विकास के साथ गरीबों की चिंता

अनन्त मित्तल Updated Wed, 07 Feb 2018 07:42 PM IST
 concern for Poor with development
अनन्त मित्तल
उद्योगों और आवासीय योजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण के लिए संसद में विधेयक लाने से शुरू हुआ मोदी सरकार का सफर अब गरीब, किसान, नौजवान परस्त नीतियों और कल्याण योजनाओं से पूरा होता नजर आ रहा है। भले यह चुनाव जीतने की मजबूरी हो, पर भाजपा सरकार के पांचवें और अंतिम पूर्ण बजट से तो यही प्रतिध्वनित हो रहा है।
जाहिर है कि मोदी-शाह की जोड़ी के सिर्फ विकास के बूते राज करने के मंसूबे को पहली ठोकर भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन विधेयक को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष द्वारा राज्यसभा में विफल कराने से लगी। इसके बाद राज्यों में एक के बाद एक विधानसभा चुनाव जीतने की अग्निपरीक्षा मोदी-शाह को पार्टी के भीतर-बाहर  देनी थी। इसलिए उन्होंने किसानों की जमीन के सरकारी अधिग्रहण का जिम्मा राज्यों पर छोड़ दिया। महाराष्ट्र चुनाव में ही कांग्रेस ने किसानों की बदहाली का राग छेड़ दिया था, पर राकांपा के गठबंधन तोड़कर अलग चुनाव लड़ने से दोनों ही सत्ता से हाथ धो बैठे। चुनाव तो भाजपा और शिवसेना भी एक दूसरे के खिलाफ लड़े, पर दोनों ने बहुमत लायक सीटें जीतकर सरकार बना ली। यह बात दीगर है कि इन पुराने हमजोलियों के बीच लाग-डांट अब भी जारी है।

महाराष्ट्र के चुनाव में अपने बूते बहुमत न मिलने पर भाजपा समझ गई कि किसान और गरीब को साथ लिए बिना राज्यों में पार्टी का आधार नहीं बढ़ाया जा सकता। हरियाणा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने  कांग्रेस सहित अन्य दलों में सेंधमारी के बावजूद अपने एजेंडे में विकास के साथ गरीबपरस्ती भी जोड़ ली। उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्जमाफी मोदी-शाह की रणनीति में आए मूलभूत बदलाव की जीवंत मिसाल है। हालांकि उन्हें भी यह रणनीति राहुल गांधी की खाट सभाओं में 'बिजली हाफ, कर्जा माफ' का नारा लगने के बाद ही सूझी। गुजरात चुनाव में भी मोदी-शाह ने दावा भले विकास का किया, पर राहुल गांधी और  युवाओं की तिकड़ी ने उनकी ऐसी हंफनी छुटाई कि अंतत: गुजराती अस्मिता और ध्रुवीकरण के दांव के बावजूद भाजपा 99 के फेर में सिमट गई। गुजरात में सरकार बना लेने के बावजूद मोदी को चुनिंदा चालीस अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों की शरण में जाना पड़ा।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नीति आयोग की बैठक के बाद उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने 2018-19 के आम बजट के एजेंडे की झलक दे दी। उनके अनुसार, अर्थशास्त्रियों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों से मोदी ने किसान की आमदनी, रोजगार, निर्यात बढ़ाने और विनिर्माण में तेजी लाने पर सुझाव मांगे। बजट में भी इन्हीं पर जोर है। इसीलिए 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये तक स्वास्थ्य बीमा, किसानों को खरीफ की फसल में ही लागत का डेढ़ गुना दाम देने, सूक्ष्म, लघु, मंझोले उद्योगों को रियायतों, महिलाओं को चार फीसदी और नए कामगारों को 12 फीसदी ईपीएफ सरकारी खजाने से देने, उज्ज्वला योजना में और तीन करोड़ गरीब औरतों को मुफ्त रसोई गैस देने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए मोटी रकम सुनिश्चित करने की घोषणाओं को जेटली ने बाकायदा हिंदी में पढ़ा। बजट के बाद प्रधानमंत्री द्वारा अपने मंत्रियों और सांसदों से इन योजनाओं को चुनाव क्षेत्रों में समझाने के निर्देश से उनका आगामी आठ विधानसभा और अगले साल का लोकसभा चुनाव गरीबपरस्त एजेंडे पर जीतने का इरादा साफ हो गया है।  

Spotlight

Most Read

Opinion

University of Bergen: क्लीनिंग स्प्रे धूम्रपान की तरह ही हानिकारक

नार्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन के शोधकर्ताओं ने यूरोपीय समुदाय श्वसन स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान 6235 भागीदारों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।

19 फरवरी 2018

Related Videos

'सदमा' देकर मौन हुई बॉलीवुड की 'चांदनी', इन हस्तियों ने जताया दुख

बॉलीवुड की 'चांदनी' यानी श्रीदेवी हमेशा के लिए गुम हुई तो हर तरफ शोक की लहर दौड़ उठी। बॉलीवुड इंडस्ट्री से लेकर खेल जगत के दिग्गजों ने भी दुख जताया है। सभी अचानक हुई श्रीदेवी की मौत की खबर सुनकर स्तब्ध हैं।

25 फरवरी 2018

Recommended

आज का मुद्दा
View more polls

अमर उजाला ऐप चुनें

सबसे तेज अनुभव के लिए

क्लिक करें Add to Home Screen