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परिवार से कांग्रेस और देश को नुकसान, उचित-अनुचित का भेद समझा रहे हैं रामचंद्र गुहा

Sun, 23 Aug 2020 04:30 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 23 Aug 2020 04:30 AM IST
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Congress Of One family And country to loss, Ramachandra Guha is explaining the difference between right and wrong
सोनिया-राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

जो लोग प्रधानमंत्री और उनकी नीतियों का विरोध करते हैं और उन्हें तथा उनकी पार्टी को राजनीतिक रूप से पराजित करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि आखिर क्यों नरेंद्र मोदी ने जोरदार तरीके से दो चुनावी जीत हासिल कीं और क्यों मतदाताओं में व्यापक रूप से उनकी लोकप्रियता कायम है।


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सम्मानित अध्येता ने मुझे लिखा था, 'मैं सचमुच सोचता हूं कि यदि कोई अपने विरोधी से सफलतापूर्वक टकराना चाहता है, तो उसे सावधानीपूर्वक उसे विरोधी की ताकत के बारे में विचार करना चाहिए। मोदी में कई तरह की प्रतिभाएं हैं, कई तरह की क्षमताएं हैं। मैं समझता हूं कि इनमें सबसे ऊपर उनकी नियमित स्वस्थ जीवन शैली, उनकी प्रचुर शारीरिक और मानसिक ऊर्जा और अपने लक्ष्यों के प्रति उनका समर्पण सर्वोपरि है।

वह हमेशा व्यस्त रहते हैं, और इसलिए स्वाभाविक रूप से काम में ही आराम पाते हैं। वह छुट्टियां नहीं लेते...। दूसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि वह सत्ता और खुद अपने साथ बहुत सहज हैं। वह कभी बाहरी नहीं लगते, चाहे यह वैश्विक नेताओं की बैठक हो या फिर सड़क किनारे की कोई चाय दुकान।

तीसरी बात, वह एक शानदार वक्ता हैं। हालात को वह प्रभावकारी तरीके से संभालते हैं। मन की बात में वह दादा की तरह लगते हैं, चुनावी रैलियों में जननायक, शिखर बैठकों में राजनेता इत्यादि। खासतौर से हिंदी में शब्दों को बरतने का उनका तरीका अद्भुत है। वह जिस सहजता से झूठ बोलते हैं, वह आश्यचर्यजनक है, उनके तथ्य भी तथ्यपरक नहीं होते। चौथी, उनकी रुचियां बहुत व्यापक हैं, स्वाभाविक है कि वह ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं। पांचवीं बात, उनके पास गृह मंत्री के रूप में एक दुर्जेय सहयोगी हैं, पूरी तरह से निर्मम।' 

यह विद्वान अध्येता खुद आजीवन धार्मिक कट्टरपंथ के विरोधी रहे हैं और लोकतंत्र तथा बहुलतावाद के समर्थक रहे हैं। मोदी और शाह के शासन को वह खतरनाक और विभाजनकारी मानते हैं, जैसा कि मैं भी मानता हूं। मगर, इस अध्येता ने हमें याद दिलाया कि हम लोकतंत्रवादियों और बहुलतावादियों को यह स्वीकार करना चाहिए कि जिस नेता का हम विरोध करते हैं, उन्हें बहुत से भारतीय पसंद करते हैं।

हिंदुत्व के विरुद्ध लड़ाई विचारधाराओं की लड़ाई है। यह गणतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की बहाली चाहती है, जिनमें धार्मिक और भाषायी बहुलता, लैंगिक और जातीय समानता, राज्य की शक्ति के प्रति आलोचनात्मक रुख, और अन्य संस्कृतियों और सभ्यताओं के प्रति खुलापन शामिल हैं। ये सारे वही सिद्धांत हैं, जिन्हें हिंदुत्व या तो छोड़ देने या उखाड़ फेंकने की धमकी देता है। भारत में आम चुनाव तेजी से अध्यक्षीय प्रणाली जैसे चुनाव में बदलते जा रहे हैं। ऐसे में वह व्यक्ति जो नरेंद्र मोदी को चुनौती देने में 2014 और 2019 में बुरी तरह नाकाम हो चुका है, क्या वह 2024 में सफल हो पाएगा?

जनवरी, 2013 में जब कांग्रेस केंद्र में सत्ता में थी, तब मैंने कोलकाता के टेलीग्राफ के लिए एक कॉलम पार्टी के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी पर लिखा था। उनके राजनीति में आने के उनके करियर की समीक्षा करने के बाद मैंने लिखा, 'राहुल गांधी के बारे में एक अच्छी बात यह कही जा सकती है कि वह नेक इरादों वाले नौसिखुआ हैं। उन्होंने प्रशासनिक क्षमता का कोई संकेत नहीं दिया है, बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी लेने के प्रति इच्छा नहीं जताई है और गंभीर सामाजिक समस्याओं का समाधान करने के लिए न तो उनमें ऊर्जा है, न समर्पण।'

