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वाणी संयम किसी तप से कम नहीं
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 30 Oct 2013 07:09 PM IST
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धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि शब्द ब्रह्म होता है। अतः एक-एक शब्द का उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए। न किसी की निंदा करनी चाहिए और न ही व्यर्थ में किसी की प्रशंसा करनी चाहिए। हमेशा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए।
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एक बार भर्तृहरि ने चातक को संबोधित करते हुए एक श्लोक की रचना की। उसमें कहा गया था, प्रिय चातक, क्षण भर के लिए मेरी बात ध्यान से सुनो। आकाश में कई प्रकार के बादल होते हैं, किंतु सभी तृप्त नहीं करते। उनमें से कुछ पृथ्वी पर जल बरसाते हैं और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। अतः तुम जिसको भी देखो, उसके सम्मुख दैन्यसूचक शब्दों का प्रयोग मत करो।
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महाभारत में कहा गया है, किसी से कठोर वचन न बोलो। कटु वचन रूपी बाण से आहत मनुष्य शोक और चिंता में डूबा रहता है। अतः गुणी जनों को दूसरों के प्रति निष्ठुर वचनों के प्रयोग से बचना चाहिए। कहा गया है, नित पवित्र वचन बोलें। दूसरे के कटु वचन सह लें, परंतु किसी को कटु वचन बोलकर शब्दों और वाणी का दुरुपयोग न करें।
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भविष्य पुराण में कहा गया है, शीतल जल, चंदन का रस अथव ठंडी छाया भी मनुष्य के लिए उतनी आह्लादकारी नहीं होती, जितनी मीठी वाणी। इसलिए वाणी संयम तप के समान है। धर्मग्रंथों में बताया गया है कि जो वचन किसी को उद्विग्न करनेवाला न हो तथा सत्य, प्रिय और हितकारी हो, वही सार्थक वाणी है।