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लक्ष्मी जी को लेकर आना
शरद उपाध्याय
Updated Tue, 21 Oct 2014 08:36 PM IST
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प्यारे उल्लू जी, इस शब्द को अन्यथा मत लेना। मैं चाहता, तो बहुत सारे शब्द जैसे ‘आदरणीय’, 'पूजनीय’ और जैसा तुम चाहो, वैसे इस्तेमाल कर सकता था। लेकिन क्या करूं, यह कहावत सुन रखी है कि आदमी प्यार में उल्लू बन जाता है। तो यही सोचा कि शायद प्यार भरे शब्दों से तुम्हारा मन पिघल जाए।
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सचमुच मैं बहुत निराश हूं। सभी लोग दीपावली की तैयारी कर रहे हैं। मैं भी वर्षों से लक्ष्मी पूजन किए जा रहा हूं। हर साल सोचता हूं कि इस बार अच्छे दिन आएंगे। पर लक्ष्मी जी पर मेरी भक्ति का कोई असर नहीं हो रहा। अब लाख सोच-समझकर तुम्हारी शरण में आया हूं। मैंने बहुत सोचा, विचारा, फिर इसी नतीजे पर पहुंचा कि मैं इतने वर्षों से गलती किए जा रहा था। हमारी दुनिया में मैंने देखा कि ऑफिस में यदि मैं सीधे अफसर की चापलूसी करने की कोशिश करता हूं, तो मुंह की खानी पड़ती है। क्योंकि वहां वर्षों से जमे हुए चमचे मेरी भक्ति-भावना से भयभीत हो जाते हैं। लेकिन मैंने यह भी देखा कि जब मैं 'थ्रू प्रॉपर चैनल' जाता हूं, तो मुझे सफलता मिलती है। चमचों की चंपी करनी पड़ती है। हालांकि ‘चमचा’ शब्द के प्रयोग से तुम्हारी भावना को ठेस पहुंची होगी। मगर मैं यह तुम्हारे लिए नहीं कह रहा।
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अब तुमसे क्या कहूं। तुम्हारी कृपा होती है, तो विदेशों तक में खाते खुल जाते हैं। मगर इधर कुछ हो ही नहीं रहा। अब मैंने तो तुम्हें ही सब-कुछ मान लिया है। तो तुम देख ही लेना, क्योंकि तुम्हारी भौजी आजकल बहुत गहने-गहने करती रहती है। मैं मना भी करता हूं। कहता हूं, रोटी का तो ठिकाना नहीं है, गहने की कहां सोच सकते हैं? पर उल्लू भाई, वह मानती ही नहीं है। वह कहती है कि तुम सब-कुछ कर सकते हो।
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बस और क्या कहूं। मैं तुम्हारा एकमात्र भक्त हूं। धीरे-धीरे तुम्हारा जनाधार बढ़ाऊंगा। मुझ पर मेहरबानी करोगे, तो बस तुम ही पूजे जाओगे। वैसे हर शाख पर तुम ही तो हो। सो इस बार लक्ष्मी जी को लेकर आ ही जाना। मैं और भौजी, लक्ष्मी-पूजन के दिन तुम्हारा ही इंतजार करेंगे। -तुम्हारा सच्चा भक्त।