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आम आदमी को कम न आंकें
अरुण नेहरू
Updated Fri, 25 Jan 2013 09:42 PM IST
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राजनीतिक घटनाक्रम के लिहाज से पिछला हफ्ता काफी अहम रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रभारी बनाए जाने के बाद राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने अगली पीढ़ी पर भरोसा जताया, जो सही फैसला है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि कांग्रेस पहले ही चुनावी तैयारी में जुट गई है। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने अपने दिल की बातें रखीं और उनकी सोच पार्टी कार्यकर्ताओं तक अच्छी तरह पहुंची भी।
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उधर भाजपा में आयकर से संबंधित मामलों के बावजूद नितिन गडकरी दूसरी बार अध्यक्ष बनना चाहते थे, लेकिन आखिरी वक्त में राजनाथ सिंह दूसरी बार भाजपा के अध्यक्ष बने। जाहिर है, भाजपा भी 2014 के चुनाव के लिए तैयार है। नरेंद्र मोदी पहले देश का दौरा करेंगे, फिर 2014 के चुनाव अभियान का नेतृत्व करेंगे।
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भाजपा ने झारखंड को गंवा दिया, कर्नाटक भी उसके हाथ से जाने वाला है। जाहिर है कि उसके आगे का रास्ता आसान नहीं है। कांग्रेस के विपरीत, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ समस्याएं हैं और इससे होनेवाले नुकसान को कम करना उसके लिए जरूरी है।
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पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि इस नए साल में राजनीतिक गठबंधन बनेंगे। मेरे मुताबिक, चुनावी आकलन के लिए अब बेहतर समय है। अभी स्पष्ट तौर पर क्षेत्रीय दल फायदे में दिख रहे हैं। क्षेत्रीय ढांचे में दो या तीन अंतरिम गठबंधन होंगे। समय के साथ इसमें बदलाव हो सकता है, लेकिन कोई भी परिवर्तन जमीनी हकीकत पर निर्भर होगा। राज्यवार आंकड़ों के आधार पर मेरा आकलन है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 139, भाजपा को 131 एवं अन्य पार्टियों को 272 सीटें मिलेंगी।
एक गठबंधन का नेतृत्व जयललिता करेंगी और उनका झुकाव भाजपा की तरफ होगा, जबकि दूसरे समूह का नेतृत्व मुलायम सिंह कर सकते हैं, जिसका झुकाव कांग्रेस की ओर होगा। दोनों समूहों के पास 70 से 80 सीटें होंगी। बसपा, जद (यू), तृणमूल कांग्रेस एवं कुछ अन्य छोटे दलों के पास भी 70 से 100 सीटें हो सकती हैं। इस समूह का झुकाव कांग्रेस या भाजपा किसी भी तरफ हो सकता है।
आप चाहें तो विभिन्न तरह के सौ गठबंधन बना लें, लेकिन आम आदमी की सोच राजनीतिक दलों की योजनाओं से हमेशा अलग होती है। यह साफ दिख रहा है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस और भाजपा, दोनों दबाव में होगी। मुझे नहीं मालूम कि धर्मनिरपेक्ष एवं सांप्रदायिकता का मुद्दा पहले की तरह ही तीव्रता से उठेगा या नहीं, पर यदि ऐसा हुआ, तो चुनाव में इन दोनों बड़ी पार्टियों को भारी फायदा या नुकसान हो सकता है।
बदलाव हम पर निर्भर है। क्या कोई अगली राजनीतिक दुर्घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी कर सकता है। जैसा कि हमने पिछले दिनों देखा, दिल्ली गैंगरेप एवं नियंत्रण रेखा पर हमारे दो सैनिकों की बर्बर हत्या जैसी त्रासदियों के दौरान सरकार एवं मुख्य विपक्षी दल ने तेजी से प्रतिक्रिया जताई, और यह आम आदमी के दृढ़ रवैये के कारण ही हुआ। हम संविधान का हवाला दे सकते हैं, लेकिन शासन के तीनों अंगों में जो तंत्र काम कर रहा है, वह समय से काफी पीछे है। दबाव बनने पर ही परिवर्तन अपरिहार्य होता है। ऐसी स्थितियों में एक दूसरे पर दोष मढ़ने की प्रवृत्ति काम नहीं करती।
देश की राजनीति दिनोंदिन कठिन होती जा रही है। 2014 के लिए प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के बारे में बात करना अभी जल्दबाजी है, क्योंकि इसके लिए सबसे संख्याबल जरूरी है। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी के साथ-साथ जयललिता और मुलायम सिंह यादव भी इस दौड़ में शामिल हैं, लेकिन क्या कोई मायावती, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और शरद पवार को खारिज कर सकता है!
धीरे-धीरे ही सही, हम 2014 के चुनाव के लिए तैयार हो रहे हैं। दोनों राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों में चीजें तेजी से बदलेंगी। आंकड़े बताते हैं कि कोई भी दल दूसरे को हल्के में नहीं ले सकता। हर कोई यही कहता आया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, लेकिन अब इसमें संशोधन यह होना चाहिए कि आम आदमी की निगरानी से कोई भी ऊपर नहीं है।
ज्यादा दिनों तक आम आदमी पर उपदेश, भाषण या कानून की किताब को लागू नहीं किया जा सकता, सोशल नेटवर्किंग साइट उन्हें व्यस्त रखेगा। जरा सोचिए कि सिर्फ बीते दो महीनों में ही चीजें किस तरह बदली हैं। लोकसभा चुनाव में अब भी लगभग 18 महीने बचे हैं। हम कह सकते हैं कि शासन के पास जादू की कोई छड़ी नहीं है। चमत्कारी लोग आएंगे और जाएंगे, लेकिन व्यवस्था जिस तरह जर्जर हो गई है, उसमें कठोर से कठोर कदम हमें तात्कालिक राहत तो देंगे ही, अराजकता की ओर भी धकेलेंगे।