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सांविधानिक मर्यादा और सत्ता का मोह: ममता को समझना होगा, लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति अपरिहार्य नहीं होता

Thu, 07 May 2026 07:28 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Thu, 07 May 2026 07:28 AM IST
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सार
ब्रिटेन के राजा जेम्स-II के लिए जब परिस्थितियां प्रतिकूल हुईं, तो उन्होंने यह सोचकर राजमुद्रा को टेम्स नदी में फेंक दिया कि उसके अभाव में लोगों को पुन: उनकी ओर ही लौटना पड़ेगा, पर ऐसा तो हुआ नहीं। यदि ममता भी कुछ ऐसा ही सोच रही हैं, तो उन्हें समझना होगा कि लोकतंत्र में कभी कोई व्यक्ति अपरिहार्य नहीं होता।
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Constitutional morality and lure of power Mamata Banerjee must understand no one indispensable in democracy
ममता बनर्जी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

ममता बनर्जी ने चुनाव में हारने के बावजूद मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने से इन्कार कर दिया है। इससे  मिलता-जुलता प्रकरण ब्रिटेन में भी हो चुका है।  वर्ष 1688 में ग्लोरियस रिवोल्यूशन के समय जब ब्रिटेन के राजा जेम्स द्वितीय के लिए परिस्थितियां प्रतिकूल हुईं, तो लंदन से भागते समय उन्होंने अपनी राजमुद्रा को टेम्स नदी में फेंक दिया था। उनका विचार था कि राजमुद्रा के अभाव में शासन की वैधानिक प्रक्रिया रुक जाएगी और अंततः व्यवस्था को पुनः उन्हीं की ओर लौटना पड़ेगा। पर, ऐसा नहीं हुआ। ब्रिटिश सांविधानिक व्यवस्था व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि संस्थाओं और परंपराओं पर आधारित थी। राजमुद्रा के अभाव ने शासन को नहीं रोका, बल्कि नई व्यवस्था बनी, संसद ने अपनी भूमिका निभाई और अंततः जेम्स द्वितीय को सत्ता से बाहर होना पड़ा। इतिहास ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र अथवा सांविधानिक शासन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होता।


लोकतांत्रिक संस्थाओं का आधार निस्संदेह संख्याबल होता है, किंतु उनका पुष्पन-पल्लवन जिम्मेदार लोगों के परिपक्व आचरण से होता है। वह परंपराओं, सांविधानिक मर्यादाओं और नैतिक उत्तरदायित्वों की नींव से सुदृढ़ होता है। संविधान किसी राष्ट्र का लिखित ग्रंथ अवश्य होता है, पर लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा उन अलिखित परंपराओं में निहित रहती है, जो सत्ता को संयमित करती हैं और शासक को उत्तरदायी बनाती हैं। जब कोई निर्वाचित शासक या सरकार जनभावनाओं अथवा नैतिक उत्तरदायित्व की उपेक्षा कर केवल पद से चिपके रहने का संकेत देती है, तब प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति और सांविधानिक परिपक्वता का बन जाता है।  


भारतीय संविधान की मूल भावना भी यही है। संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार, मुख्यमंत्री राज्यपाल के प्रति उत्तरदायी मंत्रिपरिषद का प्रमुख होता है। यद्यपि मुख्यमंत्री का पद तकनीकी रूप से राज्यपाल के प्रासाद आधारित माना गया है, परंतु संसदीय लोकतंत्र की परंपरा यह स्थापित करती है कि सरकार को सदन का विश्वास तथा नैतिक वैधता, दोनों प्राप्त होने चाहिए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि संविधान कितना भी उत्तम क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग उचित सांविधानिक आचरण न करें, तो उसकी आत्मा क्षीण हो जाती है।

भारत की संसदीय परंपरा में ‘सांविधानिक नैतिकता’ का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने अनेक निर्णयों में इस सिद्धांत को लोकतंत्र का मूलाधार बताया है। वर्ष 1994 के एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक निर्णय में शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि सांविधानिक मूल्यों और उत्तरदायित्व का भी विषय है। इसी प्रकार वर्ष 2016 के नाबम रेबिया प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सांविधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपने अधिकारों का प्रयोग संविधान की आत्मा के अनुरूप ही करना चाहिए, न कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार।

भारतीय राजनीति में त्यागपत्र केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक भी रहा है। बात अगस्त 1956 की है, जब आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में एक बड़ा रेल हादसा हुआ, जिसमें 112 लोगों की जान चली गई। इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए, तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन उन्होंने शास्त्री जी को इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी कर लिया। कुछ महीनों बाद, नवंबर 1956 में, तमिलनाडु के अरियालुर में एक और रेल हादसा हुआ। इस घटना में 144 लोगों की मौत हो गई। शास्त्री जी ने तुरंत प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया और उनसे इसे जल्द से जल्द स्वीकार करने का आग्रह किया। स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति में यह उदाहरण आज भी राजनीतिक मर्यादा के आदर्श के रूप में स्मरण किया जाता है। इसके विपरीत, जब कोई शासक यह संदेश देने का प्रयास करता है कि उसके बिना शासन या व्यवस्था चल ही नहीं सकती, तब वह अनजाने में लोकतंत्र की मूल भावना का ही अपमान करता है।

यदि किसी राज्य में मुख्यमंत्री त्यागपत्र देने से इन्कार करते हैं अथवा यह संकेत देते हैं कि उनके पद पर बने रहने से ही व्यवस्था चल सकती है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्ति को कम करके आंकने जैसा है। भारतीय संविधान ने सत्ता के हस्तांतरण की स्पष्ट व्यवस्था दी है। संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 के अंतर्गत राज्यपाल नई सरकार के गठन की प्रक्रिया सुनिश्चित कर सकते हैं। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होती है, किसी एक व्यक्ति के प्रति नहीं। लोकतंत्र की यही शक्ति है कि व्यक्ति बदल जाते हैं, परंतु संस्थाएं अपनी व्यवस्था से चलती रहती हैं।

इतिहास और संविधान, दोनों हमें सिखाते हैं कि सत्ता का वास्तविक सौंदर्य त्याग और उत्तरदायित्व में है, न कि पद से चिपके रहने में। राजा जेम्स द्वितीय की राजमुद्रा टेम्स नदी में डूब गई, पर ब्रिटिश शासन नहीं रुका। उसी प्रकार, किसी भी लोकतंत्र में कोई व्यक्ति इतना अपरिहार्य नहीं होता कि उसके बिना सांविधानिक व्यवस्था ठहर जाए। लोकतंत्र व्यक्तियों की नहीं, संस्थाओं की विजय का नाम है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व केवल कानूनी अधिकारों की नहीं, बल्कि सांविधानिक मर्यादाओं और नैतिक उत्तरदायित्वों की भी रक्षा करे। लोकतंत्र की स्थिरता संविधान की धाराओं से उतनी सुरक्षित नहीं होती, जितनी शासकों के आत्मसंयम, परिपक्वता और संस्थाओं के प्रति सम्मान से होती है। जब सत्ता का मोह सांविधानिक शिष्टाचार पर भारी पड़ने लगे, तब इतिहास चेतावनी देता है कि ऐसे क्षण केवल राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की परीक्षा भी बन जाते हैं।     
edit@amarujala.com
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