनों में विशेष महत्व रखता है, जब वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप पुनः राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए हैं और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती नजर नहीं आ रही है।
वर्तमान परिदृश्य के चलते यह माना जा रहा है कि पेरिस में निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को सीमित करने के लक्ष्य से दीगर सन 2100 तक तापमान में वृद्धि 2.6 से 3.1 के मध्य हो सकती है, जो कि जलवायु में व्यापक परिवर्तन का कारण बनेगी। यह सम्मेलन इसलिए भी विशेष है, क्योंकि फरवरी 2025 से पहले समस्त राष्ट्रों को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान को कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने संबंधी योजनाओं को पुनः निर्धारित करते हुए पेश करना है। इस संबंध में विभिन्न विशेषज्ञों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस बार कॉप-29 में कोई सार्थक एवं ठोस वचनबद्धता नहीं आती है, तो वैश्विक स्तर पर गंभीर त्रासदी और परिणाम भुगतने होंगे। वैसे भी बीते कुछ वर्षों में नैसर्गिक आपदाओं यथा अकाल, बाढ़, तूफान, जंगलों और मरुस्थलों में आग, जैसी आपदाएं तीव्र गति से बढ़ी हैं। इन सबके मूल में तापमान की अभिवृद्धि ही है।
कॉप-29 में फिर एक बार वित्तीय प्रावधानों को लेकर बड़ी बहस होने की संभावना है। विगत एक दशक से यह चर्चा का मुख्य बिंदु रहा है, लेकिन विकसित और अत्यधिक उत्सर्जन वाले औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा किसी भी प्रकार से ठोस योगदान के अभाव में इस बाबत अनिर्णय की स्थिति बनी रहती है। जलवायु परिवर्तन का मुख्य आक्षेप अविकसित अथवा विकासशील राष्ट्रों पर लगाया जाता है। हकीकत इससे विपरीत है। भारत की पहल पर कॉप-27 के दौरान हानि एवं क्षति निधि की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन उसमें निधि के स्रोत क्या होंगे, अभी भी बड़ा प्रश्न बना हुआ है। गत कॉप-28 में आयोजक राष्ट्र संयुक्त अरब अमीरात ने इस कोष में दस करोड़ अमेरिकी डॉलर के योगदान के साथ शुरुआत की थी, जो अभी तक कुल मिलाकर मात्र 80 करोड़ डॉलर तक ही पहुंच पाई है, जबकि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के द्वारा जलवायु परिवर्तन जनित आपदाओं को रोकने के लिए विकासशील एवं अविकसित राष्ट्रों को अगले दशक में 215 से 387 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। वर्तमान राशि की वचनबद्धता के सामने यह लक्ष्य दूर की कौड़ी नजर आता है। इसके बिना आर्थिक रूप से वंचित राष्ट्र प्रस्तावित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे। अर्थ के अभाव में वे जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली आपदाओं की भविष्यवाणी और बचाव करने में कारगर कदम उठाने में अक्षम रहेंगे।
भारत जैसा राष्ट्र, जो कि तीन ओर से महासागर से घिरा है और जहां तापमान अभिवृद्धि का प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है, इस गंभीर खतरे को निरंतर झेल रहा है। अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप पूर्व में जलवायु संबंधी इन चर्चाओं और अमेरिकी भागीदारी को नकार चुके हैं। ऐसे में उनके रुख पर सभी की नजर रहना स्वाभाविक है, क्योंकि अमेरिका अब भी वैश्विक रूप से कार्बन उत्सर्जन में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। पूर्व के समस्त सम्मेलन जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम या समाप्त करने पर केंद्रित रहे हैं, लेकिन ज्यादा सफल नहीं हुए। ऐसे में भारत की पहल पर बने सोलर अलायंस जैसे नवाचार के माध्यम से ही गैर पारंपरिक ऊर्जा के विस्तार, जीवनशैली में परिवर्तन के माध्यम से उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयास करने होंगे। साथ ही तेल उत्पादक राष्ट्रों की आर्थिक निर्भरता को जीवाश्म ईंधन से कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवसायों को उन्नत करने का मार्ग तय करना होगा। आशा करनी चाहिए कि इस बार कॉप-29 ठोस कार्ययोजना पर सहमति तक पहुंच पाए।