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दूसरों से घिरी हैं, फिर भी कहानियां कहती हैं अपनी सी बात

Sat, 20 Jul 2013 08:53 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 20 Jul 2013 08:53 PM IST
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contemporary hindi story

एक अर्थ में यह सही है कि समकालीन हिंदी कहानी में न पहले जैसा उद्वेलन है, न कोई आंदोलन। नवोदितों में फॉर्म की चमक-दमक को छोड़ दें, तो उल्लेखनीय कथा लेखन कम ही है। इसी के बीच कुछ कहानियां, कुछ संग्रह और कुछ कथाकार अपनी छाप छोड़ते हैं, तो फिलहाल यह भी बहुत है।

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प्रियदर्शन मालवीय को ही लें, तो उनके इस दूसरे कथा संग्रह की कहानियां बदलते जीवन यथार्थ के चित्रण के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी भाषा और संवेदना के कारण भी ध्यान खींचती हैं। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये वर्तमान भूमंडलीकृत समय-समाज से जुड़ी हुई हैं। 'प्रेम न हाट बिकाय' की प्रेमिका को जैसे ही पता चलता है कि लड़का मुस्लिम है, उसका नजरिया बदल जाता है।
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तब उसका प्रेमी, प्रेमी न रहकर एक ऐसे समुदाय का प्रतिनिधि बन जाता है, जो अपनी हिंसा और कट्टरता के लिए कुख्यात है! भूमंडलीकृत समय-समाज ने सिर्फ प्रेम को नहीं, हमारे पूरे नजरिये को बदल दिया है। इक्कीसवीं सदी का भारत विकास का दंभ भरता है। राजधानी और महानगरों की चकाचौंध भरी जिंदगी को दुर्योग से पूरे देश का सच मान लिया जाता है। गांव का सच तो यह है कि बहुतेरी नदियां अपने ऊपर पुल बनने की प्रतीक्षा में हैं, स्थानीय विधायक और उनके नाते-रिश्तेदार अचानक पैदा हो रही विकास की इस संभावना को भुनाने की प्रतीक्षा में हैं, जबकि जग्गू और फग्गू जैसे लोग इस मृगमरीचिका में मारे जाते हैं।
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संजय कुमार सिंह का कथालोक थोड़ा विस्तृत आयाम लिए हुए है। वैसे तो शीर्षक कहानी ही ग्लोबल समाज पर फोकस करती है, जिसमें गांव से भागी हुई एक लड़की जैसे ही अचानक टीवी के विज्ञापन में दिखती है, गांव के लोगों का उसके प्रति नजरिया ही बदल जाता है। जो लोग उसके चरित्र पर लांछन लगाते थे, वे चोरी-छिपे टीवी पर उसे देखने की कोशिश करते हैं, तो गांव की भोली-भाली लड़कियां उसी की तरह चर्चित होना चाहती हैं। 'हवाई जहाज' भी इसी तरह की कहानी है। संजय भूमंडलीकृत व्यवस्था का चित्र तो खींचते हैं, लेकिन सीधे-सीधे उसकी विसंगति बताने के बजाय उसके प्रति एक लालच पैदा करते हैं, फिर उसे हमारे ग्रामीण समाज का यूटोपिया बताते हैं।

वह मूल रूप से ग्रामीण जीवन की विसंगति और खासकर औरतों की नियति को अपना प्रतिपाद्य बनाते हैं, 'फूलो-अनारो' कहानी जिसका शिखर है। उत्तर बिहार और उसमें भी कोसी अंचल की लोकोक्तियों के साथ कथाकार का भाषिक सौष्ठव रचनात्मकता का जो वितान तैयार करता है, वह वाकई पठनीय है।

राजकुमार सिंह की कहानियां शहरी भारत और उसके विद्रूप को फोकस करती हैं। यहां बेरोजगार बेटे की चिंता में घुलते उसके पिता का दर्द है, तो पत्नी के गायब हो जाने पर समूची व्यवस्था की विडंबना का यथार्थ भी। प्रियदर्शन मालवीय के बाद राजकुमार सिंह की कहानी 'दो नंगे' भी भूमंडलीकृत समाज-व्यवस्था में प्रेम के बदले स्वरूप के बारे में चौंकाती है।


'शवयात्रा' संग्रह की सबसे अच्छी कहानी है, जिसमें बेकारी का दर्द ही नहीं, ऐसे हालत में रिश्तों के अमानवीय हो जाने का भी चरम दिखता है। राजकुमार सिंह की कहानियों का यह शहरी भारत भी उतना ही उदास और लस्त-पस्त है, जितना संजय कुमार सिंह के गांव। ये तीनों संग्रह इक्कीसवीं सदी के भारत की असलियत बताते हैं।

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