साढ़े सात साल बाद राहुल गांधी राजनीति में नौसिखुआ बने हुए हैं। उनके इस नौसिखुआपन का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि वह अब भी धाराप्रवाह हिंदी नहीं बोल पाते, बावजूद इसके कि वह उत्तर प्रदेश से तीन बार सांसद रह चुके हैं। बहुसंख्यक भारतीय जो भाषा बोलते हैं उसमें वाक्पटुता में कमी निश्चय ही 2014 और 2009 के आम चुनावों में अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए राहुल गांधी के खराब प्रदर्शन करने की एक वजह है। उनकी लड़खड़ाती हिंदी नरेंद्र मोदी की भाषा पर पकड़ के एकदम उलट है। लेकिन इसके अलावा दूसरे कारण भी हैं, जिनमें राहुल गांधी में प्रशासनिक अनुभव की कमी और उनका परिवार की पांचवीं पीढ़ी का सदस्य होना भी शामिल है।

राहलु गांधी पूर्व प्रधानमंत्रियों के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र हैं, यह अधिकांश भारतीयों की नजर में एक लाभ नहीं है, जिनका जन्म और वंश के आधार पर किए जाने वाले दावों से तेजी से मोहभंग हो रहा है। राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस जब प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर प्रेस और विरोध को दबाने का आरोप लगाती है, तो सत्तारूढ़ दल का फौरी जवाब होता है, और इंदिरा गांधी और उनके आपातकाल ने क्या किया था?

राहुल गांधी की अगुआई में जब कांग्रेस प्रधानमंत्री पर हमारे क्षेत्र में चीन की घुसपैठ की इजाजत देने के आरोप लगाती है, तो सत्तारूढ़ दल का फौरी जवाब होता है कि और 1962 में जवाहरलाल नेहरू का चीन के आगे समर्पण क्या था? 2019 में राहुल गांधी ने एक भारी गलती की, जब उन्होंने प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी को अपनी पार्टी का केंद्रीय चुनावी मुद्दा बना दिया और नारा दिया 'चौकीदार चोर है'। यह भारी चूक थी, इसकी बजाय कांग्रेस को पूछना चाहिए था कि 2014 में अच्छे दिन का जो वादा किया गया था, वह कहां है।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ऐसे चापलूसों ने घेर रखा है, जो कि वर्षों से प्रथम परिवार के प्रति अपनी वफादारी के कारण राज्यसभा सीटों और पार्टी महासचिव के पदों पर काबिज हैं, और हमेशा कहते हैं कि सोनिया या उनके बच्चे नेतृत्व न करें, तो पार्टी बचेगी नहीं। दूसरी ओर व्यक्तिगत हितों से परे जाकर भारतीय लोकतंत्र के व्यापक हित में कोई देखे, तो यह स्पष्ट नजर आता है कि प्रमुख विपक्षी दल की कमान गैर नेहरू-गांधी के पास हो तो, मोदी सरकार के लिए अपनी नीतियों की आलोचनाओं से जवाहरलाल, इंदिरा या राजीव की वास्तविक या कथित गलतियां बताकर ध्यान भटकाना मुश्किल हो जाएगा।

यदि कांग्रेस का यह गैर नेहरू-गांधी अध्यक्ष सरकार से जब अर्थव्यवस्था और महामारी को लेकर या विरोध को दबाने तथा चीन के आगे समर्पण को लेकर कड़े सवाल पूछेगा, तो उसके लिए जवाब में नेहरू, इंदिरा या राजीव के बारे में बोलना मुश्किल हो जाएगा। और यदि यह गैर नेहरू-गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हिंदी में धारा प्रवाह बोलता हो, जिसका जनाधार हो और जिसमें कठोर था नियमित काम करने की क्षमता हो, तो उसकी पार्टी चुनावों में काफी अच्छा प्रदर्शन करेगी।

मैंने राहुल गांधी को नौसिखुआ और नेक इरादे वाला कहा। उनका यह बाद वाला गुण इस बात का प्रमाण है कि परिवार के वही एकमात्र सदस्य हैं, जो अपने हक को लेकर विरोधाभासी हैं। उनकी मां और बहन, दोनों ही वंश को लेकर कट्टरपंथी हैं। इसीलिए प्रियंका गांधी सोचती हैं कि उनका यह बयान कि मैं इंदिरा गांधी की पोती हूं, उनकी राजनीति की आलोचनाओं को चुप करा देगा। पार्टी और देश में परिवार के शासन के प्रति सोनिया गांधी का समर्पण कहीं अधिक गहरा है। राहुल गांधी को इस बात का श्रेय जाता है कि वह इस संबंध में अपनी मां और बहन से अलग हैं।

मैं कांग्रेस पार्टी की वंशवादी संस्कृति का दो दशक से आलोचक हूं। मैं इसकी फिर आलोचना कर रहा हूं, क्योंकि आज इसकी कहीं अधिक जरूरत है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने भारत को खासा नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने और उनकी सरकार ने हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, हमारे समाज को विभाजित किया है और दुनिया की नजर में भारत को कमतर किया है। जो लोग भारत के आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक पुनर्जागरण की उम्मीद करते हैं, उन्हें मोदी और उनकी पार्टी को 2024 में सत्ता से हटाने के रास्ते के बारे में विचार करना चाहिए। नौसिखुया वारिस यदि तीसरी बार मुख्य विपक्षी के रूप में होगा, तो लगता नहीं कि नतीजा बदलेगा।

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